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विपक्षी दलों के लिए नजीर है 24 जून 1989 का दिन

वीपी सिंह की अगुवाई में कम संख्या वाले विपक्ष ने भी सरकार की चूलें हिला दी थीं

Nazim Naqvi Updated On: Jun 24, 2017 09:15 AM IST

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विपक्षी दलों के लिए नजीर है 24 जून 1989 का दिन

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में विपक्ष की भूमिका पर जब भी बात होगी, 24 जून 1989 के उस शनिवार को शामिल किए बगैर बात अधूरी रह जाएगी, जो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में एतिहासिक दिन बन गया था. उस समय एक अखबार ने इसे विपक्ष की ‘शानदार पैंतरेबाजी’ कहा था.

दरअसल ये उस पटकथा का चरमोत्कर्ष था जिसकी बुनियाद में 1.4. बिलियन डॉलर का वो बोफोर्स समझौता था जो 1986 में राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत (404 सांसद) वाली सरकार द्वारा किया गया था. लेकिन बात तब बिगड़ी जब, 1987 में बोफोर्स डील भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गई.

अपनी ईमानदार छवि से रत्तीभर भी समझौता न करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह, जो उस समय रक्षा मंत्री थे, ने इस स्कैंडल को सार्वजानिक कर दिया था. इसकी शुरुआत हुई थी, स्वीडिश रेडियो की एक खबर से जिसे आज की भाषा में ब्रेकिंग न्यूज कहा जाता है. जिसे अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ के संपादक एन.राम और रिपोर्टर चित्रा सुब्रमण्यम ने पूरे वेग के साथ उठाया और विपक्ष को एक अवसर दिया कि वो शक्तिशाली बहुमत वाली सरकार को धाराशायी करने की हिम्मत दिखा सके.

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लगभग डेढ़ बिलियन डॉलर का ये घोटाला, बाद में हुए घोटालों के सामने ‘जीरे’ जैसा लगता है लेकिन उस समय, इसे लेकर, पूरे देश में हाहाकार मच गया था. यहां ये बताना जरूरी हो जाता है कि इस स्कैंडल को इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों ने तो जोर-शोर से छापा, लेकिन खुद ‘द-हिंदू’ ने इन खबरों पर सरकारी दबाव में अपने यहां सेंसरशिप लगा दी थी. चित्रा को मजबूरन नौकरी छोड़नी पड़ी थी ताकि बोफोर्स-स्कैंडल पर वो अपना इंवेस्टगेशन जारी रख सकें.

ये मानते हुए कि हमारे पाठक बोफोर्स-डील और उससे उठे राजनीतिक उथल-पुथल से अच्छी तरह वाकिफ हैं, लेखक खुद को उस कमजोर से दिखने वाले विपक्ष की भूमिका तक ही सीमित रखना चाहता है, जिसने एक शक्तिशाली बहुमत वाली सरकार की चूलें हिला दी थीं. उस समय, 514 सीटों वाली लोकसभा में विपक्ष के केवल 110 सांसद थे, इनमें विशेष रूप से बीजेपी के (मात्र) 2, जनता पार्टी के 10, वामपंथी 22, तेलगू देशम 30, एआईएडीएमके 12 प्रमुख थे.

हालांकि इसे भी विपक्ष की पैंतरेबाज़ी कहा तक कहा जा सकता है? ये भी सवाल के घेरे में है क्योंकि इस एकता के हीरो वीपी सिंह थे जो सत्ता से निकल कर आए थे. यानी ये भी विपक्ष की ताकत नहीं, सत्ता की कमजोरी थी.

इस ऐतिहासिक कही जाने वाली घटना को अगर दरकिनार कर दीजिए तो पिछले 70 वर्षों में कभी भी मजबूत ऑपोजीशन, भारतीय पार्टी-सिस्टम की खूबी नहीं बन सका. इसके बरअक्स हमेशा एक कमजोर विपक्ष के ही दर्शन होते रहे और हमारे पास इसे ही अपनी लोकतांत्रिक विशेषता मानने के अलावा कोई चारा नहीं रहा.

आज के संदर्भ में देखें तो विपक्ष जैसी चीज भारत में नजर ही नहीं आती है. 2014 के चुनावों के बाद नेता विपक्ष बनाने के लिए भी किसी दल के पास संख्या नहीं थी. संविधान के मुताबिक विपक्ष के नेता के लिए ये जरूरी है कि किसी दल के पास कम से कम 10 प्रतिशत (55 सांसद) हों. लेकिन कांग्रेस के सिर्फ 44 सांसद ही थे. लोग भूल जाते हैं कि जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में कभी कोई विपक्षी नेता नहीं रहा क्योंकि कभी कोई दल दस प्रतिशत अनिवार्य संख्या नहीं प्राप्त कर सका. इंदिरा गांधी काल में भी लंबे समय तक संसद में कोई विपक्षी-नेता नहीं रहा.

IndiraGandhi

दरअसल देश के पहले लोकसभा स्पीकर ए.जी मावलंकर के समय से ही ये बहस शुरू हो गई थी कि लोकतंत्र तब तक सही दिशा में नहीं बढ़ेगा जब तक पार्टियों की संख्या कम न हो, खुद उनके ही शब्दों में ‘संभवतः दो से अधिक प्रमुख पार्टियां न हों, जो एक दूसरे को सरकार और विपक्ष के रूप में समेट सकें’ एक समय में अडवानी ने भी दो-दलीय सिस्टम की वकालत कि थी. यानी समय समय पर ये मांग उठी ज़रूर लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने का नैतिक बल किसी में नहीं रहा.

वर्तमान स्थितियों में विपक्ष, मोदी सरकार पर कई तरह के आरोप लगाता हुआ नजर आता है. मसलन मोदी तानाशाह हैं, चंद कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए काम करते हैं, सांदायिकता पनप रही है या फिर, राष्ट्रवाद का हव्वा खड़ा करके देश को गुमराह किया जा रहा है. कहा तो ये भी जा रहा है कि मोदी समाज-सुधार की बातें करते हैं, इसे गवर्नेंस नहीं कहा जा सकता. ऐसी बातें विपक्ष कह तो रहा है लेकिन उसकी कोई जमीनी सच्चाई भी तो होनी चाहिए.

इसके विपरीत नीतीश कुमार को ही ले लीजिए (कोविंद समर्थन मामला) जो विपक्ष छोड़कर सत्ता के पास आ गए उनकी मुसीबत बिहार में लालू और उनके बच्चे हैं जिन पर भ्रष्टाचार के इतने मामने हैं कि खुद नीतीश की छवि बिहार में खराब हो रही है. यही विरोधाभास है विपक्ष का. बहुमत का मतलब तभी है जब विपक्ष भी हो अगर विपक्ष नहीं होगा तो बहुमत किसके लिए है? यही 1989 में नजर आया था और आज भी वही हालात हैं.

हमारे लोकतंत्र में, विपक्ष मजबूत क्यों नहीं हुआ, इसकी एक वजह ये भी है कि 1989 के बाद और 2014 से पहले तक दिल्ली दरबार कि गद्दी पर हमेशा क्षेत्रीय दलों के समर्थन से ही कोई बैठ सका. इस काल को गठबंधनों का दौर कहकर याद किया जाता है. एक दिलचस्प बात ये भी है कि इस दौरान, राष्ट्रीय राजनीति में अपना महत्त्व बढ़ाने के बावजूद, क्षेत्रीय दल कभी इतने बड़े नहीं बन पाए कि मतदाताओं के सामने कोई राष्ट्रीय विकल्प पेश कर सकें.

तो क्या भविष्य में हम कभी हम ऐसी कोशिशों को देख पाएंगे जब देश की सियासत विपक्ष को मजबूत बनाने की दिशा में खून-पसीना बहा रही हो. क्योंकि मावलंकर समेत ऐसे चिंतकों की कमी नहीं जो ये मानते रहे हैं कि लोकतंत्र एक सशक्त विपक्ष के बगैर उन्नति कर ही नहीं सकता. वो विपक्ष नहीं जो विरोध करने को ही अपना कर्तव्य समझता हो बल्कि वो विपक्ष जो सत्ता से सवाल पूछ सके और सत्ता उनका जवाब देने के लिए मजबूर हो.

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