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रामनाथ कोविंद का कार्यकाल सिर्फ फॉर्मल नहीं बेहद पॉलिटिकल होगा

राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण को पहली बार सरकार की विचारधारा को सामने रखने के लिए इस्तेमाल किया गया

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jul 26, 2017 12:49 PM IST

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रामनाथ कोविंद का कार्यकाल सिर्फ फॉर्मल नहीं बेहद पॉलिटिकल होगा

शपथ ग्रहण के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने पहले भाषण में नए भारत को लेकर अपने विचार सामने रखे. संसद के सेंट्रल हॉल में दिए इस भाषण में कोविंद ने पंडित नेहरू की बची-खुची विरासत को भी किनारे लगा दिया. देश के बारे में राष्ट्रपति कोविंद के विचार वही हैं, जो नरेंद्र मोदी सरकार के हैं. लंबी-चौड़ी, पेचीदा और लच्छेदार बातों के बजाय राष्ट्रपति कोविंद का भाषण पुरानी परंपराओं से हटकर था. उन्होंने हिंदी में भाषण देकर इसे लोगों को समझने के लिए और भी आसान बना दिया.

भारतीय संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति का पद सिर्फ नाम का है. लेकिन मोदी इस बात पर पूरी तरह से यकीन नहीं करते. इससे पहले इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह जिस तरह के नेताओं को राष्ट्रपति बनाते आए थे, उससे उनकी रबर स्टांप वाली छवि और मजबूत होती गई. लेकिन रामनाथ कोविंद को इसलिए नहीं चुना गया कि वो मौजूदा सरकार के आज्ञाकारी होंगे. उन्हें इसलिए चुना गया ताकि वो समाज के दबे-कुचले और हाशिए पर खड़े तबके, खास तौर से दलितों की आवाज बन सकें. उनकी उम्मीदों को परवान चढ़ा सकें. राष्ट्रपति न तो आम संघी कार्यकर्ता हैं, न ही वो सवर्ण विरोधी कट्टर अंबेडकरवादी हैं.

अपने भाषण में राष्ट्रपति कोविंद कभी भी अपने राजनैतिक लक्ष्य से भटके हुए नहीं दिखे. उन्होंने आम लोगों के समझने लायक आसान जबान पर जोर दिया. हिंदी भाषी राज्यों के लोगों को ये बात यकीनी तौर पर पसंद आई होगी. उन्होंने बताया कि वो खांटी 'काऊ बेल्ट' यानी कानपुर देहात में मिट्टी के घर में पले-बढ़े. साथ ही उन्होंने देश के आम आदमी की तारीफ में भी बातें की. वो आम आदमी, जिसे ऐसे मौकों पर अक्सर भुला दिया जाता है.

President Ram Nath Kovind's swearing-in ceremony

मिसाल के तौर पर राष्ट्रपति कोविंद ने छोटे-छोटे काम करने वालों का जिक्र किया. स्टार्टअप कंपनियां चलाने वाले लोगों की मेहनत और लगन को सराहा. उन्होंने घर में काम करके देश की तरक्की में योगदान देने वाली महिलाओं का खास तौर से जिक्र किया.

'आइडिया ऑफ इंडिया' का जिक्र

शायद ऐसा पहली बार हुआ कि संसद के सेंट्रल हॉल के मंच से भारत के राष्ट्रपति ने 'आइडिया ऑफ इंडिया' का सही मायनों में जिक्र किया. ये मौजूदा सरकार की नीतियों और विचारों से मेल खाने वाला है. साफ है कि राष्ट्रपति कोविंद के विचार, नेहरू की विचारधारा से बिल्कुल अलग थे.

यही वजह है कि राष्ट्रपति कोविंद ने अपने भाषण में महात्मा गांधी, सरदार पटेल और भारतीय जनसंघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय का तो जिक्र किया. लेकिन उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार का नाम लेने से परहेज किया. इसी तरह अपने पहले के राष्ट्रपतियों का नाम लेते वक्त कोविंद ने राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी का तो नाम लिया, मगर दूसरे कांग्रेसी राष्ट्रपतियों का नाम लेने से गुरेज किया.

दिलचस्प बात ये है कि राष्ट्रपति कोविंद संघ से ताल्लुक रखने वाले नहीं हैं. मगर उनकी बेहद अनुशासित जिंदगी और बीजेपी के साथ करीब 25 साल पुराने जुड़ाव ने उन्हें पार्टी की संस्कृति में पूरी तरह ढाल लिया. वो मोरारजी देसाई के करीबी सहायक रहे थे. इसी वजह से उन्हें बीजेपी और संघ परिवार से जुड़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई. बीजेपी कार्यकर्ता के तौर पर उनका मोदी के साथ भी पुराना जुड़ाव रहा है. गुजरात में दलित समुदाय को पार्टी से जोड़ने के लिए उन्हें मोदी के मुख्यमंत्री रहते अक्सर बुलाया जाता था.

गैर-कांग्रेसवाद की उपज हैं कोविंद

President Ram Nath Kovind's swearing-in ceremony

राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण को जिस तरह से सरकार की विचारधारा को सामने रखने के लिए इस्तेमाल किया गया, वैसा पहले नहीं हुआ था. इसकी बड़ी वजह भी है. रामनाथ कोविंद दलित होने के बावजूद, अपने दलित होने का बहुत शोर नहीं मचाते हैं.

साथ ही कोविंद का राष्ट्रपति बनना, उस दलित राजनीति के ठीक उलट है, जिसमें अमीर और ताकतवर दलित नेता ही जातिगत राजनीति का फायदा उठाते आए हैं. मिसाल के तौर पर के आर नारायणन बेहद विद्वान राष्ट्रपति थे. वो भी दलित ही थे. राजनयिक के तौर पर उनके लंबे करियर ने उनकी दलित पहचान को गुम कर दिया था. नारायणन के मुकाबले, रामनाथ कोविंद उत्तर भारत के खांटी दलित समुदाय की नुमाइंदगी करते हैं.

पहले के राष्ट्रपतियों के मुकाबले जो बात कोविंद को बिल्कुल अलग करती है, वो ये कि रामनाथ कोविंद, गैर-कांग्रेसवाद की उपज हैं. उनपर अपने पूर्ववर्ती की विरासत को आगे बढ़ाने का कोई बोझ नहीं है. अगर हम उनके पहले भाषण को संकेत मानें, तो अगले पांच साल तक राष्ट्रपति का पद औपचारिक नहीं बेहद राजनैतिक होगा. ये देश के लोकतंत्र के लिए यकीनन नई शुरुआत होगी.

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