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योगीजी के राज में: रंग दे तू मोहे गेरुआ...

नए जमाने में चोली और दामन की भूमिका भी बदल गई है

Shivaji Rai Updated On: Apr 07, 2017 02:48 PM IST

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योगीजी के राज में: रंग दे तू मोहे गेरुआ...

उत्तर प्रदेश में बदलाव का दौर जारी है. सत्ता बदल चुकी है. मौसम भी धीरे-धीरे बदल रहा है. पेड़ों पर लगे पुराने पत्ते झड़ रहे हैं. नए पत्ते पनप रहे हैं. पूरी आबोहवा की रंगत बदलाव में जुटी हुई है.

आधुनिक लीलाधर भी कहां पीछे रहने वाले हैं. घुटे-घुटाए लीलाधर भी अवसर देखकर अपना रंगरोगन कर चुके हैं. कल तक झक सफेद कुर्ते-पायजामे में दिखते थे. लाल, हरा और नीले रंग पर दिलोजान लुटाते थे. आज वो 'रंग दे तू मोहे गेरूआ' का राग अलाप रहे हैं.

लीलाधर का गेरुआ धारण 

'मन की बात' तो पीएम मोदी जी जानें. लीलाधर तो तन को पूरी तरह से गेरुआ रंग से ढंक चुके हैं. उनकी बातों से फिलहाल तो यही लगता है कि आने वाले पांच साल तक गेरूआ रंग से यारी गिरते-पड़ते बनी रहेगी. लीलाधर जी फिलहाल कुछ बोल नहीं रहे हैं. उनका पूरा जोर तन पर चढ़े चोले और मन की बीच द्वंद को खत्‍म करने और सामंजस्‍यता स्‍थापित करने में लगा है.

जमाना बदल गया. पुराना चोली-दामन का दौर नहीं रहा. नए जमाने में चोली और दामन की भूमिका भी बदल गई है. आज चोली की अपनी समस्‍याएं हैं और दामन पर अलग किस्‍म का संकट है. लिहाजा लाज-शर्म का चोला त्‍यागकर भगवा चोला धारण करना ही समय की मांग है.

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वैसे भी चोला बदलना हमारा राष्‍ट्रीय स्‍वभाव है. यह महज आदत नहीं, एक ध्‍येय है. यह ध्‍येय है सत्ता की हनक के लिए. सियासी संरक्षण के लिए. साथ ही इस बदलाव में भावनात्‍मक पुट भी है, रहस्‍यवाद भी है.

योग के आगे राजयोग

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इस बदलाव से राष्‍ट्रवाद पैदा होता है. योग के आगे राजयोग का मार्ग प्रशस्‍त होता है. यह बदलाव नैसर्गिक है. इसके लिए एटीएम, पेटीएम और आधार कार्ड की जरूरत नहीं पड़ती. सिर्फ 5 साल बाद रिन्‍युवल के दौरान सही चोला और सही रंग चुनने में सावधानी की आवश्‍यकता होती है.

चोला बदलने को मौकापरस्‍त कहने वाले खुद बुजदिल हैं. चोला बदलना बुजदिली नहीं. यह ब्राइट फ्यूचर के लिए 'ब्रेन ड्रेन' जैसा है. अब तो गिरगिट के रंग बदलने की भी वैज्ञानिकता सिद्ध हो चुकी है. वैज्ञानिक भी गिरगिट के रंग बदलने को उसकी रणनीतिक समझ और कुशलता बता रहे हैं.

रंग बदलना खुद गिरगिट के लिए अपमान नहीं, शौर्य सम्‍मान के समान हो चुका है. सेना के जवान भी तो 'कैमाफ्लाजिंग' के दौरान दुश्‍मन को धोखा देने के लिए 'डिसरप्टिव' कपड़े पहनते हैं. इससे दुश्‍मन को पेड़-पौधे और जवानों के बीच फर्क ना कर पाएं.

अब रंग बदलना बुजदिली नहीं शौर्य है

रंग बदलती दुनिया में चोला बदलना समयानुकूल परिवर्तन है. इतिहास गवाह है जो बदलाव को स्‍वीकार नहीं करते वो पीछे छूट जाते हैं. भूमंडलीकरण के दौर में तो बदलाव डार्विन के सिद्धांत का गुणसूत्र हो गया है. बदलाव की परंपरा इतनी सुदृढ़ हो गई है कि अब तो इसमें कल्‍ले फूटने लगे हैं. सभी बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं. मोबाइल कंपनियां बाजार में बनी रहने के लिए आए दिन अपना प्‍लान बदल रही हैं.

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गॉसिप में बने रहने के लिए हीरोइनें बॉयफ्रेंड बदल रही हैं. क्रिकेट टीम अपनी जर्सी बदल रही है. यूपी सरकार पुरानी योजनाओं का नाम बदल रही है. संघ भी कहां पीछे रह गया, वह भी सबको साथ लेने के लिए अपना गणवेश बदल चुका है. फिर चोला बदलना बुजदिली कहां रहा.

Bjp Up Narendra Modi

हवाओं का रंग गेरुआ है तो कपड़ा तो रंगा लीजिए

वैसे भी चोले को लेकर इतनी माथापच्‍ची की जरूरत नहीं. जैसे आत्‍मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है. ठीक वैसे ही सत्ता बदलने पर यह बदलाव स्‍वाभाविक है. पुरोधा राजनीतिज्ञ भी कह चुके हैं कि पार्टियां नश्‍वर शरीर जैसी हैं असली आत्‍मा सत्ता है. पार्टियां नश्‍वर है, क्षणभंगुर है. और सत्ता आत्‍मा की तरह अजर-अमर है.

पार्टी कार्यकर्ता का सुख सिर्फ माया है, ठगिनी है जबकि सत्ता का सुख शाश्‍वत है, स्‍थाई है. लिहाजा जीवन का लक्ष्‍य दलगत सिद्धांत नहीं, सत्तागत सिद्धांत होना चाहिए क्‍योंकि जीवन सागर की मंझधार को पार करने के लिए सिद्धांत से अधिक सियासी संरक्षण की जरूरत होती है.

सियासी शास्‍त्र भी यही कहते हैं कि जो चोखा हो वही रंग मलना चाहिए. खरबूजे को देखकर जब नाचीज खरबूजा रंग बदल सकता है तो फिर अनुकरण मनुष्‍य के लिए अछूता कहां रहा. मन नहीं रंग पाया तो कोई बात नहीं 'योगीजी' की तरह कपड़ा तो रंगा ही लीजिए.

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