S M L

इंटरनेट बैन: क्या राजस्थान बन रहा है दूसरा जम्मू-कश्मीर!

इंटरनेट पर पाबंदी लगाकर नागरिकों की संविधानप्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी छीनने में जम्मू-कश्मीर और राजस्थान का देश मे कोई सानी नहीं है

Mahendra Saini Updated On: Sep 19, 2017 09:59 AM IST

0
इंटरनेट बैन: क्या राजस्थान बन रहा है दूसरा जम्मू-कश्मीर!

क्या कानून व्यवस्था और शांति कायम करने के पुलिसिया तरीकों में जम्मू-कश्मीर और राजस्थान के बीच कोई समानता हो सकती है? अगर आप इसका जवाब ना में देंगे या आमतौर पर 'उपद्रवग्रस्त' कश्मीर से 'शांत' समझे जाने वाले राजस्थान की तुलना को ही बेतुका कहेंगे तो आप गलत हैं.

इंटरनेट पर पाबंदी लगाकर नागरिकों की संविधान से मिली अभिव्यक्ति की आजादी छीनने में जम्मू-कश्मीर और राजस्थान का देश मे कोई सानी नहीं है. राजस्थान इंटरनेट पर पाबंदी लगाने के मामले में देश के 27 राज्यों से आगे है. यानी वह सिर्फ जम्मू कश्मीर से पीछे है.

इंटरनेट शटडाउन के मामलों पर नजर रखने वाले सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेन्टर (sflc.in) के अनुसार सरकारी एजेंसियों के निर्देशों पर राजस्थान में अब तक 14 बार इंटरनेट को शटडाउन किया जा चुका है.

देखने मे आ रहा है कि जरा से विपरीत हालात होते ही पुलिस प्रशासन ने इंटरनेट के शटडाउन को ही कानून व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम हथियार बना लिया है.

दो हफ्ते पहले जयपुर में बवाल होने पर 48 घंटे के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया. हालांकि परेशानी होती देख ब्रॉडबैंड पर पाबंदी हटा ली गई. लेकिन 14 थाना इलाकों में 4-5 दिन तक मोबाइल इंटरनेट बैन रहा.

इसी तरह, सीकर के शांतिपूर्ण किसान आंदोलन में भी नेट बंद कर दिया गया. अगस्त में रामरहीम केस के कारण श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में 48 घंटे तक इंटरनेट बंद रहा. जुलाई में नागौर, चूरू, बीकानेर और सीकर में आनंदपाल एनकाउंटर के बाद करीब दो हफ्ते तक इंटरनेट बंद रहा.

अप्रैल में उदयपुर में पाकिस्तान समर्थित मैसेज वायरल होने के बाद इंटरनेट बंद कर दिया गया. टोंक जिले में ISIS के समर्थन में नारे लगने के बाद इंटरनेट बंद कर दिया गया.

mobile tower

हर बवाल पर इंटरनेट बैन क्यों?

सवाल ये है कि हर छोटी मोटी घटना के बाद इंटरनेट पर पाबंदी क्यों लगा दी जाती है? पुलिस के अनुसार, असामाजिक तत्व किसी भी घटना से जुड़ी अफवाह फैला कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं. जिसमें उन्हें मोबाइल इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से बड़ा सहयोग मिलता है.

इंटरनेट के व्यापक प्रसार और स्मार्टफोंस की बढ़ती संख्या के बाद ऐसा करना आसान भी हो गया है. एक गलत मैसेज व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में वायरल कर दिया जाता है और मिनटों में सड़कों पर भीड़ इकठ्ठा हो जाती है.

यह भी पढ़ें: राजस्थान में अब नहीं होंगे सरकारी स्कूल!

नाम न छापने की शर्त पर राजस्थान पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि 2015 में गृह विभाग के दिशा-निर्देश पर तय किया गया कि सांप्रदायिक तनाव की आशंका के समय धारा 144 के तहत इंटरनेट को भी सस्पेंड कर दिया जाए. हालांकि इसके लिए होम सेक्रेटरी की मंजूरी जरूरी है.

बीजेपी वाले राज्यों में ज्यादा है बैन!

ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ राजस्थान में हो रहा हो. SFLC के अनुसार, इंटरनेट को सस्पेंड करने की शुरुआत सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में हुई. पिछले 5 साल में ऐसी कोशिशें सबसे ज्यादा वहीं पर हुई हैं, करीब 53 बार. हरियाणा में 11 बार ऐसा किया जा चुका है. गुजरात में भी 10 बार यही देखा गया है.

आजादी पर पाबंदी की इन कोशिशों से जुड़ा एक तथ्य और भी चौंकाने वाला है. इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पाबंदी लगाने वाले राज्यों में सबसे ऊपर वो हैं, जहां बीजेपी की सत्ता है. जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात ऐसे ही कुछ राज्य हैं.

ह्यूमन राइट्स वाच के अनुसार, इंटरनेट पर पाबंदी के मामले में भारत दुनिया मे नंबर एक पर है यानी इराक-सीरिया जैसे देशों से भी काफी आगे. बताया जाता है कि इस साल पहले 8 महीने में ही करीब 42 बार इंटरनेट को शटडाउन करवाया जा चुका है.

यह भी पढ़ें: नो वन किल्ड पहलू खान: पुलिस ने मौत से पहले दिए बयान को भी झुठला दिया

इंटरनेट पर पाबंदी के बढ़ते मामलों के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायोग तक भारत सरकार को चिट्ठी लिख चुका है. देश मे नेट न्यूट्रलिटी आंदोलन चलाने वाले इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन इंडिया ने भी इस संबंध में 'डोंट शट इंडिया डाउन' मुहिम चलाई है.

अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार पहले ही कटघरे में है. भगवा विचारधारा के विरोधी बुद्धिजीवियों की हत्याएं सुर्खियां बनी हुई हैं तो खाने-पीने की आदतों को नियंत्रित करने की कोशिशों को लेकर भी बीजेपी सरकारें निशाने पर हैं.

निजता के अधिकार पर तो खुद सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ऐतिहासिक फैसला दिया है. इसके बावजूद देखने में आ रहा है कि विरोध/विपक्ष की आवाज दबाने के लिए सत्ता नित नए फॉर्मूले ला रही है.

social-media

आजादी पर पाबंदी मतलब पतन निश्चित है!

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक स्वस्थ, जीवंत और गतिशील समाज वहीं हो सकता है जहां अपने विचारों को रखने की पूरी आजादी हो. भारतीय परंपरा यही रही है कि हर नजरिए को परस्पर सम्मान दिया जाए क्योंकि कोई भी एक विचार या दृष्टिकोण पूर्ण सत्य नहीं होता.

जैन दर्शन का स्यादवाद और अनेकान्तवाद भी यही कहता है कि सिर्फ अपने पक्ष को ही पूरा सच मान लेना कट्टरता की तरफ ले जाता है. आगे चलकर यही समाज के पतन का कारण बन जाता है.

शिकागो धर्म सम्मेलन की 125वीं वर्षगांठ हम मना रहे हैं. खुद विवेकानंद ने शिकागो में 4 नेत्रहीनों द्वारा हाथी की अलग-अलग व्याख्या और उसे ही सच मान लेने की कहानी सुनाकर अमेरिकियों को मुग्ध कर दिया था. इसका सार भी यही था कि प्रगतिशील और स्वस्थ समाज का सबसे बड़ा दुश्मन विचारों पर पहरा ही है.

इसके बावजूद छोटे मोटे विवादों से निबटने के लिए स्वतंत्रता का हनन यानी इंटरनेट पर पाबंदी का सहारा लिया जाना आम होता जा रहा है. जबकि इसके साइड इफ़ेक्ट भी कम नहीं हैं. जानकारों के मुताबिक, भारत की GDP में इंटरनेट का योगदान 5.5% से ज्यादा है. 2016 में शटडाउन से अर्थव्यवस्था को 6,000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ. आर्थिक-व्यापारिक हानि के अलावा पत्रकारों, छात्रों और मरीजों को भी खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इंटरनेट का सस्पेंशन, हिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगड़ने से रोकने का एकमात्र उपाय भी नहीं है. इसके बजाय दक्षिण भारतीय राज्यों से सबक लिया जा सकता है. कावेरी जल विवाद के दौरान

बेंगलुरु पुलिस ने शांति बहाली के लिए सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया. मुम्बई के पूर्व कमिश्नर राकेश मारिया ने भी अपनी किताब में बताया है कि कैसे सांप्रदायिक हिंसा की आशंका वाली कुछएक घटनाओं में इंटरनेट और सोशल मीडिया सहायक बना.

आज इंटरनेट भावनाओं को व्यक्त करने का साधन ही नहीं बल्कि जिंदगी की जरूरत बन चुका है. फिर भारत को डिजिटल इंडिया में ट्रांसफॉर्म करने के प्रयासों में क्या इंटरनेट पर बढ़ती पाबंदी रोड़ा नहीं है?

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi