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इसलिए मोदी को अमर्त्य सेन की बातों पर ध्यान देना चाहिए...

मोदी सरकार को सेन की आलोचना पर ध्यान देना चाहिए और इससे सबक लेना चाहिए.

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Jan 13, 2017 05:24 PM IST

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इसलिए मोदी को अमर्त्य सेन की बातों पर ध्यान देना चाहिए...

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फैसले को ‘भारी गलती’ बताया है.

सेन के मुताबिक भ्रष्टाचार से निपटने और अर्थव्यवस्था को रातोंरात कैशलेस बनाने, दोनों ही उद्देश्यों के लिहाज से नोटबंदी बड़ी गलती है. लेकिन वह यह भी बताते हैं कि क्यों नोटबंदी को लंबे समय तक कभी मोदी की नाकामी नहीं माना जाएगा.

सेन ने इंटरव्यू में कहा, 'मोदी बहुत अच्छे राजनेता हैं, इस बात में कोई शक नहीं है. निश्चित तौर पर वह लोगों को भरोसा दिला सकते हैं कि मोदी का जादू चल रहा है. लोग समझते हैं कि प्रधानमंत्री काले धन को खत्म करने के लिए कदम उठा रहे हैं. मोदी को संदेह का लाभ मिलता रहेगा. बात ये है कि अमीर लोगों को तकलीफें सहते देख गरीबों को बहुत मजा आ रहा है.'

समझ से परे नोटबंदी

सेन मोदी के नोटबंदी के फैसले को नुकसानदेह बताते हैं और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की स्वायत्तता को कमजोर करने के लिए सरकार की आलोचना भी करते हैं. इस सिलसिले में वह निम्नलिखित बातों को उठाते हैं.

पहली बात, सब जानते हैं कि नकदी का सिर्फ 6 से 7 प्रतिशत ही काला धन है (ऐसा कैश जिसका कोई हिसाब नहीं है). फिर भी मोदी ने क्यों 86 प्रतिशत नोटों को रद्दी में तब्दील करने का फैसला लिया और अर्थव्यवस्था को जोखिम में डाल लिया? सेन पूछते हैं, 'इन आंकड़ों को सब जानते हैं और ये प्रधानमंत्री को भी पता होंगे. अगर नकदी में सिर्फ 6 से 7 प्रतिशत ही काला धन है, तो आप किसी बड़ी जीत की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यह बात मेरी समझ में नहीं आती.'

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दूसरी बात, नोबेल विजेता उस फैसले पर सवाल उठाते हैं जिसकी वजह से 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा हुई. कई अहम राज्यों में चुनाव से ठीक पहले इस घोषणा की टाइमिंग पर भी वह सवाल खड़ा करते हैं. वह पूछते हैं, 'पूरी केंद्र सरकार भी नहीं बल्कि एक छोटा सा समूह मोदी के इर्द गिर्द है. इसलिए यहां पर सबसे बड़ा सवाल है कि राज्यों के विधानसभा चुनाव आने वाले है, तो क्या संघवाद से जुड़ा भी कोई मुद्दा है जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है?'

मोदी की जवाबदेही

तीसरी बात, सेन मानते हैं कि जाली मुद्रा कभी भारत के लिए समस्या नहीं रही है और इसीलिए उसे खत्म करने के लिए अर्थव्यवस्था को दांव पर लगा देने की कोई जरूरत नहीं थी.

चौथी बात, सेन ने एक संस्थान के तौर पर आरबीआई की स्वायत्तता को कमजोर करने के लिए सरकार और खुद आरबीआई पर जोरदार हमला बोला है. वह कहते हैं, 'मैं नहीं समझता कि यह आरबीआई का फैसला है.. मुझे नहीं लगता कि आरबीआई इस समय कोई फैसला ले रही है.' उन्होंने कहा कि रघुराम राजन के समय में आरबीआई खासी स्वतंत्र थी.

नोबेल विजेता सेन अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले अर्थशास्त्री और अकादमिक शख्सियत हैं. इसलिए उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, वे मोदी सरकार के लिए आंख खोलने वाले होने चाहिए.

सेन अकेले अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री नहीं हैं, जिसने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाया है. सेन की कही बातों का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है. प्रधानमंत्री ने कुछ विशेष मुद्दों पर संसद को अभी तक जवाब नहीं दिया है. इन मुद्दों में नोटबंदी के उद्देश्य और तौर तरीकों में बदलाव करना, नकदी निकालने की सीमा पर अनिश्चितता के साथ साथ यह बताना भी शामिल है कि हालात सामान्य कब होंगे. इस बारे में भी जानकारी दी जानी बाकी है कि नोटबंदी का विचार कैसे आया (खासकर तब जब इस बारे में सरकार और आरबीआई की भूमिका को लेकर स्पष्टता नहीं है.)

आरबीआई भी लाचार

यहां तक कि आरबीआई को भी हालात का कोई अता पता नहीं है. एक आरटीआई के जबाव में मिली जानकारी के आधार पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई के पास कोई हिसाब नही है कि नोटबंदी बाद के कितने नकदी छापी गई है.

इससे भी अहम बात यह है कि सरकार अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नोटबंदी के असर को बहुत कम करके बता रही है. उसका कहना है कि बस कुछ समय के लिए परेशानी होगी. लेकिन इस परियोजना से होने वाले दीर्घकालीन फायदों के बारे में भी पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है.

Source: Getty Images

एक ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है, “बड़े नोटों को बंद करने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ समय के लिए बाधा आई है जिसके कारण हमने 2017 के लिए वृद्धि के अनुमान में कमी की है. इस कदम के कुछ संभावित फायदे हो सकते हैं, लेकिन लगता नहीं है कि ये सकारात्मक प्रभाव इतने मजबूत या दीर्घकालीन होंगे कि सरकारी वित्त या मध्य अवधि वृद्धि की संभावनाओं में कोई बड़ा फेरबदल कर सकें.” चूंकि बंद किए गए नोटों में 97 फीसदी नोट बैंकिंग प्रणाली में आ गए हैं, ऐसे में इस पूरी कवायद से होने वाले फायदे इस बात पर निर्भर करेंगे कि टैक्स विभाग बैंकों में जमा होने वाल पैसे से आखिरकार कितना टैक्स हासिल कर पाता है.

पटरी पर लाएं अर्थव्यवस्था

साफ तौर पर सरकार को सबसे पहले नोटबंदी से पैदा आर्थिक गतिरोध से निपटने की जरूरत हैं और कामयाबियों का दावा करने से पहले अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहिए. जैसा कि इस लेखक ने पहले अपने एक लेख में लिखा हैं.

सरकार के इस दावे में दम नहीं दिखता कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को कोई नुकसान नहीं हुआ हैं क्योंकि जमीनी सतह पर मिलने वाले सबूत कुछ और ही कहानी कह रहे हैं.

अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान के आलावा ये धारणा भी उतनी ही गंभीर समस्या हैं कि मोदी सरकार ने आरबीआई की स्वायत्तता को पूरी तरह कमजोर किया हैं. आरबीआई की विश्वसनीयता जाने से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. ऐसे में, मोदी सरकार को सेन की आलोचना पर ध्यान देना चाहिए और इससे सबक लेना चाहिए.

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