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ई-पेमेंट और डिजिटाइजेशन के नाम पर हवा में उड़ रही है सरकार

समझ में नहीं आता कि सरकार ई-पेमेंट और डिजिटाइजेशन को इतना मुश्किल क्यों बना रही है?

RN Bhaskar RN Bhaskar Updated On: Feb 21, 2017 09:11 AM IST

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ई-पेमेंट और डिजिटाइजेशन के नाम पर हवा में उड़ रही है सरकार

ई-पेमेंट और डिजिटाइजेशन दो ऐसी बातें हैं, जिन पर अमल होना अच्छी बात है. लेकिन इन्हें लागू करने के लिए एक अच्छी योजना बनाने की जरूरत होती है. इसे लागू करने में कई संस्थाओं से आदेश जारी होने से भी दिक्कत होती है और इसे लागू करने के नियम जितने आसान हों उतना ही अच्छा.

मगर ऐसा लगता है कि ई-पेमेंट की जोर-शोर से चर्चा कर रही सरकार ने इन बुनियादी बातों से किनारा कर लिया है.

कुछ दिन पहले रिजर्व बैंक ने ई-पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट के नियम का ड्राफ्ट जारी किया था, ताकि मौजूदा नियमों में फेरबदल किया जा सके. ये विचार तो बहुत अच्छा है. रिजर्व बैंक ऐसे लेन-देन को सस्ता बनाना चाहता है. ताकि छोटे कारोबारी भी इसे अपना सकें.

जो ड्राफ्ट रिजर्व बैंक ने जारी किया है वो कारोबारियों को चार दर्जों में बांटता है-

1. वो छोटे कारोबारी जिनका सालाना कारोबार बीस लाख से कम है.

2. सरकारी लेन-देन.

3. खास दर्जे के कारोबारी (मसलन-अस्पताल, शिक्षण संस्थान और दूसरी सेवाएं), बीमा, म्युचुअल फंड, सेना की कैंटीन, राज्य के परिवहन, जिसमें जल परिवहन, कृषि और दूसरी सेवाएं भी शामिल हैं.

4. वो बाकी कारोबारी जिनका सालाना कारोबार बीस लाख रुपए से ज्यादा का है.

छोटे कारोबारी और लेन-देन की स्पेशल कैटेगरी में आने वाली संस्थाओं को 0.4 फीसद से ज्यादा एमडीआर नहीं देना होगा. ऑनलाइन लेन-देन के लिए इस दर्जे में आने वालों को 0.3 फीसद से ज्यादा एमडीआर का भुगतान नहीं करना होगा. वहीं बड़े कारोबारियों को इसी लेन-देन के लिए 0.95 और 0.85 प्रतिशत एमडीआर का भुगतान करना होगा.

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सरकारी ई-पेमेंट और ऑनलाइन खरीद-फरोख्त में एक हजार रुपए तक पर सिर्फ पांच रुपए देने होंगे. एक हजार से दो हजार तक के लेन-देन पर दस रुपए एमडीआर देना होगा. और इसके ऊपर के हर भुगतान पर 0.5 फीसद एमडीआर की दरों का प्रस्ताव रिजर्व बैंक ने रखा है.

ये प्रस्ताव वाहियात है

पहला सवाल तो ये है कि रिजर्व बैंक ने ई-पेमेंट और ऑनलाइन लेन-देन के लिए इतने दर्जे ही क्यों बनाए हैं? आखिर क्यों रिजर्व बैंक ने एक हजार रुपए तक के लेन-देन के लिए 0.4 फीसद का एमडीआर नहीं तय किया. इससे ऊपर के लिए 0.95 फीसद का रेट तय किया जा सकता था.

अब आप अलग-अलग दरें रखेंगे तो छोटे कारोबारियों को ई-पेमेंट और ऑनलाइन लेन-देन के लिए दो अलग-अलग दुकानें खोलनी होंगी. एक में वो सालाना बीस लाख रुपए से कम का कारोबार दिखाएंगे. आखिर जिंदगी को इतना पेचीदा बनाने की क्या जरूरत है?

दूसरी बात ये कि सरकारी लेन-देन के लिए एक ही दर क्यों? यहां ये याद रखने वाली बात है कि ज्यादातर सरकारी भुगतान सौ से दो सौ रुपए तक के होते हैं. अब अगर इन पर फ्लैट रेट पांच रुपए है तो इसका मतलब ये है कि ग्राहक को 2.5 से 5 फीसद तक एमडीआर देना होगा. ये दर तो निजी भुगतान की दरों से बहुत ज्यादा है.

कई मामलों में सिर्फ सरकार की मोनोपोली है, तो जाहिर है उन सेक्टर्स में लेन-देन बहुत ज्यादा होगा. ऐसे में एमडीआर की दरें भी कम होनी चाहिए. मगर अलग-अलग स्लैब तय करके रिजर्व बैंक ने सरकारी संस्थाओं की मुनाफाखोरी का रास्ता खोल दिया है. इसका खामियाजा ग्राहक को उठाना पड़ेगा.

रिजर्व बैंक के इस कदम से ये संदेश भी जाता है कि सरकार, निजी कंपनियों के मुकाबले हर ई-पेमेंट पर ज्यादा एमडीआर वसूल सकती है.

ग्राहक क्यों भरे ई-पेमेंट की फीस?

सबसे बुरी बात तो ये है कि ई-पेमेंट की ये फीस ग्राहक को देनी होगी, कारोबारी या सरकारी संस्थाओं को नहीं. यानी सरकार चाहती है कि कारोबारी, ई-पेमेंट से लेन-देन बढ़ाए, मुनाफा कमाए, मगर उस पर टैक्स न भरे. इसका बोझ ग्राहक के सिर डालना कोई अच्छी परंपरा तो नहीं है.

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चौथी बात ये कि रिजर्व बैंक के इन दिशा-निर्देशों से नए-नए विवाद खड़े होंगे. क्या होगा जब कोई सेवा देने वाली संस्था आधी सरकारी और आधी निजी क्षेत्र के मालिकाना हक वाली होगी? जैसे कि राज्यों के बिजली बोर्ड या नगर निगम जो पानी पर टैक्स वसूलते हैं. इन पर सरकारी संस्था वाले नियम लागू होंगे या निजी क्षेत्र वाले?

रिजर्व बैंक का ड्राफ्ट उन निजी कारोबारियों पर खामोश है जो डेबिट या क्रेडिट कार्ड से नगर निगम के भुगतान नहीं करने देते.

ऐसी ही एक मिसाल है PayU.in कई नगर निगम इसका इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इन नगर निगमों के पोर्टल पर आप तब तक डेबिट या क्रेडिट कार्ड से भुगतान नहीं कर सकते, जब तक आप Upay की सेवाएं न लें.

तो क्या रिजर्व बैंक ऐसी निजी कंपनियों को ग्राहकों से जबरन वसूली करने का माहौल बना रहा है?

एक ही काम के दो मालिक

रिजर्व बैंक के ड्राफ्ट में एक और बेहद वाहियात बात है. वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा था कि ई-पेमेंट की निगरानी के लिए सरकार एक रेगुलेटर तय करेगी. साफ है कि ई-पेमेंट का मामला वित्त मंत्रालय के दायरे में आना चाहिए था. जैसे कि दूसरे वित्तीय रेगुलेटर हैं. मसलन SEBI, AMFI और IRDA

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लेकिन कुछ दिन पहले कैबिनेट सचिवालय ने एक आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि, 'डिजिटल लेन-देन का प्रसार सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की जिम्मेदीर होगी'.

ये तो और भी वाहियात बात है. बैंकिग का प्रोटोकाल रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के पास है, जबकि ये लोग फोन और मोबाइल के अलावा इंटरनेट का भी इस्तेमाल करते हैं. अगर कोई नियम तोड़ता है तो बैंक या रिजर्व बैंक उनके खिलाफ कार्रवाई करते हैं. ई-पेमेंट के मामले में भी यही होना चाहिए. उसमें सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय का क्या काम है?

अब अगर कोई साइबर धोखाधड़ी होती है, तो उसका हल वित्त मंत्रालय और आईटी मंत्रालय मिलकर निकालेंगे. समझ में नहीं आता कि सरकार ई-पेमेंट और डिजिटाइजेशन को इतना मुश्किल क्यों बना रही है?

ये बात किसी को तो देश के नागरिकों को समझानी चाहिए.

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