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सरकारी अस्पतालों में क्यों नहीं टिक पा रहे हैं डॉक्टर?

डॉक्टरों के लगातार हो रहे पलायन को रोकने के लिए देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को आगाह किया है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Aug 10, 2017 05:38 PM IST

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सरकारी अस्पतालों में क्यों नहीं टिक पा रहे हैं डॉक्टर?

देश में जहां एक तरफ सरकारी स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने की कवायद चल रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों से डॉक्टरों का पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है.

देश के सबसे बड़े अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से लेकर जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों तक डॉक्टरों का इस्तीफा देने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है.

नेशनल हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट के अनुसार सरकारी अस्पतालों में एलोपैथी डॉक्टरों की कुल संख्या 1 लाख 6 हजार के आस-पास है.

देश की मौजूदा जनसंख्या को देखते हुए लगभग छह लाख डॉक्टरों की कमी है. इसके बावजूद बड़े पैमाने पर डॉक्टर्स सरकारी सेवा छोड़ कर निजी क्षेत्र की तरफ जा रहे हैं.

कम वेतन पर काम करने को मजबूर डॉक्टर

डॉक्टरों के लगातार हो रहे पलायन को रोकने  के लिए देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को आगाह किया है. मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों को डॉक्टरों की सेवा शर्तों और उनके वेतनमान में सुधार करने की सख्त हिदायत दी है.

मंत्रालय के मुताबिक अगर राज्य सरकारें इसमें जल्द सुधार नहीं करतीं तो आने वाले समय में देश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या में भारी कमी आ जाएगी.

इस मामले पर जब फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने केंद्रीय स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ जगदीश प्रसाद से बात की तो उनका जवाब था, ‘देखिए हमने राज्य सरकारों को कहा है कि कम सैलेरी रखोगे तो कौन डॉक्टर रहेगा. बिहार जैसे कई और राज्य हैं जहां डॉक्टरों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाता है. ऐसे राज्य डाक्टरों की स्थाई बहाली करें और डॉक्टरों को रहने की सुविधा भी दें. अगर ये सारी सुविधाएं मिलेंगी तो कोई क्यों छोड़ कर जाएगा.’

जगदीश प्रसाद

जगदीश प्रसाद

जगदीश प्रसाद आगे कहते हैं, ‘देखिए तीन चीजें हैं जिसको राज्य सरकारों को सुधारने के लिए कहा गया है. पहला वर्किंग एनवायरनमेंट बढ़िया किया जाए, हॉस्पिटल्स के इंफ्रास्ट्रक्चर और वेतनमान की वर्तमान स्थिति में सुधार किया जाए. हमने राज्य सरकारों को सातवें वेतन आयोग को लागू करने की भी बात लिखी है, जिसे अभी तक लागू नहीं किया गया है. कुल मिला कर मेरा यह कहना है कि डॉक्टरों का वेतन बढ़ना ही चाहिए.’

राज्य सरकारें पैसा बचाने के लिए जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों में अस्थाई नियुक्तियां करती हैं. बिहार जैसे देश के कई और राज्य हैं जहां पर डॉक्टरों को समय पर वेतन भी नहीं दिया जाता. ऐसे में उन्हें सरकारी सेवा छोड़ने से रोकना संभव नहीं है.

जगदीश प्रसाद के अनुसार देश में निजी अस्पतालों के विस्तार के कारण सरकारी डॉक्टर निजी क्षेत्र में अच्छे पैकेज पर जा रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय का अनुमान है कि हर साल देश में 3 हजार से लेकर 5 हजार डॉक्टर सरकारी सेवा छोड़ रहे हैं. इसमें रिटायर होने वाले डॉक्टर, विदेश और निजी क्षेत्र में जाने वाले डॉक्टर भी शामिल हैं.

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कुछ डाक्टरों का मानना है कि देश में सातवें वेतन आयोग लागू होने के बाद डॉक्टरों का वेतन नर्सों के वेतन से भी कम हो गया है. इतनी सारी विसंगतियां हैं जो डॉक्टरों को निजी क्षेत्र में जाने को मजबूर कर रहा है.

राज्यों में भी मरीजों को मुफ्त में बेहतर स्वास्थ सुविधा मिले

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स से हाल ही में स्वेच्छिक सेवानिवृत्त लेने वाले डॉक्टर राज्यवर्धन आजाद का कहना है कि सरकारी सेवा छोड़ने के तीन कारण हैं. पहला, काम और प्रोन्नति के बेहतर मौके नहीं मिलना. दूसरा, अपना अस्पताल या क्लीनिक शुरू करना. तीसरा, अधिक पैसे के लिए निजी क्षेत्र में जाना.

केंद्र सरकार ने पिछले दिनों ही लोकसभा में कहा था कि भारत में प्रति एक हजार की जनसंख्या पर एक से भी कम डॉक्टर हैं. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंड से काफी कम है.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के मुताबिक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) में 31 मार्च 2017 तक कुल 10 लाख 22 हजार 859 डॉक्टरों का पंजीकरण था.

भारत की मौजूदा अनुमानित जनसंख्या करीब 1.33 अरब की स्थिति में डॉक्टरों और नागरिकों का अनुपात 0.62:1000 है.

हम अगर दूसरे देशों की बात करें तो प्रति हजार लोगों पर डॉक्टरों का अनुपात ऑस्ट्रेलिया में 3.374, ब्राजील में 1.852, चीन में 1.49, रूस में 3.306, अमरीका में 2.554, अफगानिस्तान में 0.304, बांग्लादेश में 0.389 और पाकिस्तान में 0.806 है.

देश की मौजूदा केंद्र सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य विभाग को दुरुस्त करने की चाहे जितनी भी कवायद करने का दावा कर रही हो लेकिन, इन दावों को पूरा कर पाना कोई आसान काम नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में तैनात किए गए डॉक्टरों का पलायन.

सरकार की तरफ से स्वास्थ्य सेवा बेहतर बनाने के लिए रोज नए फरमान जारी करना महज एक औपचारिकता भर ही है. सरकारी डॉक्टरों को प्राइवेट प्रेक्टिस पर रोक लगाने की भी आए दिन खबर आती रहती है.

लेकिन, इससे होता कुछ भी नहीं. राज्य सरकारें जब-जब कड़ाई करती हैं डॉक्टर सकते में आ जाते हैं. डॉक्टर इस्तीफा देकर निजी प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं या फिर निजी अस्पताल को ज्वाइन कर लेते हैं.

देश की स्वास्थ्य मंत्रालय की लगातार मंशा है कि राज्यों में भी मरीजों को मुफ्त में बेहतर स्वास्थ सुविधा मिले. लेकिन, इसके लिए आवश्यक है कि डॉक्टरों को उचित माहौल और बेहतर सुविधा मिले.

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