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आखिर किसका विकास हो रहा है देवभूमि उत्तराखंड में!

अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड को अपने बेतरतीब विकास और व्यापक भ्रष्टाचार के लिए शोहरत मिली

Nazim Naqvi | Published On: Jun 26, 2017 07:30 PM IST | Updated On: Jun 26, 2017 09:18 PM IST

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आखिर किसका विकास हो रहा है देवभूमि उत्तराखंड में!

पिछले कुछ दिनों में उत्तराखंड की दो खबरों ने एक बार फिर उन स्थितियों पर पुनः विचार करने की बहस छेड़ दी है जिनकी वजह से देवभूमि की जनता ने एक अलग राज्य की जरूरत महसूस की थी.

पहली खबर, स्वास्थ विभाग ने अभी हाल ही में चिकित्सकों के 240 तबादले किए थे. इनमें से 170 तबादले पहाड़ों के हैं लेकिन आदेश के बावजूद 170 डॉक्टरों ने आदेशित अस्पतालों में अपनी आमद दर्ज नहीं कराई है. कोई चिकित्सक उन दुर्गम स्थानों पर नहीं जाना चाहता.

कोई बीमारी का बहाना कर रहा है, तो कोई तबादले के विरोध में न्यायालय में फ़रियाद लेकर पहुंच गया है. इस बीच मानसून ने भी अपनी दस्तक दे दी है, जिसे आवागमन की कठिनाई के रूप में, एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा.

हाई कोर्ट को गुस्सा क्यों आया?

दूसरी खबर, उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने के अदालती आदेश के बावजूद सरकार की नाकामी पर हाई कोर्ट को इस हद तक गुस्सा आया कि उसने पूरे सरकारी तंत्र को ही अपने आदेश में लपेट लिया.

उत्ताराखंड हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और आलोक सिंह की खंडपीठ ने गुरुवार को दिए अपने एक आदेश में कहा, 'चूंकि राज्य सरकार बेंच, डेस्क, ब्लैकबोर्ड, लड़कों और लड़कियों के लिए स्वच्छ शौचालयों, साफ-पानी के उपकरणों और सीलिंग फैन जैसी न्यूनतम सुविधाएं विद्यालयों को प्रदान करने में बुरी तरह विफल रही है, इसलिए राज्य सरकार को, इस अदालत के अगले आदेश तक शानदार कारों, फर्नीचर और एयर कंडीशनर आदि खरीदने से रोका जाता है.'

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि “क्या आपके अधिकारी गद्देदार कुर्सियों पर नहीं बैठते हैं तो विद्यार्थियों को कुर्सियां क्यों नहीं नसीब?'

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उत्तराखंड का एक पहाड़ी गांव (फोटो: फेसबुक से साभार)

आखिर अलग राज्य के लिए लंबे संघर्ष से क्या मिला? 

एक लंबे संघर्ष के बाद, उत्तर प्रदेश से अलग होकर, वर्ष 2000 में उत्तराखंड, देश का 27 वां राज्य बना था. उम्मीद की गई थी कि पहाड़ का संचालन जब पहाड़ी नेतृत्व के पास आएगा तो राज्य की देखरेख बेहतर ढंग से होगी. मजबूत आशावाद था कि एक अलग राज्य के निर्माण के साथ पहाड़ी जिलों में अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे.

मगर, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और उत्तराखंड को अपने बेतरतीब विकास और व्यापक भ्रष्टाचार के लिए शोहरत मिली. नतीजा ये हुआ कि नौकरियों की कमी और नए रोज़गार पैदा करने में नाकामयाब उत्तराखंड से लोगों ने पलायन शुरू कर दिया.

बिना डॉक्टर के अस्पताल, बिना शिक्षक और बुनियादी ढांचे के स्कूल और मौसम की मार झेलती दुर्गम पहाड़ी बस्तियों को छोड़कर लोग या तो देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे तराई क्षेत्रों में बस रहे हैं या दूसरे राज्यों कि तरफ कूच कर रहे हैं.

हालांकि कोई औपचारिक संख्या नहीं है, फिर भी यह अनुमान है कि कम से कम एक करोड़ उत्तराखंडी, जो कि वर्तमान जनसंख्या जितने ही हैं, रोजगार के अवसरों की कमी और बुनियादी असुविधाओं के मद्देनजर खुद को अपने ही घरों से दूर रहने पर मजबूर हैं.

एक आंकड़े के मुताबिक, 2001 से 2011 के दौरान राष्ट्रीय जनसंख्या 17 प्रतिशत बढ़ी और उत्तराखंड की 19 प्रतिशत वृद्धि हुई. यह विकास मुख्य रूप से देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर के जिलों में हुआ, जहां आबादी में 33% वृद्धि देखी गई.

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पलायन और विस्थापन के चलते गांव के गांव वीरान हो गए हैं (फोटो: फेसबुक से साभार)

पिछले बरस राज्य की 16वीं वर्षगांठ के मौके पर राज्यपाल डॉ. कृष्णकांत पाल ने प्रदेश सरकार को आईना दिखाते हुए कहा था, 'प्रदेश में बहुत कुछ तो किया गया है, लेकिन जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाया है. प्रदेश में लिंगानुपात घट रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं में अभी प्रदेश बहुत पीछे है. रोजगार पर ध्यान केंद्रित करने की सख्त ज़रुरत है.'

उत्तराखंड सिर्फ देहरादून, हरिद्वार, बदरीनाथ, ऋषिकेश जैसे ऊंगली पर गिने जाने वाले चंद मशहूर स्थानों का ही नाम नहीं है. उत्तराखंड, पहाड़ के दूर-दराज क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं से वंचित और भगवान भरोसे रह रही एक बड़ी आबादी का नाम भी है. उत्तराखंड की आत्मा उन्हीं में बस्ती है.

आखिर किसका विकास हो रहा है?

अपनी गाड़ी से उतरकर, सड़क छोड़कर, ऊंचे-नीचे रास्तों पर कुछ दूर आगे निकल कर अगर आपकी मुलाक़ात किसी पहाड़ी बाशिंदे से हो जाए और आप कहीं उससे पूछ बैठें कि पिछले 16-17 वर्षों में उत्तराखंड ने क्या विकास किया है? तो यह अजीब बात नहीं होगी कि वो चेहरे पर आई पीली सी मुस्कराहट के साथ ये कह पड़े कि ‘विकास क्यों नहीं हुआ, कौन कहता है कि विकास नहीं हुआ, नौकरशाहों को देखिए, ठेकेदारों को, नेताओं को देखिए, आपको विकास के दर्शन हो जाएंगे.'

यही लोग पहले भी विकास कर रहे थे. अलग राज्य बनने के बाद अंतर सिर्फ इतना आया है कि पहले ये वर्ग कहीं से भी आकर यहां विकास करता था, अब सारे लोग यहीं के यानी उत्तराखंड के ही हैं.

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