S M L

क्या है लालू परिवार के संकट की वजह बना बेनामी संपत्ति कानून?

आयकर विभाग ने लालू यादव के परिवार के खिलाफ बेनामी लेन-देन कानून के तहत आरोप लगाए हैं

Nyaaya | Published On: Jul 12, 2017 08:18 AM IST | Updated On: Jul 12, 2017 11:51 AM IST

0
क्या है लालू परिवार के संकट की वजह बना बेनामी संपत्ति कानून?

शायद आपने खबर में बेनामी लेन-देन के बारे में सुना होगा. हाल ही में समाचार में यह बताया गया कि आयकर विभाग ने लालू यादव के परिवार के खिलाफ बेनामी लेन-देन कानून के तहत आरोप लगाए हैं. बेनामी शब्द सुनना आम बात है जब हम भ्रष्टाचार या आय के अनुपात में अधिक संपत्ति से जुड़ा कोई समाचार सुनते हैं. इसका क्या मतलब है और इसके संदर्भ मैं कानून कैसे काम करता है? चलिए पता करते हैं.

बेनामी क्या होता है?

बेनामी का शाब्दिक अर्थ है ‘कोई नाम नहीं’. यह एक लेन-देन है जिसमें वास्तविक लाभार्थी और वह व्यक्ति जिसके नाम पर संपत्ति खरीदी जाती है अलग होते हैं. नतीजतन, जिस व्यक्ति के नाम संपत्ति खरीदी जाती है, वह वास्तविक लाभार्थी का मुखौटा मात्र है.

उदाहरण के लिए राज अपने दोस्त रशीद के नाम पर एक संपत्ति खरीदता है, जहां पैसे का भुगतान राज ने किया है और रशीद को इस संपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है या यदि आशा सुमन के नाम पर एक संपत्ति खरीदती है, जहां सुमन एक काल्पनिक चरित्र है जो की अस्तित्व में नहीं है.

इसमें पति/पत्नी या बच्चे के नाम पर ली गई संपत्ति, जिसकी भुगतान राशि, आय के ज्ञात स्त्रोतों से दी जाए, शामिल नहीं है. भाई, बहन या अन्य रिश्तेदारों के साथ ली गई संयुक्त संपत्ति जिसके लिए राशि का भुगतान आय के ज्ञात स्रोतों से किया जाता है, वह भी बेनामी संपत्ति के अंतर्गत नहीं आएगी. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, बेनामी लेन-देन भुगतान करने वाले को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है.

सीबीआई रेड के बाद लालू प्रसाद यादव के घर के बाहर पसरा सन्नाटा (फोटो: पीटीआई)

सीबीआई रेड के बाद लालू प्रसाद यादव के घर के बाहर पसरा सन्नाटा (फोटो: पीटीआई)

बेनामी लेन-देन पर कानून क्या कहता है? यह कैसे काम करता है?

बेनामी लेन-देन से संबंधित कानून को बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988 कहा जाता है. इस अधिनियम को और प्रभावी बनाने के लिए गत वर्ष इसमें संशोधन किया गया था. कानून के अनुसार सरकार अब खरीददार या बेनामदार को मुआवजा दिए बिना ही बेनामी संपत्ति को जब्त कर सकती है.

बेनामी लेन-देन करने के लिए 7 साल तक जेल की सज़ा हो सकती है और संपत्ति के मूल्य के 25 फीसदी तक का जुर्माना भी हो सकता है. कानून इस अधिनियम के तहत अधिकारियों को झूठी जानकारी देने या झूठे दस्तावेज देने पर भी दंडित करता है. अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे 5 साल की जेल की सजा हो सकती है और संपत्ति के मूल्य के 10 फीसदी तक का जुर्माना भी हो सकता है.

यह कैसे निर्धारित किया जाए कि क्या कोई संपत्ति बेनामी संपत्ति है या नहीं?

संपत्ति की वास्तविक स्थिति का निर्धारण सक्षम अधिकारी ही कर सकते हैं . हालांकि कुछ कारक हैं जिन पर विचार किया जा सकता है , जैसे कि: संपत्ति के भुगतान के लिए उपयोग किए गए फंड के सूत्र खरीददार द्वारा प्रकट किए गए हैं या नहीं.

किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर (जैसे की पति या पत्नी, बच्चों, भाई बहन आदि) संपत्ति खरीदने के पीछे अभिप्राय.

यह भी पढ़ें: बेनामी एक्ट: दोषी पाए गए तो 7 साल कटेंगे जेल में

संपत्ति का वास्तविक कब्जा और संपत्ति के दस्तावेजों के संरक्षक होना.

आयकर रिटर्न दाखिल करते समय संपत्ति से आय का खुलासा, यदि कोई हो तो.

ऊपर दिए गए सवालों से पता चलता है कि यदि सरकारी योजनाएं, हितों, छूट आदि के तहत विभिन्न लाभ लेने के लिए संपत्ति खरीदी जाती है और काले धन या छलपूर्ण गतिविधियों को छिपाने के लिए नहीं किया गया है तो संपत्ति को बेनामी संपत्ति नहीं माना जाएगा.

DemonetizationNews

इस अधिनियम को अब तक कैसे लागू किया गया है?

कानून लागू होने के बाद उसके प्रभाव के बारे में सरकार ने जागरुकता फैलाने की काफी कोशिश की है. आयकर विभाग ने नोटबंदी के आदेश के बाद सार्वजनिक विज्ञापन दिए थे, और लोगों को यह चेतावनी दी थी कि किसी अन्य के बैंक खाते में अपनी बेहिसाब पुरानी मुद्रा जमा करना बेनामी संपदा लेन-देन अधिनियम,1988 के तहत आपराधिक आरोपों को आकर्षित करेगा, जो चल और अचल संपत्ति दोनों पर लागू है, जिसे 1 नवंबर, 2016 से लागू किया गया था.

फरवरी के पहले हफ्ते में यह घोषणा की गई थी कि कानून के तहत देशभर में आयकर विभाग ने 87 नोटिस जारी किए थे और 42 मामलों में करोड़ों रुपए के मूल्य की बैंक डिपॉजिट्स को जोड़ा गया था.

पिछले साल कानून लागू होने से पहले, यह खबर आई थी कि बहुत से रियल एस्टेट डेवलपर्स ने संपत्ति को बेनामदार के नाम से वापस अपने नाम पर करके, जल्द ही ‘उलट’ बेनामी लेन-देन करने की कोशिश की थी, लेकिन संशोधित कानून के तहत, पूर्वव्यापी प्रभाव से इस तरह के 'पुनः स्थानांतरण' पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

कानून की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए हमें इंतजार करना और देखना होगा कैसे आयकर विभाग नाजायज भूमि एकत्रीकरण पर कार्यवाही शुरू करता है और अदालतों में इस तरह की कार्यवाही को कैसे चुनौती दी जाती है. इस संबंध में लालू के परिवार के मामले पर ध्यान रखना दिलचस्प होगा. इस तरह के एक उच्च प्रोफाइल मामले में कानून कैसे लागू किया गया है. यह देख कर पता चलेगा की यह कानून कितना प्रभावी हो सकता है.

(आसान शब्दों में कानून समझाने वाला भारत का पहला फ्री ऑनलाइन सोर्स)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi