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तालिबानी मानसिकता है ऐतिहासिक इमारतों को मिटाने की कोशिश

ताजमहल को प्रेम का पर्याय मानने वाले यहां हमेशा आते रहेंगे, वहीं ताजमहल से नफरत करने वाले यूपी सरकार की नई बुकलेट को देखकर संतोष कर सकते हैं.

Sandipan Sharma Updated On: Oct 04, 2017 08:52 AM IST

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तालिबानी मानसिकता है ऐतिहासिक इमारतों को मिटाने की कोशिश

दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताजमहल इस वक्त हिंदुत्व ब्रिगेड के निशाने पर है. दरअसल हिंदुत्व ब्रिगेड की नजरों को ताजमहल वैसे ही खटकता है, जैसे कभी तालिबान को बामियान की बुद्ध प्रतिमा और आईसिस को पल्मायरा का प्राचीन मंदिर खटकता था. संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों के लिए ताजमहल वास्तुकला का नायाब नमूना नहीं, बल्कि अन्याय और कट्टरता की निशानी है.

ऐसा लगता है कि ताजमहल की चमक के सामने हिंदुत्व ब्रिगेड को अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता फीकी नजर आती है, इसीलिए उन्होंने अब ताजमहल के अस्तित्व को नकारने का अभियान शुरू किया है. अगर हिंदुत्व ब्रिगेड के विचार इतने तंग और दूषित नहीं हैं, तो फिर मोहब्बत की निशानी ताजमहल से इतनी नफरत क्यों?

ईर्ष्या और मूर्खता

ताजमहल पर हिंदुत्व ब्रिगेड की सोच उनकी कुंठा, ईर्ष्या और मूर्खता के साथ-साथ निर्जीव चीजों पर उनके शक्तिहीन गुस्से को भी अभिव्यक्त करती है क्योंकि वो अच्छी तरह जानते हैं कि इमारतें और स्मारक कभी पलटकर वार नहीं करते.

उत्तर प्रदेश में हर साल यूपी पर्यटन मंत्रालय की एक आधिकारिक बुकलेट बनती है. इस बुकलेट में प्रदेश के हर बड़े पर्यटन स्थल के बारे में जानकारी दी जाती है, और उस पर्यटन स्थल के चित्र भी इस बुकलेट में छापे जाते हैं. हर साल की तरह इस बार भी यूपी पर्यटन विभाग ने बुकलेट बनवाई है, लेकिन इस बार ताजमहल को इस बुकलेट में जगह नहीं दी गई है. जाहिर है योगी आदित्यनाथ सरकार के इस फैसले ने हिंदुत्व ब्रिगेड की कुंठाओं और चिंताओं को एक बार फिर से उजागर कर दिया है.

सातवें अजूबे पर यूपी सरकार की कुंठा

ताजमहल दुनिया के सात अजूबों में शामिल है. ये यूनेस्को के प्रमुख विरासत स्थलों में से एक है. दशकों से दुनियाभर के लोग ताजमहल की एक झलक पाने के लिए आते हैं. भारत आने वाले कुल पर्यटकों में से एक चौथाई ताजमहल देखने के लिए आगरा का दौरा जरूर करते हैं. दुनिया में कहीं भी जब भारतीय संस्कृति और वास्तुकला का प्रदर्शन होता है, तब ताजमहल उस झांकी या तस्वीर के केंद्र में होता है. मतलब साफ है कि आज के युग में देश हो या विदेश बिना ताजमहल के भारतीय संस्कृति की कल्पना करना कठिन है.

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बरसों से ताजमहल भारतीय पर्यटन को सबसे ज्यादा कमाई कराने वाली ऐतिहासिक इमारत बनी हुई है. इसके बावजूद योगी सरकार यूपी की पर्यटन बुकलेट में ताजमहल को शामिल नहीं करना चाहती. ऐसे में हिंदुत्व ब्रिगेड की तुलना घृणा पैदा करने वाले उस कट्टर दैत्य से की जा सकती है, जो खुद अपनी ही पूंछ खा रहा है, यानी जो खुद अपनी पहचान को मिटाने पर अमादा है.

यूपी पर्यटन विभाग के प्रचार साहित्य में नजरअंदाज करके योगी सरकार ने पहली बार ताजमहल पर अपनी कुंठा जाहिर नहीं की है. कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तर्क दिया था कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता है. हालांकि किसी को भी योगी आदित्यनाथ का ये दोषपूर्ण तर्क समझ में नहीं आया.

पूरी दुनिया में ताजमहल को प्रेम का प्रतीक माना जाता है. ऐसे में केवल मुख्यमंत्री योगी ही बता सकते हैं कि वो क्यों नहीं चाहते कि भारत को प्यार के प्रतीक के रूप में पहचाना जाए.

इनकी आत्मा तक फैला है जहर

शायद कट्टर और नफरत करने वाले लोग नहीं चाहते कि ताजमहल को भारत के प्रतीक के तौर पर देखा और प्रचारित किया जाए. जहां तक बीजेपी की बात है तो वो अयोध्या से परे देख और सोच ही नहीं सकती. अपनी इसी नफरत और कुंठा की वजह से बीजेपी के कारसेवकों ने अयोध्या में एक ऐतिहासिक इमारत को नष्ट कर दिया था.

योगी सरकार ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आवंटित बजट में भी ताजमहल के साथ भेदभाव किया और उससे हिस्से में पैसा नहीं आया. 'हमारी सांस्कृतिक विरासत' के 2017-18 बजट के स्पेशल सेक्शन में ताजमहल का नाम नदारद है. जबकि उसमें हिंदू स्मारकों और पर्यटन स्थलों को तरजीह दी गई है. जाहिर है कि ताजमहल के खिलाफ सरकार के मन काफी जहर है, जो शरीर के साथ आत्मा तक फैला चुका है.

यकीनन, इतिहास को देखने और समझने का ये एक विकृत और अदूरदर्शी तरीका है. जाति, पंथ और धर्म के आधार पर लोगों से भेदभाव करना गंभीर अन्याय है. ये मनोवैज्ञानिक अस्वस्थता के साफ और गंभीर लक्षण हैं. धर्म के आधार पर स्मारकों को तराशना एक भद्दा और दुखद मजाक है. घृणा, हीनता, कट्टरता और बदले की भावना रखने वाले जहरीले दिमागों से इससे ज्यादा उम्मीद ही क्या की जा सकती है.

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धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कट्टर लोगों के बीच एक ढोंग और झूठ खासा लोकप्रिय है, वो कहते हैं कि 'मुगलों की बनवाई हर इमारत और स्मारक अभिशप्त है.' अपनी मूर्खतापूर्ण दलीलों के साथ ये लोग ताजमहल समेत मुगल काल की सभी इमारतों को नष्ट करने की वकालत करते हैं. लेकिन दिल्ली के लाल किले से भाषण देकर अपनी देशभक्ति और श्रेष्ठता की डींगे हाकनें और अपनी छाती ठोंकने से भी नहीं चूकते.

लाल किला, जामा मस्जिद और बाकी इमारतों को भी क्यों नहीं ढहा देते?

सच कहूं तो, अगर हिंदुत्व ब्रिगेड को मुगल काल के स्मारकों से इतनी नफरत है, तो उन पर सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं करते? वो अपने कारसेवकों को लाल किला, ताजमहल, जामा मस्जिद और फतेहपुर सीकरी में वैसा तांडव करने को क्यों नहीं कहते जैसा उन्होंने कुछ साल पहले बाबरी मस्जिद के साथ किया था? अगर आपके पास तालिबान का दिमाग है, तो फिर मुगल काल की सभी इमारतों का हाल बामियान जैसा करने के लिए साहस पैदा क्यों नहीं कर पा रहे हो?

भारतीय इतिहास के साथ बीजेपी को हमेशा से परेशानी रही. बीजेपी के ज्यादातर समर्थकों ने भारत के इतिहास को संघ की शाखाओं में सीखा और पढ़ा है. तथ्यों और साक्ष्यों से परे इतिहास को सीखने का यही जोखिम होता है. वैसे इन दिनों कई तरह का इतिहास व्हाट्सएप पर भी फॉरवर्ड हो रहा है, जिसका न तो सिर है और न ही पैर. इस तरह के इतिहास से लोगों के दिलों में नफरत के बीज बोए जा रहे हैं.

वाट्सएप के इतिहास और यूपी सरकार के बुकलेट से करिए संतोष

विकृत और मनगढ़ंत इतिहास पढ़कर लोग किसी भी तथ्य या सत्य को एक विशेष चश्मे से देखने लगते हैं और उनकी मानसिकता संकीर्ण हो जाती है. ऐसा होने पर लोग साझा विरासत पर गौरव करना बंद कर देते हैं. उनके सीखने और समझने की क्षमता खत्म हो जाती है. और फिर आखिर में वो कट्टरता के साथ उन चीजों को मिटाने में जुट जाते हैं जो उनकी सांस्कृतिक श्रेष्ठता की मुहिम के आड़े आती है.

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अपने नए निर्देश के जरिए योगी सरकार सिर्फ अपने पक्षपातपूर्ण रवैए को उजागर करती है, इसके अलावा उसे कुछ और हासिल नहीं होने वाला. ताजमहल को दुनिया में किसी भी परिचय की जरूरत नहीं है. ताजमहल, गोरखनाथ मठ की तरह सरकार की नजरे-इनायत का मोहताज नहीं. ताजमहल बरसों से उन लोगों को आकर्षित करता आ रहा है जो भारत और आगरा से प्यार करते हैं.

जो लोग सोचते हैं कि भारतीय संस्कृति प्रेम का पर्याय है, वो ताजमहल को देखने हमेशा आते रहेंगे. वहीं ताजमहल से नफरत करने वाले यूपी सरकार की नई बुकलेट को देखकर संतोष कर सकते हैं.

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