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यूपी चुनाव नतीजे 2017: समय आ गया है, जब भारतीय मीडिया 'आत्ममंथन' करे

लोगों से मीडिया के कट जाने का एक गंभीर नतीजा यह देखने को मिल रहा है कि जनता का भरोसा मीडिया से उठ गया है

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 14, 2017 09:10 AM IST

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यूपी चुनाव नतीजे 2017: समय आ गया है, जब भारतीय मीडिया 'आत्ममंथन' करे

शनिवार को जब उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे सबके सामने आ गए, तो उसके कुछ देर बाद अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल के स्तंभकार और अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट (एईआई) के फेलो सदानंद धूमे ने एक ट्वीट किया. बहुत से पाठकों की तरह धूमे भी यूपी में चली भगवा आंधी पर हैरान होंगे.

उन्होंने लिखा, ‘प्रिय दिल्ली की मीडिया: आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने यूपी में ढकी-छुपी हर जाति और हर निर्वाचन क्षेत्र पर रिपोर्टिंग की, लेकिन इस दौर की सबसे बड़ी लहर आपको दिखाई नहीं दी.’

अपने इस ट्वीट में उन्होंने मीडिया को लगे उस रोग को बखूबी उठाया है जो अब हर जगह नजर आता है. उत्तर-प्रदेश में चली लहर भारतीय चुनावी राजनीति के इतिहास की सबसे बड़ी लहरों में से एक है जिसने बीजेपी को अभूतपूर्व 325 सीटें दिलाईं.

देश में सबसे ज्यादा आबादी और सांस्कृतिक रूप से विविध प्रदेश में ज्यादातर मीडिया पंडित और पत्रकार न सिर्फ इस लहर को भांपने में नाकाम रहे, बल्कि वे तो एक तरह से उल्टी ही तस्वीर पेश कर रहे थे.

मीडिया की नाकामी

ऐसा नहीं है कि संकेत साफ नहीं थे. 8 नवंबर से लेकर अब तक, बीजेपी ने देश भर में हुआ लगभग हर चुनाव जीता है- भले वह विधानसभा चुनाव हो या फिर स्थानीय निकाय चुनाव.

फिर भी यह बात हैरान करती है कि रिपोर्टरों का रैला और विश्लेषकों की फौज यही अटकलबाजी लगाती रही कि नोटबंदी मोदी के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनेगा और यूपी में उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा.

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पश्चिमी यूपी में चुनाव कवर करते हुए राजदीप सरदेसाई(तस्वीर. एफबी)

मजे की बात तो यह है कि ये सारी भविष्यवाणियां ख्याली पुलावों पर आधारित नहीं थी बल्कि उनका आधार जमीनी रिपोर्टिंग को बताया गया. ये रिपोर्टर नरेंद्र मोदी के पक्ष चल रही आंधी को ठीक से पढ़ ही नहीं पाए.

बल्कि वे तो अखिलेश यादव और मायावती को बड़ा फायदा होने तक की बातें भी कह रहे थे. और ये बातें जाति और समुदायों के समीकरणों के बारीक से बारीक विश्लेषण और आबादी से जुड़े डेटा पर आधारित थीं.

पत्रकार शैफाली वैद्य ने ट्वीट किया, ‘मुझे लगता है कि चेन्नई में बारिश को लेकर मौसम विभाग की भविष्यवाणी इन पत्रकारों के ‘विश्लेषण’ से कहीं ज्यादा सटीक हैं.’

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पत्रकार अमन शर्मा ने ट्वीट किया, ‘डिंपल यादव अखिलेश-राहुल के रोड शो में शामिल हुईं.. तस्वीर तो बहुत बढ़िया है. अगर इसमें प्रियंका भी होतीं.’

ईटी की पत्रकार रोहिणी सिंह ने 27 फरवरी को ट्वीट किया, ‘मैं साफ तौर पर कहती हूं, आज की वोटिंग के बाद, यह साफ है कि बीजेपी की कोई लहर नहीं है. हालांकि, कई सीटों पर बीजेपी अच्छी टक्कर दे रही है.’ जानी मानी पत्रकार बरखा दत्त ने भी रोहिणी सिंह की हां में हां मिलाई और कहा कि वह भी तो यह कह रही हैं और दिल्ली को दूर बताया.

जनता से कटा मीडिया

कहने की जरूरत नहीं कि पत्रकार चुनाव विश्लेषक भी होते हैं और उनसे चुनाव नतीजों की ‘भविष्यवाणी करण’ की उम्मीद भी की जाती है. चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया को ताकत ही इस बात से मिलती है कि उसके पास घटित हो रही घटनाओं को ‘रिपोर्ट करने’ और उनकी ‘व्याख्या’ करने की क्षमता है.

उसे ताकत इस बात से मिलती है कि वह कितनी निष्पक्षता और प्रभावी तरीके से सूचना को जनता तक पहुंचाता है और फिर जनता की परेशानियों को सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंचाए.

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चुनाव के दौरान टेलीविजन स्टूडियो में बरखा दत्त (तस्वीर. एफबी)

लेकिन इस वक्त  पूरी दुनिया में लगातार देखने को मिल रहा है कि पारंपरिक पत्रकारिता यानी जर्नलिज्म की जगह ‘एक्टीविस्ट जर्नलिज्म’ ले रहा है जहां खबरनवीस सिर्फ सत्ता को सच्चाई का आईना दिखाने से परे अपने लिए कुछ निश्चित भूमिकाएं और जिम्मेदारी ले लेते हैं.

ऐसा करते हुए मीडिया की भूमिका बदल जाने का जोखिम पैदा होने लगता है. जानकारी खोजने और उसकी व्याख्या करने से हटकर वह अपनी खुद की क्षमताओं में विश्वास करने लगता है.

यह एक रपटीली राह है. यह मीडिया को ऐसी दिशा में ले जाता है जहां वह समझने लगता है कि सत्ता का असली केंद्र वे लोग नहीं हैं जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है बल्कि असली केंद्र खुद मीडिया है. आखिरकार, इसका नतीजा यह निकलता है कि मीडिया जनता से कट जाती है और जमीनी हालात को ठीक से समझ नहीं पाता.

पत्रकारों को सलाह

 हालत यह है कि जहां संकेत मौजूद भी होते हैं वहां पर भी मीडिया या तो उनकी अनदेखी करता है या फिर उन्हें मानने से ही इनकार कर देता है.

ब्रेक्सिट और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान हम ऐसा देख चुके हैं जहां पश्चिम की नफासत भरी मीडिया मशीनरी को पता ही नहीं चल पाया कि जनता के बीच क्या हवा बह रही है.

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यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान एक दृश्य

लोगों से मीडिया के कट जाने का एक गंभीर नतीजा यह देखने को मिल रहा है कि जनता का भरोसा मीडिया से उठ गया है. वह इस बात पर गुस्सा है कि जो माध्यम उनकी आवाज को उठाने के लिए बना था वह इतनी ऊंची नाक वाला हो गया है कि उसे लोगों की फिक्र ही नहीं है.

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मीडिया अपने आप में ही इतना डूबा है कि उसके लिए लोगों की परेशानियां कोई मायने नहीं रखतीं हैं. बीस फरवरी को जाने-माने पत्रकार शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया था, ‘मैदान अब भी खुला है. तीन चरण तक कोई हवा नहीं है. ज्यादातर सीटों पर कांटे की टक्कर है. कांग्रेस से समाजवादी पार्टी को थोड़ा सा ही फायदा हुआ है, ज्यादातर तो वह बोझ ही है.’

बरखा दत्त ने 9 मार्च को ट्वीट किया, ‘उत्तर प्रदेश के बाबुओं के बीच मायावती को लेकर गहमागहमी है, जिसके खामोश वोटर और समर्थक को उनके मुताबिक मीडिया कम आंकता है. देखें आगे क्या होता है.’

सचमुच हैरानी होती है कि राजदीप सरदेसाई  या सुरजीत भल्ला को छोड़कर भारतीय पत्रकारिता की नामी गिरामी शख्सियतें भी हवा का रुख नहीं भांप पाईं.

वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में बड़ी अच्छी बात कही है, ‘लंबे चुनाव अभियान के बाद जब एक बार धूल शांत हो जाए और हालात सामान्य हो जाएं तो हमें यानी राजनीतिक पंडितों को खुद उस सलाह पर अमल करने की जरूरत है जो हम अक्सर चुनाव हारने वालों को देते हैं.

सलाह है आत्ममंथन करने की.

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