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यूपी चुनाव 2017: किस रोग का इलाज कर रहे थे वैद्य?

जयपुर साहित्य उत्सव में सब बगलें झांकने लगे कि इलाज किसका हो रहा है? किस रोग के लक्षण बताए जा रहे हैं?

Madhukar Upadhyay Updated On: Jan 21, 2017 05:23 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: किस रोग का इलाज कर रहे थे वैद्य?

वैद्य का काम उपचार करना होता है. जाहिर है, वह उपचार ही कर रहे होंगे. मरीज कौन है? और मर्ज क्या है? इसकी परवाह करे तो वो वैद्यकी के मूल सिद्धांत के खिलाफ चला जाएगा. उसके लिए सब बराबर हैं –चाहे प्रधानमंत्री हों या मोहनलालगंज के मुसद्दी.

इतिहास गवाह है कि वैद्य की बात और डॉक्टर की लिखावट आम लोगों की समझ में नहीं आती. बल्कि लोग मानते हैं अच्छा वैद्य वही, जो साफ साफ ना बोले. बुरी खबर भी इलाज की चाशनी में लपेट कर दे कि दवा असर कर जाए और स्वाद भी ना बिगड़े.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य सिर्फ नाम के वैद्य नहीं हैं. जयपुर साहित्य उत्सव में उन्होंने वैद्यकीय प्रतिभा प्रदर्शित की तो सब बगलें झांकने लगे कि इलाज किसका हो रहा है? किस रोग के लक्षण बताए जा रहे हैं?

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मान लीजिए कि मरीज का नाम उत्तर प्रदेश है. चुनाव होने को हैं. ऐसे में उसे आरक्षण की गोली देने की आवश्यकता नहीं थी, पर वैद्य जी ने दे दी तो कुछ सोच समझ कर ही दी होगी. इस पर सबके अपने निहितार्थ हैं.

निहितार्थ एक:

वैद्य जी को लग गया कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी चाहे जितना द्रविड़ प्राणायाम कर ले, चुनाव और सत्ता उसके हाथ से फिसल गई है. नोटबंदी की गोली से पहले से ही छटपटा रहे मरीज को लेकर बहुत उम्मीद बची नहीं थी. वैद्य जी ने महसूस किया कि ऐसे में इलाज रोगी का नहीं, रोग का होना चाहिए.

निहितार्थ दो:

उत्तर प्रदेश की इस चुनावी दौड़ में बहुजन समाज पार्टी दूसरे नंबर पर है. संभावना है कि वह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पछाड़ कर नंबर एक हो सकती है. इस दृष्टि से मायावती का मार्ग प्रशस्त करना अखिलेश को परास्त करने का सबसे बेहतर विकल्प है.

निहितार्थ तीन:

उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने पर अखिलेश यादव भविष्य में भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री के लिए सबसे प्रबल चुनौती की तरह उभर सकते हैं, विपक्ष की राजनीति का केंद्र हो सकते हैं. कम उम्र और पांच साल का अनुभव दोनों अखिलेश के साथ हैं. इसलिए उन्हें उत्तर प्रदेश में रोकना जरूरी है.

Jaipur: RSS leaders Dattatreya Hosable and Manmohan Vaidya at a session at the Jaipur Literature Festival at Diggi Palace in Jaipur on Friday. PTI Photo (PTI1_20_2017_000307B)

निहितार्थ चार:

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सत्ता को चुनौती देने वाला अभी कोई नहीं. अगर होगा भी तो वह चुनौती बाहर से नहीं अंदर से आएगी. संघ संभवत: मोदी के किसी कदम से असंतुष्ट है. गुजरात में उनके मुख्यमंत्रित्व काल में संघ की घटती भूमिका को देखते हुए हो सकता है वह स्वयं उन्हें बहुत मजबूत होते देखना नहीं चाहे.

निहितार्थ पांच:

नरेन्द्र मोदी सत्तासीन हैं लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत की तरह वैद्य जी ने दिखा दिया कि सत्ता की असली चाबी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है. रिमोट कंट्रोल में नई बैटरी डाल दी गई है और सिग्नल उतने ही स्पष्ट हैं जितने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले थे.

निहितार्थ छह:

बयान और उस पर स्पष्टीकरण को एक साथ एक मंच पर रखने के प्रयोग का यह अगला चरण है. साहित्य महोत्सव में मनमोहन वैद्य और संघ सह सचिव दत्तात्रेय होसबोले की मौजूदगी और साफ सफाई अचानक नहीं है. संघ देश के विभिन्न हिस्सों में अलग–अलग मंचों पर यह करता रहा है.

वैसे वैद्य जी जानते हैं कि लिखावट कितनी भी खराब हो, अंत में उपचार उन्हीं के नुस्खे से होगा. वैद्य जी ने अपनी कह दी, लीपापोती का काम दूसरों के जिम्मे छोड़ दिया. वैद्यकी में महावैद्यों के बताए रास्ते पर चलने की महान परम्परा रही है.

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मनमोहन वैद्य ने उसी का अनुसरण किया. बिहार में वैद्य संघ प्रमुख मोहन भागवत थे, दवा का असर उलटा हो गया, हो सकता है उत्तर प्रदेश में भी हो जाए. पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

मरीज की जान कीमती है लेकिन सिद्धांत से ज्यादा नहीं.

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