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तीन तलाक: 5 अलग-अलग धर्मों के जज कर रहे हैं याचिका पर सुनवाई

कोर्ट ने कहा है कि वह तीन तलाक के साथ जरूरत पड़ी तो 'निकाह हलाला' पर भी सुनवाई कर सकता है

FP Staff | Published On: May 11, 2017 11:56 AM IST | Updated On: May 11, 2017 01:02 PM IST

तीन तलाक: 5 अलग-अलग धर्मों के जज कर रहे हैं याचिका पर सुनवाई

गुरुवार 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने तीन तलाक से जुड़ी याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है. इस सुनवाई की खास बात ये है कि संवेदनशील माने जाने वाले इस मुद्दे पर सुनवाई करने वाले पांच जज अलग-अलग धर्म से हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार तीन तलाक पर सुनवाई करने वाली पीठ में मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कूरियन जोसेफ (ईसाई), आरएफ नरीमन (पारसी), यूयू ललित (हिंदू) और अब्दुल नजीर (मुस्लिम) हैं.

जस्टिस जेएस खेहर

खेहर भारत के मुख्य न्यायधीश बनने वाले पहले सिख हैं. सीजेआई बनने से पहले वह कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. खेहर जज बनने से पहले हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर चुके थे.

जस्टिस कूरियन जोसेफ

जस्टिस जोसेफ केरल से हैं और केरल हाई कोर्ट में वकालत से उन्होंने करियर शुरू किया. वह 1994 में अतिरिक्त अडवोकेट-जनरल बने. 2000 में उन्हें केरल हाई कोर्ट का जज बनाया गया. 2010 में वह हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. 2013 में वह सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बनाए गए.

जस्टिस आरएफ नरीमन

नरीमन भारत के सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं. उन्हें जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया. पारसी समुदाय से आने वाले नरीमन प्रसिद्ध जूरिस्ट फली एस नरीमन के पुत्र हैं.

जस्टिस यूयू ललित

जस्टिस ललित को जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया. वकालत के दौरान ललित तुलसी प्रजापति एनकाउंटर मामले में अमित शाह के वकील के रूप में जाने जाते हैं.वह 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में भी विशेष अभियोजक थे.

जस्टिस अब्दुल नजीर

जस्टिस अब्दुल नजीर कर्नाटक से हैं. उन्होंने 1983 में वकालत से करियर शुरू किया और 2003 में उन्हें कर्नाटक हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया. 2004 में वह हाई कोर्ट में स्थायी जज बने. वह 2017 से सुप्रीम कोर्ट में हैं.

क्या है पूरा मामला

तीन तलाक की प्रथा मुस्लिम व्‍यक्ति को अपनी पत्‍नी को तीन बार तलाक कहकर शादी खत्‍म करने का अधिकार देती है. पिछले कई दिनों से देश में अलग-अलग जगह से तीन तलाक को लेकर मुस्लिम समुदाय की कई औरतें इसके खिलाफ आवाज उठा रही हैं.

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी अपने कई भाषणों में तीन तलाक का जिक्र किया था. मुस्लिम नेताओं का कहना है कि तीन तलाक की वैधता पर सवाल उठाना उनके धार्मिक कानून में दखल है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने सर्वोच्च अदालत से कहा कि तीन तलाक इस्लाम का अंदरुनी मामला है और बोर्ड साल-डेढ़ साल मामले पर आम राय बना लेगा.

करीब 100 मुस्लिम बुद्धिजीवियों और पेशेवरों ने खुला खत लिखकर तीन तलाक का विरोध करते हुए कहा था कि ये इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है.

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं से मुलाकात में कहा था कि तीन तलाक के मुद्दे को राजनीतिक मुद्दा न बनने दें और इसमें सुधार में अग्रणी भूमिका निभाएं.

पीएम मोदी ने कहा था कि वो देश में मुस्लिम बेटियों की तकलीफ के खिलाफ लड़ेंगे. साथ ही उन्‍होंने कहा था कि उनकी सरकार इस पुराने पड़ चुके कानून को समाप्‍त करेगी.

कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए रोज सुनवाई करने का फैसला किया है. कोर्ट ने कहा है कि वह तीन तलाक के साथ 'निकाह हलाला' पर भी सुनवाई करेगा.

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