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'निकाह' ने आठ साल की फरहा को तीन तलाक के खिलाफ खड़ा किया

35 साल पहले 'निकाह' में बदल गई थी बी आर चोपड़ा की तीन तलाक

Shishir Tripathi | Published On: May 13, 2017 07:27 AM IST | Updated On: May 13, 2017 07:43 AM IST

'निकाह' ने आठ साल की फरहा को तीन तलाक के खिलाफ खड़ा किया

(यह लेख फ़र्स्टपोस्ट में 3 जुलाई, 2016 को प्रकाशित हुआ था.)

कानून की तमाम किताबों के बीच में कई डीवीडी रखी हैं. फरहा फैज इनमें से बीआर चोपड़ा की फिल्म 'निकाह' की डीवीडी निकालती हैं और उसे अपनी बेटी को चलाने को कहती हैं. डीवीडी से अभिनेत्री तनुजा की आवाज गूंजती है: 'औरतों ने तमाम कुर्बानियां दी हैं. मगर उसे मर्दों की आन की चौखट पर कुर्बान कर दिया जाता है.'

बीआर चोपड़ा की फिल्म निकाह 1982 में रिलीज हुई थी. उस पर तीस से ज्यादा केस किए गए थे. असल में इस फिल्म ने तीन तलाक जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे को उठाया था. ये बीआर चोपड़ा की सबसे कामयाब फिल्मों में से एक थी.

फिल्म में राज बब्बर, सलमा आगा और दीपक पाराशर ने शानदार एक्टिंग की थी. निकाह फिल्म को कई अवार्ड भी मिले थे. लेकिन इस फिल्म को आज इसलिए ज्यादा याद किया जाता है क्योंकि इसने मुसलमानों में तीन तलाक के चलन पर कई सवाल उठाए थे.

निकाह फिल्म ने डाला था शुरुआती असर 

सुप्रीम कोर्ट की वकील फरहा फैज उस वक्त आठ साल की थीं, जब उन्होंने निकाह फिल्म देखी थी. आज फरहा तीन तलाक के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं. उनके मामा उमर खैय्याम सहारनपुरी को बीआर चोपड़ा ने निकाह फिल्म में धार्मिक मामलों के सलाहकार के तौर पर रखा था. इसी वजह से तलाक के मामले पर फरहा के घर में कमोबेश रोज ही चर्चा होती थी.

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उन दिनों को याद करके फरहा कहती हैं, 'मेरे मामा दिलो जान से फिल्म को कामयाब बनाने में लगे थे. कट्टरपंथी उनका विरोध कर रहे थे क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि फिल्म बने. मैं तो बहुत छोटी थी, फिर भी मुझे अपने मामा की तकलीफो का एहसास होता था. पहले फिल्म का नाम तलाक, तलाक, तलाक था. मगर दबाव में उसे निकाह किया गया. मेरे मामा को ऐसी कई लड़ाइयां लड़नी पड़ी थीं'.

द मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 में पारित हुआ था. इसके तहत मुस्लिमों के मामले में सरकार दखल नहीं दे सकती थी. इस मामले में मुस्लिम धर्म गुरू ही दखल दे सकते थे. वो ही निकाह और तलाक के मामलों की सुनवाई करके फैसला सुना सकते थे.

मुद्दई बनीं फरहा फैज

अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही एक जनहित याचिका दर्ज की. इसका मौजूं था, बराबरी के लिए मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई. इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ की वजह से मुस्लिम महिलाएं जिस भेदभाव का शिकार होती हैं, उनसे जुड़े मसलों पर सुनवाई होनी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने जब ये मामला उठाया तो कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया. इन संगठनों का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े मामलों में अदालत दखल नहीं दे सकती.

महाराष्ट्र स्थित जमीयत उलेमा ए हिंद ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के पर्सनल लॉ कुरान से प्रेरणा लेते हैं, भारतीय संविधान से नहीं. इसलिए ऐसे मामलों में कोर्ट का दखल गैरवाजिब है.

फरहा फैज काफी वक्त से इस मामले पर जनहित याचिका दाखिल करना चाहती थीं. जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इस मामले को उठाया तो उन्होंने अदालत से दरख्वास्त की कि उन्हें भी इस मामले में मुद्दई बनाया जाए.

फरहा ने अदालत में मुस्लिम महिलाओं की तरफ से विस्तार से अपनी बात रखी. जिसके बाद, 28 मार्च,2016 को अदालत ने इस मामले में फरहा को भी मुद्दई बनाया.

अपनी अर्जी में फरहा ने लिखा कि वो मुस्लिम परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी हैं. इसलिए वो इस्लाम के नियमों से अच्छी तरह वाकिफ हैं. उनके पिता को कुरान जबानी याद थी.

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फरहा की चुनौती?

फरहा ने अदालत से कहा कि उनके हिसाब से संवैधानिक और बुनियादी अधिकार, धार्मिक अधिकारों से ऊपर हैं. इसीलिए फरहा ने अदालत से कहा है कि पर्सनल लॉ को भी अदालतें ही तय करें. ये किसी रजिस्टर्ड मुस्लिम संगठन की बपौती नहीं.

फरहा ने अपनी अर्जी में ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड को खुली चुनौती दी है. बोर्ड, मुसलमानों के मामले में किसी भी अदालती दखल के खिलाफ है.

फरहा ने अपनी अर्जी में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पर्सनल लॉ बोर्ड देश भर में दारुल-काजी के नाम से अपनी संस्थाएं चला रहा है. और इसी के जरिए देश भर में काजी और नायब काजी नियुक्त किए जाते हैं. ये काजी 1880 के काजी एक्ट के तहत नियुक्त होते हैं.

यही काजी और उनके नायब शरीयत के नाम पर दारुल कजा का संचालन कर रहे हैं. फरहा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खुद को मुस्लिम समुदाय के बीच इंसाफ के ठेकेदार के तौर पर देखते हैं.

फरहा की मुखालफत की वजह?

फरहा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की खुलकर मुखालफत करती हैं. वो कहती हैं, 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक किताब छापी थी, जिसका नाम था 'मजमुआ के कवानेने ऐ ओस्लामी'. इस किताब के मुताबिक काजी ही शादी, तलाक, विरासत जैसे मामलों की सुनवाई करेगा. उसका फैसला सबको मानना होगा. इस किताब के कुछ हिस्से बेहद काबिले ऐतराज हैं. ये मुस्लिम महिलाओं के बिल्कुल खिलाफ है और कानून को सीधी चुनौती देने वाला है'.

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की फेसबुक वाल से

फरहा फैज ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दरख्वास्त में कहा है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मीडिया के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए. वरना बोर्ड पूरे माहौल को सांप्रदायिक बना रहा है.

फरहा के मुताबिक पर्सनल लॉ बोर्ड मीडिया के जरिए उन महिलाओं को अपमानित कर रहा है जो तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई हैं.

फरहा फैज कहती हैं, 'तीन तलाक का मसला मेरे दिल के बेहद करीब है. मेरे मामा ने एक फिल्म में इस मुद्दे को उठाए जाने पर कितना विरोध सहा था. निकाह फिल्म इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचने वाली पहली फिल्म थी. ऐसे में जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इस मामले की सुनवाई करने का फैसला किया तो मुझे बेहद खुशी हुई'.

फरहा के मुताबिक, 'जब मैंने अखबार में पढ़ा कि जमीयत उलेमा ए हिंद ने इसके खिलाफ अदालत में अर्जी दी है, तो मुझे झटका लगा. जमीयत पहले मुस्लिम महिलाओं का समर्थन करता रहा है. इसीलिए मैंने फौरन ही मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में अर्जी दी'.

फरहा फैज उन धार्मिक संगठनों के खिलाफ हैं, जो पर्सनल लॉ में अदालत के दखल का विरोध करते हैं.

क्यों अदालत दे तीन तलाक में दखल?

वो कहती हैं, 'धार्मिक संगठन कहते हैं कि पर्सनल लॉ में अदालतें दखल नहीं दे सकतीं. जबकि मेरे मुताबिक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ही कानून की निगरानी करने वाली संस्थाएं हैं. अदालतें हर उस मामले में दखल दे सकती हैं जो किसी के निजी अधिकार का हनन करता है. फिर भी वो कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक के मसले में दखल नहीं दे सकता. मैं ये सुनकर हैरान हूं'.

फरहा के मुताबिक ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को लगता है कि पर्सनल लॉ में वही सबसे बड़ी अदालत है. बोर्ड को लगता है कि शरीयत की सबसे अच्छी समझ उन्हें ही है. वही इसकी सही व्याख्या कर सकते हैं.

A member of Khawateen Markaz, a Kashmiri women's separatist group, attends a protest against recent riots, in Srinagar August 12, 2013. Three people died in riots between Hindus and Muslims over the weekend. Opposition parties linked the rioting to the renewed border tensions between India and Pakistan, because some of the protesters involved had brandished a Pakistani flag.  Pakistan accused Indian troops of firing shells across the disputed border in Kashmir on Monday and tensions ran high in both countries after last week's killing of Indian soldiers set off a wave of skirmishes between the two nuclear-armed rivals. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: MILITARY CIVIL UNREST) - RTX12IDE

बोर्ड को लगता है कि दूसरे लोग जो भी सोचते-समझते हैं वो गलत है. इसीलिए वो अदालत को इस मामले से दूर रखना चाहते हैं. फरहा सवाल उठाती हैं कि देश की सबसे बड़ी अदालत आखिर क्यों नहीं इस मामले में दखल दे सकती.

क्या अदालत को धार्मिक मसलों की समझ नहीं है. उसके मुकाबले पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी रजिस्टर्ड संस्था को धार्मिक मामलों की ज्यादा समझ है? क्या अब ये रजिस्टर्ड संस्थाएं तय करेंगी कि क्या सही है और क्या गलत?

फरहा फैज तरक्कीपसंद मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती हैं. वो मानती हैं कि बहुत से लोगों को कुरान की सही समझ नहीं है. इसके बारे में उन्हें जान-बूझकर गुमराह किया जाता रहा है.

मौलवियों को निजी मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं 

फरहा कहती हैं, 'कुरान हर दुनियावी मसले पर रौशनी डालती है. कोई पढ़ा लिखा इंसान इसे समझ सकता है, इसकी व्याख्या कर सकता है. ऐसे में केवल कुछ लोगों को ही कुरान समझने का हक कैसे मिल गया? हम कुरान को जिस तरह समझते हैं, वैसा ही हम अपने जीवन में अमल कर सकते हैं. मौलवियों और मुल्लाओं का काम मस्जिदों की देख-रेख करना है. उन्हें देखना चाहिए कि मस्जिदों में कुरान की ठीक से पढ़ाई हो रही है या नहीं. उन्हें हमारे पर्सनल लॉ में दखल देने का कोई हक नहीं'.

फरहा फैज ने महज 21 साल की उम्र में महिलाओं के हक की लड़ाई लड़नी शुरू कर दी थी. पिछले दो दशकों से वो हर समुदाय की महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं.

Muslim children read the Koran at a madrasa or religious school on the first day of the holy month of Ramadan in the northern Indian city of Mathura August 23, 2009. Muslims around the world abstain from eating, drinking and sexual relation from sunrise to sunset during Ramadan, the holiest month in the Islamic calendar. REUTERS/K. K. Arora (INDIA EDUCATION SOCIETY RELIGION) - RTR2719U

वो उन महिलाओं की खास तौर से मदद करती हैं जिनके पास संसाधनों की कमी है, जो गरीब हैं. फरहा मानती हैं कि पर्सनल लॉ में सुधार की सख्त जरूरत है. तभी महिलाओं के साथ होने वाली नाइंसाफी रोकी जा सकती है.

तीन तलाक के मुद्दे पर फरहा का कहना है कि 'कुरान इस बात पर विस्तार से रौशनी डालता है कि हम कैसे सही रास्ते पर चलते हुए जिंदगी बिता सकते हैं. जो बात हम कुरान से नहीं समझ सकते, वो बात हम हजरत मोहम्मद की जिंदगी से सीख सकते हैं. वो खुदा के पैगंबर थे. उन्होंने जिंदगी की तमाम चुनौतियों का सामना कैसे किया, ये बात हम उनसे सीख सकते हैं. हदीस में पैगंबर की जिंदगी के सबक हैं. हदीस में उन सवालों के जवाब मिलते हैं, जो कुरान में नहीं हैं'.

फरहा बताती हैं, 'तलाक के मसले पर कुरान में विस्तार से रौशनी डाली गई है. इसमें लिखा है कि अगर कोई मर्द अपनी बीवी को तलाक कहता है तो वो सिर्फ एक बार तलाक गिना जाएगा. इसके साथ ही महिला अपने पति के घर पर ही इद्दत का वक्त बिताना शुरू कर देगी. इसके बाद दोनों पक्षों की तरफ से एक एक शख्स मिलकर दोनों के बीच सुलह की कोशिश करेंगे. इद्दत के दौरान अगर शौहर को लगता है कि उससे गलती हो गई है तो वो तलाक को वापस ले सकता है'.

तीन तलाक समाज पर हावी क्यों?

अगर ऐसा है, तो फिर तीन तलाक हमारे समाज पर इतना हावी कैसे हो गया?

इस सवाल के जवाब में फरहा फैज कहती हैं, 'तीन तलाक की शुरुआत हजरत उमर के दौर में हुई थी. हालांकि वो भी इसके खिलाफ थे. उन्होंने तीन तलाक के लिए चालीस कोड़ों की सजा मुकर्रर की थी. लेकिन अफसोस की बात है कि हम कुरान के सबक भूल गए और खलीफा के दौर के चलन को हमने जोर-शोर से अपना लिया'.

तीन तलाक के जरिए फरहा मुस्लिम महिलाओं की तमाम चुनौतियों का हल तलाशना चाहती हैं. वो शरीयत जैसे तमाम पर्सनल लॉ में सुधार कराना चाहती हैं.

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शरीयत एक्ट 1937 में अंग्रेजों के राज में बना था. वो मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल नहीं देना चाहते थे. इसीलिए जिन बुरी परंपराओं का विरोध होना चाहिए था, जिन्हें रोका जाना चाहिए था, वो बदस्तूर जारी रहीं.

मगर इसका ये मतलब तो नहीं कि वो कुरीतियां अभी भी जारी रहें. फरहा कहती हैं कि अंग्रेज तो विदेशी शासक थे. उन्हें सिर्फ अपने साम्राज्य की फिक्र थी. उन्हें यहां के लोगो से कोई मतलब नहीं था. लेकिन एक आजाद और लोकतांत्रिक भारत में तो ऐसा नहीं होते रहना चाहिए.

फरहा के मुताबिक तीन तलाक के साथ-सात विरासत के कानून में भी सुधार की जरूरत है. ये अधिकार मुस्लिम महिलाओं को 1400 साल पहले दिए गए थे. हमें इनके बारे में पता ही नहीं.

मौलवियों को सिर्फ सामाजिक कानून मानने से ही गुरेज क्यों? 

ये पूछने पर कि आखिर वो क्यों पर्सनल लॉ में अदालतों का दखल चाहती हैं, फरहा कहती हैं कि, 'ये सामाजिक मुद्दे हैं, इसलिए हम इसमें कुरान का नाम लेने लगते हैं. मगर कुरान में तो आपराधिक मामलों पर भी विस्तार से लिखा है. कुरान में कहा गया है कि बलात्कार के मुजरिम को पत्थर से मार डालना चाहिए. तो क्या हम कुरान का वो आदेश मानेंगे? जब हम अपने देश के आपराधिक कानून मानते हैं, तो फिर सामाजिक कानून मानने से इनकार क्यों?'

फरहा आगे कहती हैं, 'इनका हमारे जीवन में इतना दखल होता है. ऐसे में हम सामाजिक सरोकार के मसले पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे किसी रजिस्टर्ड संस्था के हवाले कैसे कर सकते हैं? जब आपराधिक मामलों में कुरान या शरीयत का पालन नहीं होता, तब तो मुस्लिम धर्म गुरु शोर नहीं मचाते. पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाएं तब तो खामोश रहती हैं. मगर तीन तलाक या विरासत के मामलों में कोर्ट के दखल पर वो हंगामा खड़ा कर देती हैं. धार्मिक आजादी का सवाल उठाती हैं. ये तो नहीं चलेगा'.

तो आखिर तीन तलाक की सुनवाई से उन्हें क्या उम्मीद है? ये पूछने पर फरहा कहती हैं, 'मुझे लगता है कि ये केस मील का पत्थर साबित होगा. इससे हर महिला को बराबरी का हक हासिल होगा. इस मुकदमे की सुनवाई करने वाला संविधान पीठ भी इतिहास में दर्ज हो जाएगा. महिलाओं की बराबरी के इतिहास में यह मुकदमा नए युग की शुरुआत करेगा.'

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