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तीन तलाक और हलाला: बेगाने तलाक में दीवाने होने से बेहतर खुद में झांकिए

ज्यादातर लोगों की सहानुभूति महिलाओं के साथ नहीं अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा को सही साबित करने में है

Nidhi Nidhi Updated On: Aug 23, 2017 04:26 PM IST

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तीन तलाक और हलाला: बेगाने तलाक में दीवाने होने से बेहतर खुद में झांकिए

एक बार में तीन तलाक खत्म होना किसी ऐतिहासिक सुधार से कम नहीं है. लेकिन इसमें हिंदू समुदाय ने अपने खुश होने की एक अलग वजह खोज ली है. वजह 'एक बार में तीन तलाक' खत्म होना नहीं बल्कि तीन तलाक की एक प्रक्रिया 'हलाला' है.

हलाला...यही वो वजह थी जिसके कारण मीना कुमारी को अमानुल्लाह खान के साथ एक महीना बिताना पड़ा था. तलाक देने के बाद अगर पति पत्नी दोबारा साथ आने चाहे तो उन्हें इस तरीके से गुजरना पड़ता है. यानी अपने पति से दोबारा शादी करने के लिए महिला को किसी पराये पुरुष की पत्नी बनकर एक महीना रहना होगा.

हिंदू पुरुषों की खुशी

बेगाने तलाक में दीवाने होने वाले लोगों की प्रतिक्रियाओं में सबसे ज्यादा तीन शब्द सुनाई दिए- 'हलाला', 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' और यह 'सती प्रथा' के स्तर का सुधार है. वहीं कुछ लोग यह भी कहते सुनाई दिए कि बिना तलाक के बीवी को छोड़कर चले जाने वालों के लिए कानून कब आएगा.

अगर इन प्रतिक्रियाओं को थोड़ा ध्यान से देखें तो समझ में आ जाएगा कि दोनों पक्षों के ज्यादातर लोगों की सहानुभूति महिलाओं के साथ नहीं अपनी-अपनी धार्मिक विचारधारा को सही साबित करने में है.

सोशलमीडिया के आने और शहरी रहन-सहन में महिलाओं के नौकरी करने के चलते महिलाओं के पास अपनी बात कहने के कई ऑप्शन तो आ गए हैं. मगर समाज में पुरुषों का एक बड़ा तबका उन्हें अभी भी भोग की वस्तु से ज्यादा नहीं समझता. ट्रिपल तलाक के बाद फेसबुक पर आई प्रतिक्रियाओं की बाढ़ को ही देख लीजिए. ट्रोल करने वाले लोग सबसे ज्यादा हलाला पर बात करते दिखेंगे.

इसके पीछे का कारण किसी कुप्रथा का विरोध नहीं है. ज्यादातर लोग बस इस कल्पना मात्र से खुश होते हैं कि किसी विशेष समुदाय में एक ऐसी मान्यता है जिसमें एक महिला को तलाक के बाद किसी गैर पुरुष के साथ रात गुजारनी पड़ती है. और बार-बार यह बात बताकर वो अपने धर्म का गर्व दिखा रहे हैं. लेकिन अपनी कमियां नहीं देखीं. ऐसा नहीं हुआ कि उन्होंने अपने धर्म की बेतुकी कुरीति को खत्म किया तो हम अपनी कुरीतियों की ओर जरा ध्यान दें.

domestic violence

प्रतिकात्मक तस्वीर

हिंदू समाज है जो लड़कियों के जन्म पर रोता है

आजतक गरीब से गरीब परिवार में लगातार दो या तीन बच्चे (लड़के) के जन्म होने पर उन्हें निराश, दुखी होते नहीं देखा गया. कभी नहीं कहते सुना गया कि आखिर इनका पालन पोषण कैसे करेंगे, कैसे पढ़ाएंगे, कैसे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे.

लेकिन किसी गरीब क्या, किसी मिडिल क्लास परिवार में भी अगर बिना लड़के के दो लड़कियों का जन्म हो जाए तो परिवार दुखी होता है. क्यों? इसलिए नहीं कि उसका पालन-पोषण कैसे होगा. उनकी पढ़ाई-लिखाई कैसे कराएंगे? बल्कि इसलिए कि अब इसकी शादी कैसे करेंगे. मतलब इतना दहेज कैसे लाएंगे?

ये किसी मुस्लिम समाज की नहीं हिंदू समाज की बात है. जिस समाज मैं पली-बढ़ी हूं. जिसे करीब से देखा है. उसकी कुरीतियों और औरतों को उसमें बखूबी पिसते हुए देखा है. दहेज के लिए कानून तो बना दिए गए लेकिन उस कानून को कितना फॉलो किया जा रहा है ये हमसभी को अच्छी तरह मालूम है.

लड़के का परिवार न तो दहेज मांगने में परहेज कर रहा है, न किसी लड़की के परिवार को दहेज देने से गुरेज है. और लड़कियों वे इस लायक नहीं बनाते कि वो इसका विरोध कर सके. उस एक तय सीमा तक पढ़ाना-लिखाना, उसकी पूरी परवरिश ही इस तरह की जाती है कि वो इसके खिलाफ बोल ही न पाए. या फिर उसके पास कोई दूसरा विकल्प न रह जाए.

दहेज का कानून भी हमारे यहां वैसे ही काम कर रहा है जैसे बाल विवाह पर बना कानून. जो कागजों पर तो दिख रही है लेकिन आपका समाज आज भी इससे मुक्त नहीं हो पाया है. वैसे तो पूरे भारत में लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुछ राज्यों में आज भी बाल विवाह के मामले खत्म नहीं हुए हैं.

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वैवाहिक होने का सबूत

सिर्फ तीन तलाक ही नहीं बुर्के के नाम पर भी हिंदू खूब ढिंढोरा पिटते हैं. सोशल मीडिया पर तो इसके लिए भी बहस छिड़ी ही रहती है.

हम आप बड़े शहरों में रह रहे हैं. यहां किसी लड़की का शादी के बाद मैरिज सिंबल लगाना न लगाना उसकी पसंद पर निर्भर करता है. वहीं आप हिंदुस्तान के किसी गांव में चले जाइए एक हिंदू शादीशुदा औरत का शादी के बाद सिंदूर चूड़ी जैसी शादी की निशानियां नहीं लगाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. यहां तक कि सरकार ने भी इन्हें औरतों के सुहाग की निशानी समझते हुए टैक्स फ्री किया है. आपका ही समाज है जो औरतों से कुंवारे होने का भी सबूत मांग रहा है और वैवाहिक होने का भी. ये औरतों के हक में है? कभी औरतों के पूछा गया कि ये उनके हक में है या नहीं.

आपके यहां 'मैरिटल रेप' के लिए कोई सख्त कानून नहीं बन पाया है. यहां तक कि इसे रेप की कैटेगरी में भी नहीं रखा गया है. ऐसे कई रीतियां हैं जिनमें औरतें पिसती जा रही हैं.

रिश्ते लंबे समय तक चले तो उसके बेहतर होने की गारंटी नहीं

आज तीन तलाक़ को लेकर कोर्ट का फैसला वाकई खुश होने वाला है, लेकिन इतने सारे हिंदू पुरुष जो एक साथ खुश हुए जा रहे हैं जैसे इनके अपने समाज में कोई बड़ा बदलाव हुआ है.

अक्सर हमें सुनने को मिलता है कि तलाक से महिला की जिंदगी बर्बाद हो जाती है. पश्चिम में इतने तलाक होते हैं कि परिवार और बच्चों का सही से पालन पोषण नहीं होता. दोनों ही तथ्य पूरी तरह से बेबुनियाद हैं. तलाक होना किसी भी महिला या पुरुष दोनों के लिए एक तकलीफदेह अनुभव होता है. महिलाओं के मामलों में समाज इसे ज्यादा मुश्किल बना देता है.

जिस सोसायटी में परिवार वाले लड़कियों की शादी प्रेम से नहीं अपने सिर पर रखे बोझ या सामाजिक दिखावे के लिए करने की बात करते हों वहां विवाह संस्था से अलग होने को कैसे सामान्य नजर से देखा जा सकता है.

दूसरी तरफ हमारे समाज में (लगभग सभी धर्मों में बराबर रूप से) अभी बड़ी तादाद में लड़कियों को आत्मनिर्भर होने के लिए नहीं ‘पति की सेवा’ के लिए पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया जाता है. ऐसे में तलाक होने से ज्यादा खराब प्रभाव तलाक के बाद महिला के आश्रयहीन हो जाने से पड़ता है. और शहरी इलाकों में जैसे-जैसे महिलाओं के आत्मनिर्भर होने का प्रतिशत बढ़ रहा है, तलाक के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं.

इससे यह भी माना जा सकता है कि रिश्ते के लंबे समय तक चलने की वजह किसी एक का उस रिश्ते में घिसना भी हो सकता है. बेशक ज्यादातर मामलों में औरतों को ही. क्योंकि इसकी एक वजह हो सकती है एक महिला का पूरी तरह अपने पति पर निर्भर रहना.

हमारे समाज की मान्यता है कि (हिंदू मुस्लिम या फिर कोई भी धर्म) लड़की को दूसरे घर जाना है. उसके बचपन से ही उसे ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है. फिर शादी के बाद उसके पति का घर ही उसका सबकुछ है. तो समाज और अपनी डिपेंडेंसी का ध्यान रखते हुए न जाने इस देश में कितनी ही औरतें एक रिश्ते को झेलती रह जाती हैं. फिर कई बार बच्चे हो गए तो फिर बच्चों का ध्यान रखते हुए रिश्ते खींचती रह जाती हैं. इसलिए भी अब बड़े शहरों में तलाक ज्यादा हो रहे हैं.

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तलाक के अनुपात

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2003 से 2011 के बीच महानगरों में आए तलाक के मामले 350 प्रतिशत तक बढ़े हैं. इनमें से भी ऐसे मामलों की बड़ी तादाद है जहां शादी के साल भर के अंदर ही तलाक हो गया.

दरअसल मोबाइल और इंटरनेट के तेज़ी से फैलने के बाद पिछले 15-20 सालों में हमारे समाज मे लड़के लड़कियों के बीच का संवाद बहुत आसान हो गया है. स्कूल कॉलेजों में अलग-अलग बैठने, छोटे शहरों में लड़कियों के स्कूल के बाद घर से न निकलने. किसी आम हाउसवाइफ के अपने अड़ोस-पड़ोस की दोस्ती महिलाओं तक सीमित रहने जैसी बातें अप्रासंगिक हो गई हैं.

समाज में कम्युनिकेशन तो एक झटके के साथ बदल गया है लेकिन समाज में लड़के-लड़कियों की परवरिश के तरीके और खास तौर पर शादी, प्रेम के मामलों में लोगों की सोच नहीं बदली हैं. इस फर्क का असर कई तरह से दिखता है. सोशलमीडिया पर आप किसी भी लड़की को मिलने वाले मेसेज देख लीजिए. अच्छे खासे पढ़े लिखे भली बातें करने वाले लोग निहायत ही घटिया बातें करते दिख जाएंगे.

पति पत्नी के बीच में शक और उसको लेकर अलगाव होना भी कोई नई बात नहीं है. मामला यहीं तक सीमित नहीं है. साल 2014 में अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक और रिपोर्ट की मानें तो तक गुजरात में औसतन 250 केस हर साल डीएनए टेस्ट के लिए दर्ज होते हैं. जिनमें बच्चे के जैविक पिता किसी और के होने का शक होता है. चौंकाने वाली बात ये है कि 98 प्रतिशत मामलों में ये शक सही साबित होता है. और किसी भी खास धर्म का अनुपात नहीं था बल्कि यह एक जेनरल रिपोर्ट थी.

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ऐसे फैसले लगातार होते रहने चाहिए

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाकई सराहनीय है. ये मुस्लिम औरतों की बहुत बड़ी जीत है. अगर इसे किसी सरकार के वोट बैंक का जरिया भी बताएं तब भी ये फैसला बेशक समाज के हित में है. विपक्ष को इसमें कमियां बताने के बजाय कोई और मुद्दा उठाना चाहिए.

चाहे भी कोई भी धर्म हो, इसकी कुप्रथाओं को किसी भी सूरत में खत्म होना चाहिए. इन पर बात होनी चाहिए. सोशल मीडिया के ज्ञान से दूर अपने भीतर झांक कर देखिए, आपके यहां की औरतों को क्या कुछ नहीं झेलना पड़ता है.

 

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