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तीन तलाक आस्था का मामला है, गैर-इस्लामी बताने वाले हम कौन: सिब्बल

कपिव सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक उसी तरह की मान्‍यता है जैसे कि हिंदू मानते हैं कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे.

FP Staff Updated On: May 16, 2017 08:23 PM IST

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तीन तलाक आस्था का मामला है, गैर-इस्लामी बताने वाले हम कौन: सिब्बल

तीन तलाक के मसले पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की दलीलें सुनीं. एआईएमपीएलबी के वकील कपिल सिब्‍बल ने कहा कि तीन तलाक आस्था का मामला है.

मुस्लिम पिछले 1400 साल से पालन करते आ रहे हैं, इसलिए इस मामले में संवैधानिक नैतिकता और समानता का सवाल नहीं उठता है. उन्‍होंने कहा कि तीन तलाक उसी तरह की मान्‍यता है जैसे कि हिंदू मानते हैं कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे.

कपिल ने कहा, 'तीन तलाक सन् 637 से है. इसे गैर-इस्लामी बताने वाले हम कौन होते हैं. मुस्लिम बीते 1400 सालों से इसका पालन करते आ रहे हैं. यह आस्था का मामला है. इसलिए इसमें संवैधानिक नैतिकता और समानता का कोई सवाल नहीं उठता.'

उन्‍होंने एक तथ्‍य का हवाला देते हुए कहा कि तीन तलाक का स्रोत हदीस में मिलता है. यह पैगम्बर मोहम्मद के समय के बाद अस्तित्व में आया.

पुरुष प्रधान समाज भेदभाव करते हैं

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कहा गया कि विवाद सिर्फ तीन तलाक के मुद्दे को लेकर नहीं है, बल्कि समुदायों के बीच पुरुष प्रधानता की व्यापक मौजूदगी भी है. सभी पुरुष प्रधान समाज भेदभाव करते हैं.

बोर्ड के वकील सिब्‍बल ने कहा, 'सभी पुरूष प्रधान समाज पक्षपाती हैं. हिंदू धर्म में पिता अपनी संपत्ति किसी को भी वसीयत कर सकता है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में ऐसा नहीं है.

मैं हिंदू समाज में ऐसी कई परंपराओं की ओर इंगित कर सकता हूं. क्या यह सही है कि कोई महिला तलाक के लिए आवेदन करे और 16 साल तक संघर्ष करे और उसे कुछ हासिल नहीं हो.'

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में बहुविवाह की प्रथा है, लेकिन इसे सुरक्षा हासिल है क्योंकि यह परंपरा है और सिर्फ समाज यह फैसला करेगा कि इसे कब बदला जाएगा.

समुदाय के लोगों में 'मैं ही क्‍यों' जैसे सवाल 

सिब्‍बल ने साथ ही कहा कि यह जो सुधार के कानून की मांग बहुसंख्‍यकों की ओर से आ रही है. बहुसंख्‍यक लोग अल्‍पसंख्‍यकों के लिए कानून नहीं बना सकते. इस तरह की मांग अल्‍पसंख्‍यकों के अंदर से उठनी चाहिए.

उन्‍होंने कहा, 'पर्सनल लॉ में दखल देने पर हम फिर कहां तक जाएंगे? यदि आप दखल देना शुरू कर देंगे तो फिर अंतिम सीमा कौनसी है? हम कहां तक जाएंगे? फिर समुदाय के लोगों में 'मैं ही क्‍यों' जैसे सवाल उठने लगेंगे.''

पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से 17 मई को भी दलीलें पेश की जाएंगी. तीन तलाक पर सुनवाई कर रही संवैधानिक पीठ में चीफ जस्टिस जेएस खेहर के साथ ही जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

न्यूज़ 18 साभार

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