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जेंडर नहीं, रूढ़िवादी समाज है ट्रांसजेंडर्स की असली मुश्किल

भारत ही नहीं अमेरिका में भी ट्रांसजेंडर को नहीं मिल पाया है समाज में हक

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jul 27, 2017 10:48 PM IST

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जेंडर नहीं, रूढ़िवादी समाज है ट्रांसजेंडर्स की असली मुश्किल

क्या आप महिला या पुरुष हैं? अगर हां तो यह आपके लिए अच्छी बात है, क्योंकि आप अपने अधिकारों की बात कर सकते हैं. लेकिन अपने अधिकारों की बात करने का हक ट्रांसजेंडर को नहीं है.

ट्रांसजेंडर समाज का वो तबका है, जिनके पास अपने हक की बात करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है, 'ट्रांसजेंडर के लिए कोई साफ कानून नहीं है. कोई कानून नहीं होने की वजह से इनके पास कोई अधिकार भी नहीं है.'

ट्रांसजेंडर के साथ पक्षपातपूर्ण बर्ताव सिर्फ भारत जैसे विकासशील देश में ही नहीं बल्कि अमेरिका में भी होता है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की सरकार ने यह फैसला लिया है कि अब आर्मी में ट्रांसजेंडर की बहाली नहीं होगी. डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार ने एक साल पहले ही आर्मी में ट्रांसजेंडर की बहाली की अनुमति दी थी. लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप ने बराक ओबामा की इस पॉलिसी को बदल दी है.

कानून का कोई सहारा नहीं

भारत में अभी ट्रांसजेंडर के लिए कोई खास कानून नहीं बना है, लिहाजा उनकी दिक्कतें फिलहाल खत्म होने के नाम नहीं ले रही हैं. गुप्ता बताते हैं, 'अभी तक देश में सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही कुछ सहूलियतें दी जाती है. केंद्र के स्तर पर अभी तक इनके हक या अधिकार के लिए कोई काम नहीं किया गया है.'

स्थानीय स्तर पर दी गई सहूलियतों की बात करें तो सबसे पहले कोच्चि मेट्रो स्टेशन का नाम आता है. इस मेट्रो स्टेशन में ट्रांसजेंडर की नियुक्ति के लिए रिजर्वेशन दिया गया था. रिजर्वेशन की वजह से यहां एक तिहाई कर्मचारी ट्रांसजेंडर हैं. कोच्चि मेट्रो लॉन्च करने के लिए खासतौर पर ट्रांसजेंडर की टीम तैयार की गई थी.

ट्रांसजेंडर को मेनस्ट्रीम में लाने की सबसे पहली कोशिश केरल ने ही की थी. लेकिन केरल सरकार की यह कोशिश कुछ खास रंग नहीं दिखा पाई. कोच्चि मेट्रो स्टेशन के पहले चरण में 21 ट्रांसजेंडर की नियुक्ति की गई थी. दूसरे चरण में 20 और ट्रांसजेंडर की नियुक्ति करने की योजना थी. इससे पहले और ट्रांसजेंडर की नियुक्ति होती 8 ने नौकरी छोड़ दी.

समाज का बदलना भी जरूरी

कोच्चि मेट्रो शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर एक तिहाई ट्रांसजेंडर के नौकरी छोड़ने की आखिर क्या वजह थी. वजह थी उन्हें किराए पर घर ना मिलना. तमाम कोशिशों के बावजूद ट्रांसजेंडर को रहने के लिए घर नहीं मिला, जिसके बाद उनके पास घर छोड़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था.

ट्रांसजेंडर में समलैंगिक भी आते हैं. समय-समय पर ये लोग मार्च निकालकर अपनी मांग रखते हैं. लेकिन धारा 377 के तहत समलैंगिकता कानूनन अपराध है. धारा 377 के तहत किसी भी तरह का अप्राकृतिक सेक्स को अपराध माना जाता है.

विराग गुप्ता कहते हैं कि इंडियन आर्मी में ट्रांसजेंडर के लिए कोई स्पेशल पैमाना नहीं बनाया गया है. महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग पैमाने होते हैं, जिसमें ट्रांसजेंडर किसी भी तरह से फिट नहीं हो पाते. गुप्ता कहते हैं कि ट्रांसजेंडर की शारीरिक बनावट के कारण वे पुरुष या महिला की कैटेगरी में फिट नहीं हो सकते हैं. उन्होंने कहा, 'जब तक ट्रांसजेंडर के लिए कोई खास कैटेगरी नहीं बनाई जाती तब तक उनके नौकरी करने पर पाबंदी ही मानी जाएगी.'

हालांकि केरल सरकार ने ट्रांसजेंडर को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास जरूर किया है. लेकिन मौजूदा हालात देखकर यह साफ है कि हर स्तर पर कोशिश करने के बाद ही ट्रांसजेंडर को सम्मान और काम मिल सकता है.

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