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राजनीति के गुरु कैसे बन गए तांत्रिक चंद्रास्वामी

यह उस वक्त की बात है जब थानवी मुंबई में एक व्यापारिक संस्था के साथ काम करते थे

Narayan Bareth Updated On: May 24, 2017 06:41 PM IST

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राजनीति के गुरु कैसे बन गए तांत्रिक चंद्रास्वामी

कभी नेता उनतक पहुंचते थे और कभी वो नेताओ तक पहुंचते थे. लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो चंद्रास्वामी को पहुंच से दूर रखते थे. अलवर का बहरोड़ चंद्रास्वामी का पुश्तैनी गांव घर है. मगर बहरोड़ में उनके निधन की खबर बहुत साधारण तरीके से सुनी गई. बहुत कम लोग जानते होंगे कि चंद्रास्वामी के सार्वजनिक जीवन में अवतरण ही विवाद के साथ शुरू हुआ.

उन दिनों वे आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में रहते थे. राजस्थान के सियासी गलियारों में कई दशक पहले उनका नाम तब पहली बार सुनाई दिया जब चंद्रास्वामी ने राज्य में एक कांग्रेस कार्यकर्ता दामोदर थानवी के साथ किसी व्यापारिक सौदे के नाम पर विश्वासघात किया. यह महज इत्तेफाक ही है राज्य निशक्तजन आयोग के पूर्व अध्यक्ष स्व. थानवी का निधन भी 23 मई ,2015 को हुआ.

नेमीचंद जैन ने किया था घपला

यह उस वक्त की बात है जब थानवी मुंबई में एक व्यापारिक संस्था के साथ काम करते थे और अखबार में छपे सस्ते स्क्रेप की उपलब्धता के इश्तिहार ने उनका ध्यान खींचा. यह विज्ञापन हैदराबाद में स्क्रैप उपलब्ध कराने को लेकर था. थानवी ने संपर्क किया और अगले दिन हैदराबाद पहुंच गए.

Chandraswami passed away

वे बताए हुए पते पर हैदराबाद की एक तंग गली में पहुंचे तो एक व्यक्ति सुबह सुबह लाल मंजन से दांत रगड़ते हुए मिले. ये नेमीचंद जैन थे. नेमीचंद उन्हें सचिवालय ले गया और एक मंत्री के कक्ष के बाहर बैठाकर खुद कक्ष में दाखिल हो गया. थानवी ने दिवंगत होने से पहले मुझे इस वाकये के बारे में बताया. बकौल थानवी ,नेमीचंद ने उन्हें आश्वस्त किया कि स्क्रेप के बारे में सरकार से बात हो गई है.

इस मुलाकात में थानवी, नेमीचंद को वांछित रकम देकर मुंबई लौट गए. लेकिन वक्त बीत गया और स्क्रेप का कुछ नहीं हुआ तो थानवी ने नेमीचंद के विरुद्ध पुलिस में मामला दर्ज करा दिया. यही समय था जब नेमीचंद चंद्रास्वामी के रूप अवतरित हो रहे थे.

यह भी पढ़ें: तांत्रिक चंद्रास्वामी का 66 साल में निधन, नरसिम्हा राव के दौर में अचानक चर्चा में आए थे

कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय नेता ने इसकी पुष्टि करते हुए एक बार मुझे बताया उस वक्त आंध्र प्रदेश के एक नेता ने राजस्थान कांग्रेस नेताओं से संपर्क कर इस मामले में मदद मांगी. क्योंकि थानवी जोधपुर संभाग में एक उदीयमान नेता थे. इस संदेश पर थानवी को दिल्ली बुलाया गया और सुलह सफाई करवाई गई.

यह चंद्रास्वामी का अपना सूबा था. लेकिन यहां प्रादेशिक नेताओ ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी. उनका नाम 1999 के लोकसभा चुनावो में दौसा में खासा सुर्खियों में रहा.

यहां राजेश पायलट कांग्रेस के उम्मीदवार थे. उनकी सभाओं में लोग रह-रह कर पूछते थे पायलट साहिब आपको शिकस्त देने के लिए ये बाबा कोई यज्ञ कर रहा है. पायलट मुस्कुरा कर कहते ' सुना तो मैंने भी है'. हालांकि इस चुनाव में पायलट विजयी हुए.

चंद्रास्वामी का अंतिम दाह करते हुए उनके परिवार के सदस्य (फोटो: पीटीआई)

चंद्रास्वामी का अंतिम दाह करते हुए उनके परिवार के सदस्य (फोटो: पीटीआई)

चंद्रास्वामी को ज्योतिषा का ज्ञान नहीं था

पूर्व मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने चंद्रास्वामी को कभी अहमियत नहीं दी. पाली में जिला कांग्रेस ने तब केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल को एक समारोह के लिए आमंत्रित किया. इसके साथ गहलोत को भी आमंत्रित किया गया. कहते है गेहलोत ने स्वीकृति दे दी. मगर जैसे इस समारोह में चंद्रास्वामी को बुलाए जाने की जानकारी मिली, गहलोत ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया.

इसे चंद्रास्वामी ने तोहीन समझा और बहुत खफा हुए. इसके कुछ समय बाद गहलोत केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर हो गए. इस पर स्वामी के समर्थको ने प्रचार किया कि स्वामी जी ने उन्हें हटवा दिया.

उस वक्त के एक केंद्रीय मंत्री ने मुझसे कहा यह अजीब बात है ऐसे आदमी की हमारे प्रधानमंत्री [नरसिम्हाराव] तक सीधी पहुंच है. ज्योतिष में पारंगत एक युवा ज्योतिषी ने मुझे एक बार बताया कि चंद्रास्वामी उनके पास जन्मपत्रिया भेजते रहते है, वे होम वर्क कर उन्हें वापस स्वामी तक भेजते है. क्योंकि स्वामी को ज्योतिष ज्ञान नहीं है.

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