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निर्भया कांड: यादों में इस हादसे का जिंदा रहना जरूरी है

हम सब कामना कर सकते हैं एक ऐसी दुनिया की जहां हिंसा नहीं हो, गैरबराबरी नहीं हो

Nivedita Jha | Published On: May 05, 2017 07:04 PM IST | Updated On: May 06, 2017 02:43 PM IST

निर्भया कांड: यादों में इस हादसे का जिंदा रहना जरूरी है

देश में एक बार फिर निर्भया को न्याय देने की मांग गूंज उठी है. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस बर्बरता के लिए माफी नहीं दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को बरकरार रखा.

मुझे नहीं मालूम अदालत के फैसले से हमारी बेटियों की जिंदगी में कोई बदलाव आएगा या नहीं. मैं ये भी नहीं जानती फांसी की सजा से ऐसी बर्बरता रुकेगी या नहीं। उनके ऊपर हो रही हिंसा में कोई कमी आएगी या नहीं.

कोई भी भूल न पाए ये हादसा?

मेरी स्मृतियों में ऐसे अनेक हादसे हैं जिसे मैंने बहुत नजदीक से देखा है. मैंने कई मासूम बच्चियों को खून से लथपथ देखा है. कितनी बच्चियों को अस्पताल में दम तोड़ते हुए देखा है. मैं इस हादसे को कभी नहीं भूल सकती. मेरी तरह कोई भी स्त्री अपने जेहन से इस बर्बर अमानवीय हादसे को भूलने नहीं देना चाहती है.

Nirbhaya

हम चाहते हैं कि हमारा स्मृतिलोप न हो. हमारी यादों में ये हादसे जिंदा रहें ताकि हम अपनी बच्चियों को ऐसे नरपशुओं से मुक्ति दिला सकें.

आज मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा है. हजारों स्त्रियों के स्वर गूंज रहे हैं. जैसे वे कह रही हों आओ बलात्कारियों आओ हमारा बलात्कार करो. आओ देखें तुम्हारी मर्दानगी, देखो हमारी नंगी देह, हमारी टांगें, हमारा स्तन, हमारी योनि, जिसे तुम चील, कौवे की तरह नोच रहे हो.

कब तक जिंदा रहेगी पशुता

हम देखना चाहते हैं तुम्हारे भीतर का पशु कब तक जिंदा रहता है. तुम जो सैनिक हो, पुलिस हो,न्यायाधीश हो, पिता हो, भाई हो, पति हो, बेटे हो, सत्ता के नुमांइदे हो आओ हमारी देह को रौंद दो. फिर भी हम नहीं मरेंगे.

हम सब निर्भया हैं. उसके रक्त से सनी लड़कियां. तुम्हारे तेजाब से जली लड़कियां. तुम जो हमारी योनि में पत्थर भर देते हो, तुम जो हमारी योनि में दुनिया के सारे हथियार घुसेड़ देते हो. फिर भी हम तुम्हें पैदा करते हैं. इस उम्मीद में कि तुम्हारे भीतर का मनुष्य जिंदा रहेगा. हम जिंदा कौम हैं. हम आम लड़कियां हैं.

लहू-लुहान हमारी देह से जीवन के फूल खिलेंगे. जिंदगी से लबरेज हम छत्तीसगढ़ की आदिवासी लड़कियां हैं, हम मणिपुर की लड़कियां हैं, हम कश्मीर की घाटियों से उमड़ आए हैं. आसाम, बिहार, बंगाल, हरियाणा, पंजाब, समेत हम सभी दिशाओं से बहती आ रही हैं.

हम से आबाद हो तुम 

हम हैं तो आबाद है हमारी जमीन, हमारा घर संसार, नदी, तालाब , पोखर. हम हैं तो समुद्र धरती की सतह पर अपने नीले जल के साथ फैल रहा है. हमसे जीवन के हजार रंग घुले-मिले हैं. हमें मंजूर नहीं तुम्हारी हिंसा. किसी भी नाम पर नहीं.

तुम जो अपनी कायरता छुपाने के लिए हमारी देह पर हमला करते हो. तुम हमारा बलात्कार जाति के गौरव के नाम पर करते हो, धर्म की रक्षा के नाम पर करते हो. तुम हमारी गरीबी को अपनी देह से रौंदते हो.

तुम जो हमारा बलात्कार हिंदुस्तान, पाकिस्तान के नाम पर करते हो तुम ये भूल जाते हो हर बार बलात्कार किसी देश, धर्म ,जाति, सत्ता और किसी स्त्री का बलात्कार नहीं करते बल्कि तुम्हारे भीतर जो स्त्री बैठी है उसका बलात्कार करते हो. वो तुम्हारी मां हो सकती है, बहन, पत्नी,बेटी.

हमारे विचारों में है खोट

तुम सारे रिश्ते, समाज, सभ्यता और संस्कृति बलात्कार करते हो. हम सब निर्भया हैं जिसने गहरे दर्द और पीड़ा में भी जिंदगी से न्याय मांगा, प्यार मांगा. घोर दुखों में भी खुशी के अंकुर फूटे. असह्य वेदना में भी उसने कहा कि वह जीना चाहती है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर इमेज)

हम लड़कियां अक्षम्य बर्बरता और असमानताओं के विरुद्ध लड़ते रहेंगे. हम जान गए हैं बलात्कार आदमी के बदबूदार दिमाग में जन्म लेता है. हिंसा और बर्बरता की जड़ें हमारे समाज के विचारों में हैं.

जो समाज स्त्री को वस्तु समझता हो. जो समाज ये समझता हो कि पुरुषों का काम हुक्म चलाना है, जो समाज समझता हो कि किसी स्त्री को न कहने का अधिकार नहीं है. उस समाज में ऐसी ही विचारधारा बलात्कार को जन्म देती है.

हमें भी चाहिए हमारा हक

स्त्रियां अपने जीवन और भावनाओं में उतनी ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जरूरत महसूस करती हैं, जितनी कि पुरुष. लेकिन बचपन से ही उन्हें इस जरूरत के दमन की आदत डाल दी जाती है.

मुझे याद है कि निर्भया के साथ जघन्य अपराध करने वाले बलात्कारियों ने ये कहा कि अगर उसने विरोध नहीं किया होता तो शायद उसके साथ वे लोग इतनी बर्बरता के साथ वे पेश नहीं आते.

इससे भयावह क्या हो सकता है कि एक लड़की के साथ बर्बर, अमानवीय व्यवहार इसलिए किए गए क्योंकि उसने विरोध किया? हम जानते हैं कि हमारी लड़कियां हर दुख के पार जाएंगी.

हमसब कामना कर सकते हैं एक ऐसी दुनिया की जहां हिंसा नहीं हो, गैरबराबरी नहीं हो. हम लड़ें अंतहीन यातनाओं से मुक्ति के लिे. हम लड़ें अपने हक के लिए, हम लड़ें एक रहमदिल और मुहब्बत से लबरेज दुनिया के लिए.

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