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स्मृति ईरानी एक्सक्लूसिव: बुनकरों को पॉलिसी मेकिंग में शामिल कर सुधरेगा कपड़ा उद्योग

टेक्सटाइटल मिनिस्टर स्मृति ईरानी से फ़र्स्टपोस्ट की खास बातचीत.

Ajay Singh Ajay Singh, Pallavi Rebbapragada | Published On: Jun 15, 2017 01:53 PM IST | Updated On: Jun 15, 2017 01:53 PM IST

स्मृति ईरानी एक्सक्लूसिव: बुनकरों को पॉलिसी मेकिंग में शामिल कर सुधरेगा कपड़ा उद्योग

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी को अपनी इमेज को लेकर जरा भी झिझक नहीं है. वो एक ताकतवर नेता हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अचानक विदाई के बाद अब वो कपड़ा मंत्री के तौर पर अपने रोल की बखूबी अदायगी कर रही हैं.

कपड़ा मंत्री के तौर पर उन्होंने ये जाना-समझा है कि धागे बुनना किस तरह से देश की सामाजिक, सियासी और आध्यात्मिक विरासत का हिस्सा है. क्या उन्हें इस बारे में मंत्रालय मिलने से पता था? इस सवाल के जवाब में ईरानी ने कहा कि मेरे बॉस को ये बात पता थी.

फ़र्स्टपोस्ट के अजय सिंह और पल्लवी रेब्बाप्रगडा ने स्मृति ईरानी से तमाम मुद्दों पर खुलकर बात की.

फर्स्टपोस्ट- जब जुलाई 2016 में कैबिनेट में फेरबदल के बाद आपको कपड़ा मंत्री बनाया गया, तो लोगों ने इसे आपका डिमोशन बताया था. आपने इस बदलाव को कैसे लिया?

ईरानी- अगर मैं मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रहती, तो प्रशासन को लेकर मेरी सोच एकतरफा ही रहती. मेरे पिछले मंत्रालय की वजह से मुझे सामाजिक क्षेत्र के हालात के बारे में पता चला. लेकिन सामाजिक मामलों में शिक्षा महज एक पहलू है. ये जो नई जिम्मेदारी मुझे दी गई है, इससे मुझे देश के सामाजिक हालात के सबसे मजबूत पाए यानी आर्थिक हालात की समझ हुई है.

मुझे एक तरफ तो बड़े उद्योगों को समझने का मौका मिला है, तो दूसरे तरफ छोटे पैमाने पर काम करने वालों की दिक्कतों के बारे में भी पता चला है. एक तरफ आप आदित्य बिरला ग्रुप के विस्को कपड़े को बनाने की प्रक्रिया समझते हैं. वहीं दूसरी तरफ बनारसी बुनकरों के काम करने का तरीका पता चलता है.

फ़र्स्टपोस्ट- इस क्षेत्र को लेकर आपके जेहन में पहल ख्याल क्या आया?

ईरानी- कपड़ा उद्योग में ठहराव को समझने के लिए हमने पिछले पांच सालों की सरकारी फाइलें खंगालीं. कुल 40 योजनाओं में से 22 हर साल फेल हो रही थीं. हमारी कोशिश थी कि पैसे बुनकरों तक पहुचें. इसके लिए हमने उन्हें डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर स्कीम से जोड़ा. इससे बीच के दलाल हटे.

मिसाल के तौर पर जो एनजीओ बरसों से बुनकरों के नाम पर पैसे ले रहे थे, उनसे कहा गया कि उन समुदायों के बारे में बताएं, जिनकी वो इतने सालों से मदद कर रहे थे. मैं खुद भिवंडी और सूरत जैसी जगहों पर गई. मैंने वहां के बुनकरों को बुलाया और नीतियां तय करने में उन्हें साझीदार बनाया. क्योंकि आर्थिक क्रांति के लिए ऐसे लोगों की पहल ही बुनियाद बनती है.

बनारस में मैंने देखा कि बुनकर नए हथकरघों के लिए कर्ज लेते हैं. अब हम बुनकरों को हथकरघा खरीदने के लिए 90 फीसद रकम देते हैं. खास तौर से उन लोगों को जिन्होंने नए डिजाइन बनाने और मार्केटिंग के ढब सीख लिए हैं. इन लोगों को सरकारी केंद्रों में नई तकनीकें सिखाई जाती हैं.

फर्स्टपोस्ट- जल्द ही नई राष्ट्रीय कपड़ा नीति लागू की जाएगी. इस क्षेत्र में बड़ी भिन्नताएं हैं. ऐसे में एक नीति से इस सेक्टर का भला कैसे होगा?

ईरानी- आप सही कहते हैं. एक ही नीति से इस क्षेत्र की विविधताओं की चुनौती का सामना नहीं किया जा सकता. कोई भी नीति बनाने में सलाह-मशविरा किया जाता है. इसमें वक्त लगता है. अब इस दौरान सरकार चुप तो बैठ नहीं सकती कि नीति बनने तक इंतजार किया जाए. जब तक हम करघा उद्योग के लिए पॉवरटेक्स इंडिया नीति पर काम कर रहे हैं, तब तक हमने इस सेक्टर के लिए तमाम छोटी नीतियों को लागू करने पर जोर दिया. मसलन, करघों को अपग्रेड करना, सामूहिक कारखाना योजना, यार्न बैंक स्कीम और प्रधानमंत्री क्रेडिट स्कीम के जरिए हमने बुनकरों को जागरूक भी किया, उन्हें नई तकनीक भी मुहैया कराई और उनकी आर्थिक मदद भी की. इससे छोटे बुनकरों को काफी मदद मिली. जो बुनकर काम बंद कर रहे थे, उनकी तादाद भी काफी कम हो गई.

इसके बाद हम बुनाई को लेकर नया पैकेज लेकर आ रहे हैं. दोनों ही मामलों में इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगो को हमने नीतियां बनाने में हिस्सेदार बनाया है. खास तौर से छोटे और मझोले बुनकरों को. उन्हें तरक्की के लिए अच्छा माहौल चाहिए. हमने वो मुहैया कराने की कोशिश की है. हमारा मंत्रालय जमीनी सच्चाई के साथ जुड़कर काम करने में यकीन रखता है.

फर्स्टपोस्ट-अच्छी क्वालिटी मेंटेन करने और बुनकरों के हितों की रक्षा के लिए नेशनल हैंडलूम एक्ट में हथकरघा मार्क को अनिवार्य क्यों नहीं बनाया जाता? हजारों कामगार बेकार हो रहे हैं क्योंकि तकनीक उनकी जगह ले रही है. राजस्थान के सांगानेर में डिजिटल ब्लॉक प्रिंटिंग अब रोटरी मशीनों से हो रही है. वहीं बनारस और तमिलनाडु के कांजीवरम सिल्क बनाने वालों पर चीन के रेशम की मार पड़ रही है.

स्मृति ईरानी- देखिए कुछ उत्पादों पर GI (जियोग्राफिकल इंडिकेटर, यानी स्थान की पहचान का चिह्न) का इस्तेमाल हो रहा है. इससे हमें किसी उत्पाद के कस्बे, इलाके या देश का पता चलता है. हम भी GI टैग इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं. हम अपने बहुत से प्रोडक्ट की सुरक्षा बिना संसद की मंजूरी लिए कर सकते हैं. इसके लिए नेशनल हैंडलूम एक्ट में बदलाव की जरूरत नहीं.

कानून और व्यवस्था राज्य के मसले हैं. जैसे ही केंद्र सरकार को फर्जी उत्पादों के बारे में पता चलता है, वो इससे राज्य सरकारों को बाखबर करती है. इसी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार से आने वाले उत्पादों को रोकने के लिए हम वाणिज्य मंत्रालय और विदेशी कारोबार निदेशालय को अलर्ट करते हैं. हम इन मामलों में वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन की वजह से दखल नहीं दे सकते. लेकिन हम विदेशी व्यापार निदेशालय के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं. हम ये सुनिश्चित करते हैं कि बुनकर और दस्तकार हमारी वेबसाइट के जरिए अपने उत्पादों की मार्केटिंग कर सकें. जिससे खरीदारों को पता चले कि वो अच्छा प्रोडक्ट खरीद रहे हैं.

भारतीय हैंडलूम ब्रांड उत्पादकों को बुनकरों से सीधे खरीद करने में मदद करता है. जैसे महिलाओं के ब्रांड बीबा ने सीधे बुनकरों से 8 लाख मीटर कपड़ा खरीदा. इसी तरह अब एलेन सॉली और पीटर इंग्लैंड ब्रांड की कमीजें भारतीय बुनकरों के कपड़ों से बन रही हैं.

फर्स्टपोस्ट- क्या हथकरघों की जगह मशीनी करघों को कानूनी तरजीह देने से हथकरघा उद्योग को और खतरा नहीं होगा? इस कारोबार के लिए जो कच्चा माल मिलता है, वो खास इलाकों से आने वाली कपास पर निर्भर करता है, जिसे बुना जा सके. ये सब आज नष्ट करना पड़ रहा है. आज कपास की खेती में सबसे ज्यादा अमेरिकी कपास की बुवाई को तरजीह दी जा रही है. लेकिन वो हैंडलूम के लिए तो ठीक होती नहीं. अब बीटी कॉटन भी आ गया है, जो और बड़ी चुनौती है.

स्मृति ईरानी- आज की तारीख में दुनिया ऐसे विकास पर जोर दे रही है, जिससे कुदरत को नुकसान न हो. मिसाल के तौर पर सुविन कपास एक ऐसी वेराइटी है जो मिस्र की मशहूर कपास से बेहतर है. जबकि लंदन और न्यूयॉर्क के फैशन की दुनिया के महारथी मिस्र की कपास के ही मुरीद हैं. जैसे एक मां अपने बच्चों में फर्क नहीं कर सकती, उसी तरह मैं भी कपास को इंसान के बनाए हुए रेशों से अलग नहीं देख सकती. एक देश के तौर पर हम अगर दुनिया भर को आपूर्ति कर सकें, तो हमारा भी भला होगा और दुनिया का भी.

बरसों से हम हैंडलूम सेक्टर की खूबियों के बजाय हमारी गरीबी और बुरे हालात का ही निर्यात करते आए हैं. ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ हमारी चुनौतियां हैं. बाकी दुनिया भी इनका सामना कर रही है. लेकिन वो चुनौतियों के बीच कामयाबी और गर्व की कहानियां सुनाना ज्यादा पसंद करते हैं. इसी तरह हमें अपना बाजार बनाने के लिए अपने उत्पादों की खूबी को बेचना होगा, चुनौतियों को नहीं.

आज हाथ से बने सामान का बाजार 37 हजार करोड़ रुपयों का है (इस बातचीत के दौरान कपड़ा मंत्रालय के सचिव अनंत कुमार सिंह स्मृति ईरानी के बगल में सूती धोती और कुर्ता पहनकर बैठे थे. इसके जरिए भी ईरानी ने अपने यकीन का संदेश देने की कोशिश की). हमारे मशहूर डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी कहते हैं कि वो अपनी भारतीय विरासत पर गुरूर करते हैं.

फर्स्टपोस्ट-नरेंद्र मोदी की सरकार खादी को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने पर काफी जोर दे रही है. चरखे चलाने के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है. हाथ से बुनी खादी को जीरो कार्बन फुटप्रिंट प्रोडक्ट के तौर पर मार्केट किया जा रहा है. इसकी लागत कम करके उत्पादन बढ़ाने से खादी को कितना फायदा हुआ है? क्या 2017 में खादी हमारी आत्मनिर्भरता की प्रतीक बनेगी?

स्मृति ईरानी- मैं खादी की तरक्की होते हुए देख रही हूं. ये तेजी से बाजार बढ़ा रही है क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी लगातार जनता से खादी अपनाने की अपील कर रहे हैं. जैसे ही आपके ग्राहकों की तादाद बढ़ेगी, उद्योग भी इसमें दिलचस्पी लेने लगेंगे. फिर ये ब्रांड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता बटोरना शुरू करेगा. मांग बढ़ने के साथ ही कच्चे माल की कीमत भी घटेगी.

फर्स्टपोस्ट- सरकार ने कपास के रेशों, धागों और कपड़ों पर जीएसटी पांच फीसद तय किया है, जबकि फिलहाल सिल्क और जूट पर कोई टैक्स नहीं. इसी तरह सिंथेटिक फाइबर या हाथ से बने यार्न पर 18 फीसद जीएसटी रखा गया है. तो ऐसे में हाथ से बने रेशे और सिंथेटिक रेशों के बीच फर्क नहीं किया जा रहा है? इससे कपड़ा उद्योग को नुकसान नहीं होगा?

स्मृति ईरानी- हमारे देश में कभी भी सिंथेटिक फाइबर, हाथ से बने कपड़े और कपास को एक पैमाने पर नहीं रखा गया. पहले अगर आप राज्य और केंद्र सरकार के टैक्स जोड़ लेते थे, तो आपको कुल 35 फीसद तक टैक्स देना पड़ता था. अब जीएसटी ने इसे 18 फीसद कर दिया है. ऐसे में कपड़ा उद्योग को तो खुश होना चाहिए. 1 जुलाई से लागू हो रहे जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा ये है कि 1000 रुपए से कम के कपड़े पांच फीसद के टैक्स के दायरे में आएंगे. ये ग्राहकों से लिए सुनहरा मौका और वरदान जैसा होगा.

फर्स्टपोस्ट- स्थानीय उत्पाद बेचने में राज्यों के सरकारी एंपोरियम कैसे मदद कर सकते हैं? जैसे मध्य प्रदेश का मृगनयनी, गुजरात के गार्वी और यूपी के गंगोत्री एंपोरियम. ऐसे एंपोरियम आम तौर पर हैंडीक्राफ्ट और कपड़े के म्यूजियम बन जाते हैं. इन्हें तो स्थानीय ब्रांड को बढ़ावा देने में अच्छी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इन एंपोरियम की मदद से हम घरेलू बाजार में अच्छी पैठ बना सकते हैं न?

स्मृति ईरानी- ये राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वो अपने उत्पादों की मार्केटिंग अच्छे से करें. मैंने देखा है कि मृगनयनी और पश्चिम बंगाल की बिस्वा बांग्ला काफी अच्छा काम कर रहे हैं. आज ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन से आने वाले टूरिस्ट हमारे यहां के हथकरघा उद्योग को समझना चाहते हैं. अंतरराष्ट्रीय टूर ऑपरेटर भी इसे अपने पैकेज में शामिल कर रहे हैं. हमने इस बारे में पर्यटन मंत्रालय से बात की थी. उनसे ये कहा था कि अगर हम इस तरह का टूरिस्ट सर्किट विकसित करना चाहें, तो हम इसमें आपके साझीदार हो सकते हैं.

फर्स्टपोस्ट- भारत की फैशन मार्केट आज 67 अरब डॉलर की है. ये पश्चिम एशिया के 15 बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाों के बराबर है. अमेरिका और चीन के बाजार की अर्थव्यवस्था के ये पांचवें हिस्से के बराबर है. डिजाइन के सेक्टर में काम धीमा होता है. इसमें काफी निवेश की जरूरत होती है. पैसे के साथ वक्त भी काफी लगता है. कई लोग एक खास बुनाई को लेकर दो-दो साल तक का वक्त और पैसे निवेश करते हैं. आप छोटे और बड़े कारोबारियों को इस काम में किस तरह मदद करने की सोच रही हैं?

स्मृति ईरानी-अगर कोई डिजाइनर किसी बुनकर के साथ मिलकर काम करना चाहता है, तो इसमें सरकार का कोई रोल नहीं. कई ऐसी मिसालें हैं जिसमें बुनकरों ने शिकायत की कि किसी डिजाइनर ने उनका डिजाइन चोरी कर लिया. क्योंकि उसका अपने डिजाइन का कॉपीराइट नहीं था. ऐसे हालात में डिजाइनर को मदद की नहीं, बुनकर की तरफ मदद का हाथ बढ़ाने की जरूरत है. हर बुनाई केंद्र में एक डेस्क होती है जो बुनकरों के पुश्तैनी डिजाइन के संरक्षण में मदद करती है.

अपनी लिनेन साड़ियों के लिए मशहूर अनाविला मिश्रा पश्चिम बंगाल के बुनकरों के साथ जुड़ीं और उनके डिजाइन को इकट्ठा किया. उन्होंने तो हमसे कोई मदद नहीं मांगी. रॉ मैंगो के संस्थापक संजय गर्ग मेरे साथ गुजरात के सुरेंद्रनगर गए. वो वहां के तंगालिया आदिवासियों के साथ काम करना चाहते थे. इसी तरह राजेश प्रताप सिंह बरसों से सुविन धागे को इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया को इसकी हाल के दिनों तक खबर नहीं थी.

फर्स्टपोस्ट- लोगों को बुनकरों से जोड़ने में चुनौतियां क्या हैं? राज्यों में सर्विस सेंटर बनाने की क्या अहमियत है? क्या अच्छे बुनियादी ढांचे और संसाधनों से युवाओं को तकनीकी ढब हासिल होगा?

स्मृति ईरानी- आप किसी भी कारीगरी को तभी जोशीला बना सकते हैं, जब इसमें मुनाफा भी जुड़े और उत्पादकता भी बढ़े. कुछ परिवार इस बात की अहमियत को समझ रहे हैं. इसी वजह से बुनकरों के कई परिवार हर पीढ़ी के साथ नए ढब, नई चीजें और तकनीकों को अपने काम से जोड़ रहे हैं. वो अंग्रेजी में बात करके अपने ग्राहकों से बेहतर राब्ता बना लेते हैं. वो इस तरह से अपनी कला और कारीगरी के इतिहास को और अपने उत्पाद की खूबियों को समझा बाते हैं.

इस काम में नए लोग भी आने और जुड़ने चाहिए. तभी कपड़ा हमारी विरासत का हिस्सा बन गया. और आप जिन बुनकर सर्विस सेंटर की बात कर रहे हैं. आज देश भर में वैसे 28 केंद्र हैं. इसकी कमेटी में लैला तैयबजी और जया जेटली, अनाविला मिश्रा और सब्यसाची बनर्जी जैसे लोग आगे आकर जुड़ रहे हैं. उनकी कोशिश है कि अच्छा माल उपलब्ध हो. बैठकें करके रेशों पर रिसर्च करके उसे बुनकरों तक पहुंचाया जा रहा है.

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