विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

स्मार्ट सिटी मिशन को चाहिए भरपूर पैसा

2019-20 तक मोदी सरकार को 100 शहरों में कायाकल्प का काम पूरा करना है, पर यह मिशन कछुआ चाल से आगे बढ़ रहा है.

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Jan 16, 2017 04:50 PM IST

0
स्मार्ट सिटी मिशन को चाहिए भरपूर पैसा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 में 100 स्मार्ट शहरों की योजना से हर निवासी का गदगद होना स्वाभाविक था. तब आमजन को अरसे बाद लगा था कि देश में किसी विकास पुरुष का अवतरण हुआ है.

यह विश्वास भी मजबूत हुआ था कि जल्द ही शहर समस्या मुक्त हो जायेंगे. इसकी खास वजह यह थी कि स्मार्ट सिटी का संकल्पना बड़ी अनूठी और मनभावन थी.

शहरी विकास मंत्रालय ने इसके लिए मानक निर्धारित किए थे. जैसे छोटे और मझोले शहरों में अधिकतम यात्रा समय 30 मिनट होना चाहिए. पानी की उपलब्धता प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 135 लीटर होनी चाहिए.

95% आवासों के 400 मीटर के दायरे में खुदरा दुकानें, पार्क, प्राथमिक स्कूल और मनोरंजन स्थल होने चाहिए. लेकिन अब प्रधानमंत्री मोदी भी स्मार्ट सिटी मिशन का नाम नहीं लेते हैं और भाजपा का बड़ा नेता हो या कार्यकर्ता स्मार्ट सिटी का नाम लेने से कतराता है.

इस महत्वाकांक्षी योजना में दोबारा जान डालने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली को इस बजट में भारी आवंटन करना पड़ेगा, कम से कम पहले से 300-400% ज्यादा.

असल में स्मार्ट सिटी का सपना 2014 में अपने चुनावी भाषणों में नरेंद्र मोदी ने देश को दिखा दिया था. 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में भी स्मार्ट सिटी के नाम लिए हुए बिना इस योजना का जिक्र था.

इस वजह से मोदी सरकार के पहले बजट में 7040 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम इस योजना के हिस्से में आयी. तब अधिकांश विशेषज्ञों ने देश में आवास और शहर के बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने के लिए मोदी के स्मार्ट सिटी मिशन को पहले की योजनाओं से बेहतर बताया था.

नौ दिन चले ढाई कोस

city

2019-20 तक मोदी सरकार को 100 शहरों में कायाकल्प का काम पूरा करना है, पर विडम्बना यह है कि यह मिशन कछुआ चाल से आगे बढ़ रहा है.

इस महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा हुई 2014 में, इसका नामकरण हुआ 2015 में, इसका पहला मसौदा आया जून 2015 में, पर स्मार्ट शहरों की पहली सूची आई जनवरी 2016 में, जिसमें 20 शहरों का नाम था.

13 शहरों की दूसरी सूची आई मई में और तीसरी सूची आयी सितंबर में जिसमें 27 शहर हैं. इस प्रकार अब तक 60 शहर स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल हो चुके हैं. जिन पर 1.45 लाख करोड़ रुपए का खर्च प्रस्तावित है.

अब भी 40 शहरों के नाम आने शेष हैं, तब  स्मार्ट सिटी के 100 नाम पूरे हो पाएंगे. वित्त मंत्री ने अपने पहले बजट 2014-15 में 7040 करोड़ की विशाल राशि आवंटित की, पर खर्च हुए महज 924 करोड़ रुपए.

2015-16 में यह आवंटन घट कर महज 143 करोड़ रुपए रह गया. 2016-17 में आवंटन हुआ 3205 करोड़ रुपए.

स्मार्ट सिटी के विशाल लक्ष्यों को देखते हुए आवंटित कुल राशि काफी कम है. पर यह दोष वित्त मंत्री अरुण जेटली का कम, शहरी विकास मंत्रालय का ज्यादा है.

कुंडली में ही दोष

100 शहरों के स्मार्ट सिटी मिशन की कुंडली में ही जन्मजात दोष है. जब इसके लिए सर्वाधिक आवंटन  हुआ, उस समय बताया गया कि यह आवंटन नितांत नए शहरों के बसाने के लिए नहीं है, बल्कि मौजूदा शहरी बसावट के पास स्मार्ट सिटी नमूने के आधार पर सेटेलाइट टाउन बनाना है.

तब दिलो दिमाग में मोदी की देन गुजरात के 'गिफ्ट सिटी' का नाम उभरना स्वाभाविक था जो एक निवेशक सिटी ज्यादा है. पर जून 2015 में स्मार्ट शहरों के चुनाव, विकास के लिए दिये निर्देश जारी किए गए और पूरा दस्तावेज सामने आया. तब आमजन के लिए स्मार्ट सिटी को समझना अबूझ पहेली बन गया.

smart city

इस योजना के चार कर्णधार हैं- केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय क्षेत्र निकाय और प्राइवेट सेक्टर. इस दस्तावेज में इतने भारी-भरकम शब्द और प्रक्रिया हैं कि उन्हें समझने के लिए कम से कम स्थानीय नगरनिगमों या नगरपालिकाओं को समझने-बूझने के लिए अनेक बाहरी विशेषज्ञों को रखना पड़ेगा और करोड़ों रुपए भी खर्च करने पड़ेंगे.

अब स्मार्ट सिटी की संकल्पना गुजरात की 'गिफ्ट सिटी' से अहलदा है. अब स्मार्ट सिटी केवल निवेशक सिटी नहीं होगी. पर इस योजना की सबसे बड़ी कमजोरी है निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता.

अब तक जो भी योजनाएं खास कर बुनियादी ढांचा सेक्टर में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के भरोसे छोड़ी गयी, उनके अनुभव और नतीजे बेहद निराशाजनक हैं.

देश के विकास के लिए अहम योजना 

स्मार्ट सिटी योजना देश के लिए कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अनुमान मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीटयूट की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक देश में 70% रोजगार अवसर शहरों में सृजित होंगे और सकल घरेलू उत्पाद में शहरों का योगदान 70% से अधिक होगा.

इसके साथ प्रति व्यक्ति आय में भी चार गुना इजाफा होगा. इसके लिए भारी निवेश की दरकार होगी. शहरी आधारभूत ढांचे पर निवेश अुनमानों के लिए बनी विशेष सशक्त कमिटि का कहना है कि इसके लिए आगामी 20 सालों तक 43,386 रुपए प्रति व्यक्ति निवेश की आवश्यकता पड़ेगी.

10 लाख की औसत आबादी के आधार पर 100 स्मार्ट शहरों के विकास के लिए आगामी 20 साल में 7 लाख करोड़ रुपए निवेश की जरूरत होगी. यानी सालाना लगभग 35 हजार करोड़ रुपए.

अब तक तीन सालों में मोदी सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन के लिए आवंटित किए हैं, कुल 10479 करोड़ रुपए. स्मार्ट सिटी योजना के मूल प्रस्ताव के अनुसार पांच साल की अवधि में इस पर खर्च होने हैं एक लाख करोड़ रुपए.

इसमें तकरीबन 48 हजार करोड़ रुपए केंद्र सरकार को देने हैं और इतने इतनी ही राशि राज्यों और स्थानीय निकायों को खर्च करनी है.

इस हिसाब से आगामी दो सालों में कम से कम 19800 करोड़ रुपए केंद्र सरकार को देने हैं. जाहिर है कि आगामी बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली को 2016-17 में आवंटित रकम से कम से कम 300-400% अधिक आवंटन स्मार्ट सिटी मिशन के लिए करना पड़ेगा.

फिलहाल इस वक्त तो मोदी सरकार की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अपने पुराने संस्करण जवाहरलाल नेहरू नेशनल रीन्यूल मिशन (जेएनएनआरएम) से पिछड़ती नजर आ रही है.

इसकी शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में की थी. इस मिशन में 7 सालों में 65 शहरों पर एक लाख करोड़ रुपए का निवेश लक्ष्य था. इसका 80% ही इस मिशन पर खर्च हो पाया है.

स्मार्ट सिटी मिशन में 100 शहरों पर एक लाख करोड़ खर्च का लक्ष्य पांच सालों में है. यदि महंगाई का असर निकल दें, तो मोदी सरकार का इस योजना में वास्तविक खर्च लक्ष्य मनमोहन सिंह सरकार से कम है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi