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एमपी: यहां पिस्टल से लेकर मशीनगनों का है घरेलू उद्योग!

इंदौर के पास कुछ इलाकों में बच्चे भी अवैध हथियार चुटकियों में बना लेते हैं

FP Staff Updated On: Jul 25, 2017 08:36 PM IST

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एमपी: यहां पिस्टल से लेकर मशीनगनों का है घरेलू उद्योग!

मध्य प्रदेश के इंदौर संभाग में ऐसे कई गांव हैं, जहां अवैध हथियारों के निर्माण की फैक्टरियां कुटीर उद्योगों की तरह चल रहीं हैं. यहां बाकायदा अवैध हथियारों की मंडी लगती है, जहां खरीदार देसी कट्टा ही नहीं, पिस्टल व मशीनगन जैसे अत्याधुनिक हथियारों की खरीदारी करते हैं. अवैध हथियार निर्माण में लगे उक्त गांवों में अधिकतर लोग सिकलीगर के नाम से जाने जाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान सिकलीगर पहले अपने धर्मगुरुओं लिए हथियार बनाते थे.

घर-घर में बन रहे हैं अवैध हथियार

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर संभाग के कई जिलों में सिकलीगरों की आबादी हैं, जहां के गांव के अमूमन हर घर में अवैध हथियार निर्माण की फैक्टरियां मिल जाएंगी. इन गांवों में हथियार निर्माण एक कुटीर उद्योग की तरह चल रहा है. इस कारोबार में पूरा का पूरा परिवार रोजगाररत है. उक्त गांव के किसी भी झोपड़ी में लोहा पिघलाने वाली भट्ठी आराम से मिल जाएगी. यहां सभी तरह के देसी और अत्याधुनिक हथियार बनाए जाते हैं और इनकी बिक्री के लिए बाकायदा बाजार लगता है और खरीदने के लिए बहुतायत में लोग भी यहां पहुंचते हैं.

बच्चे भी बना लेते है खतरनाक हथियार

सिकलीगर परिवार कई पीढ़ी से अवैध हथियार निर्माण कारोबार से जुड़े हुए हैं और बेरोक-टोक आज भी देसी और अत्याधुनिक हथियारों का निर्माण बदस्तूर जारी है. अब तो नई पीढ़ी ने भी इस धंधे को रोजगार के रूप में अपना लिया है. यानी उक्त गांवों में मासूम बच्चे भी आपको अवैध हथियार बनाते हुए आसानी से दिख जाएंगे. यानी गर्म लोहे को भट्ठी में पिघलाकर हथियार बनाने की कला में बच्चे भी माहिर है और अत्याधुनिक पिस्टल, मशीनगन जैसे हथियार चुटकियों में तैयार कर लेते हैं.

पिस्टल से लेकर मशीनगन का निर्माण

सिकलीगर अवैध हथियारों का निर्माण प्रायः भंगार (स्क्रैप) से तैयार करते हैं. भंगार से हथियार बनाने के लिए सिकलीगर भट्ठी, हथौड़ी, छैनी, कील, फायल जैसे छोटे हथियारों का इस्तेमाल करते हैं, जो गांव के प्रत्येक घरों के झोपड़ी में आसानी से दिख जाएंगे. इन्हीं छोटे औजारों की मदद से सिकलीगर देसी कट्टा से लेकर अत्याधुनिक पिस्टल और मशीनगन जैसे हथियार बनाते हैं. यही नहीं, सिकलीगर चाकू और तलवार जैसे अनेक पारंपरिक हथियारों का निर्माण भी करते हैं.

गांव में लगता है अवैध हथियारों का बाजार

बात सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जानकारों के मुताबिक सिकलीगरों के उक्त गांवों में बनने वाले अवैध हथियारों की बाकायदा एक मंडी है, जहां पर खरीदारी के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है. यहां बिक्री के लिए उपलब्ध हथियारों की कीमत बहुत ही नॉमिनल है. मसलन, यहां निर्मित देसी से लेकर विदेशी हथियारों की कीमत 1000 रुपए से शुरू होकर 2500 रुपए तक है. हालांकि कई बार ग्राहकों की जेब देखकर भी हथियारों की कीमत तय की जाती है.

अवैध धंधे से मुक्ति चाहते हैं सिकलीगर

जानकारों के मुताबिक सिकलीगर पीढ़ी से चली आ रही पारंपरिक धंधे से अब मुक्त होना चाहते हैं. वे अपनी नई पीढ़ी को इस अवैध हथियार के धंधे से दूर रखना चाहते है, लेकिन विकल्पों की कमी के चलते मजबूरन सिकलीगर इससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं. सिकलीगर चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़े-लिखे और मौत का सामान बनाने वाले धंधे से दूर रहकर सूकून की जिंदगी बिताएं, लेकिन उनके पुनर्वास के लिए सरकार मदद नहीं कर रही. यही नहीं, सिकलीगरों ने इस संबंध में कई अर्जियां भी सरकार को भेजी हैं.

इंदौर संभाग के इन इलाको में हैं सिकलीगर

इंदौर संभाग में धार, खरगोन, बडवानी, बुरहानपुर इलाको में सिकलीगर पाए जाते है, एक-एक गांव में 50 से 100 घर हैं, जो यही कारोबार करते है. जानकार कहते है कि सिकलीगर कभी मुगलों से लड़ने और अग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी के लिए हथियार निर्माण करते थे. हालांकि अब हरेक सिकलीगर इस धंधे से बाहर निकलना चाहता है, लेकिन प्रोत्साहन के बजाय उन्हें आर्मस एक्ट में बंद कर दिया जाता है. कई सिकलीगर कहते हैं कि अगर पुलिस की ज्यादती बंद नहीं हुई तो उन्हें भी नक्सलों की तरह विद्रोही रवैया इख्तियार करना पड़ेगा.

मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं सिकलीगर

जानकारों के मुताबिक इंदौर संभाग के विभिन्न जिलों के सिकलीगर अब समाज की मुख्य धारा से जुडना चाहते है और अवैध धंधे के कारोबार को पूरी तरह से मुक्त होना चाहते है. वो नए रोजगार के लिए सरकार से आर्थिक मदद चाहते हैं. सिकलीगर राजपाल का कहना है कि वो अपनी हुनर के अनुसार एक वैध कारोबार में उतरना चाहते हैं, अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते है, लेकिन बगैर सरकारी मदद के यह संभव नहीं है. वहीं दूसरे सिकलीगर कल्याण का कहना है कि उन्हें बैंक से लोन नहीं मिलता, क्योंकि बैंक गारंटर मांगती है, जो उनके पास नहीं होता, जिससे सिकलीगर सरकारी सुविधाओं से उपेक्षित और वंचित रह जाते हैं.

(साभार: न्यूज़18 हिंदी)

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