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शिया मुस्लिम: अपने ही धर्म के सताए अल्पसंख्यक लोग

माना जाता है कि सउदी अरब शिया सुन्नी टकराव को बढ़ावा दे रहा है

Animesh Mukharjee Updated On: Sep 09, 2017 03:26 PM IST

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शिया मुस्लिम: अपने ही धर्म के सताए अल्पसंख्यक लोग

‘शिया’ मुस्लिमों के इस फिरके के बारे में लोगों ने सबसे ज्यादा सुना हुआ है. रोहिंग्या मुस्लिमों की ही तरह शियाओं पर अत्याचार की खबरें सबने पढ़ी हैं. दुनिया भर के इस्लामिक मुल्कों में ज्यादातर जगहों पर सुन्नी सत्ता में हैं. ऐसे लगभग हर देश में शिया आबादी गरीबी और दूसरे दर्जे की नागरिकता में रह रही है.

ईराक में शिया 60 प्रतिशत तक हैं पर वहां भी उनका बड़ा नरसंहार हुआ. इन सबके पीछे एक ही कारण है शियाओं की कुछ धार्मिक मान्यताएं जिनके लिए वो खासतौर पर सुन्नियों के निशाने पर होते हैं.

क्या अलग है शियाओं में

शिया और सुन्नी दोनों ही कुरान को मानते हैं. मगर शियाओं का दावा है कि मुसलमानों का नेतृत्व करने का असल अधिकार उनके पास है. शिया मुस्लिम हजरत अली के नेतृत्व को मानते हैं. अली मुहम्मद साहब के दामाद थे जो उनके बाद इस्लाम के संघर्ष में मारे गए थे. उनके बेटे हुसैन और हसन ने भी इस संघर्ष में अपनी शहादत दी थी, इन्हीं की याद में शियाओं में मातम का प्रचलन है.

शिया इस्लाम और कुरान को सुन्नियों से अलग तरीके से मानते हैं जिसके चलते ये विवाद चलता रहता है. आम तौर पर शिया कुरान को रटने में नहीं समझने में विश्वास रखते हैं. इसी के चलते शियाओं में ‘हाफिज़’ नहीं होते हैं. जबकि सुन्नियों के बीच कुरान की आयतें याद करना एक प्रचलित मान्यता है. इसी तरह शिया नमाज पढ़ते वक्त हाथ नहीं मिलाते हैं. शियाओं में नमाज़ पढ़ते वक्त टोपी लगाना अनिवार्य नहीं है, जबकि सुन्नियों में बिना टोपी के नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है.

इसी तरह शियाओं में ट्रिपल तलाक नहीं होता है और शादी के लिए भी शियाओं में दो काज़ियों की ज़रूरत पड़ती है.

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क्या है शिया सुन्नी टकराव का नतीजा

दुनिया भर के मुस्लिमों में लगभग 10-15 प्रतिशत शिया हैं. भारत में लखनऊ जैसे कुछ शहरों में शिया आबादी तुलनात्मक ज्यादा है. इन जगहों में भी शिया सुन्नी टकराव चलता रहता है. मोहर्रम के समय अकसर लखनऊ से टकराव की खबरे आती हैं.

लखनऊ में मुहर्रम के दौरान इमाम बाड़ा

लखनऊ में मुहर्रम के दौरान इमाम बाड़ा

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिया सुन्नी टकराव में पिछले कुछ समय में कई बातें जुड़ गई हैं. आइसिस एक सुन्नी संगठन है जिसके निशाने पर शिया भी हैं. वहीं इरान और ईराक जैसे तेल उत्पादक देशों में अच्छी खासी शिया आबादी है. अमेरिका की तेल राजनीति में रुचि और दुनिया भर में इसके असर के चलते शिया सुन्नी टकराव सिर्फ इस्लाम के अंदर का मामला नहीं रह गया है. माना जाता है कि सउदी अरब शिया सुन्नी टकराव को बढ़ावा दे रहा है.

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समय के साथ शिया-सुन्नी टकरावों में बढ़ोत्तरी हुई है. मुगलों के समय में शिया सुन्नी संबंध काफी अच्छे थे. बाबर सुन्नी था पर शियाओं की जीवनशैली के करीब था. औरंगजेब के समय में सुन्नियों का प्रभुत्व बढ़ा और शिया निशाने पर रहे.

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शिया-सुन्नी का टकराव दिखाता है कि सिर्फ एक धर्म भी हो तो भी इंसान टकराव के रास्ते देख लेता है.

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