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21वीं शताब्दी में क्या राजनयिक गुजरे जमाने की चीज हो चुके हैं?

इंग्लैंड ने 2005 और 2015 के बीच 30 मिशन बंद कर दिए और उस रकम का इस्तेमाल अपने विज्ञान की पहल पर किया

Bikram Vohra Updated On: Oct 23, 2017 10:41 PM IST

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21वीं शताब्दी में क्या राजनयिक गुजरे जमाने की चीज हो चुके हैं?

औपनिवेशिक अतीत के शाही अवशेष के रूप में अगर कुछ बचा दिखता है तो वो है फॉरेन सर्विस. शशि थरूर इस सेवा का स्तर ऊंचा उठाना चाहते हैं और इसके लिए खास परीक्षा आयोजित करने की बात कहते हैं. इसका मकसद है भारतीय विदेश सेवा की लुप्त होती गरिमा से अलग इसे विशेष बना सकें. उनका तर्क है कि परीक्षा अधिक से अधिक विदेश मामलों और भाषा की दक्षता पर आधारित होना चाहिए और उम्मीदवारों का झुकाव अलग किस्म से इस ओर दिखना चाहिए. अगर वाकई इसकी जरूरत है तो यह वाजिब और तर्कपूर्ण लगता है.

क्यों न ऐसी उत्कृष्टता को तोड़ा जाए, उन्हें खारिज किया जाए और कॉन्स्यूलर सेवा और दस्तावेजी सुविधाओं के लिए सहायकों से युक्त साधारण दफ्तर रखे जाएं ताकि जरूरत के वक्त पर नागरिकों को सुविधाएं दी जा सकें. विदेश में रहने वाले साथी नागरिकों की मदद के लिए प्रतिनिधि के तौर पर जो ब्यूरो कार्य करता है उनके पास ये चमक-दमक और क्षमता नहीं होती.

ऑडियो-विज़ुअल के अतिक्रमण के इस दौर में जबकि एक सैचुरेटेड स्थिति बन गयी है और हम भी एक-दूसरे से महज कुछ घंटों की दूरी पर हैं, हमें अपने देश में हर देश के लिए एक डेस्क बनाना चाहिए, जो हर क्षेत्र को देखे. दिल्ली में उनके लिए ये डेस्क हैं एशिया डेस्क, वेस्ट एशिया डेस्क, मॉस्को डेस्क. एक तरह से अपग्रेडेड कॉल सेंटर की तरह यहां शशि थरूर के बारह या बारह सौ चांदी के भाव में चुने गए लोग एक साथ बैठें, दुनिया के स्तर पर संवाद करें और फिर मेट्रो से घर चले जाएं.

आप इस पर हंस सकते हैं. अचल संपत्ति और दुनियाभर में राजनयिकों को बनाए रखने की लागत बहुत ज्यादा होगी. दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के लिए विशाल भवन और आवास सुविधाओं के लिए सरकार खर्च करती है, कार और उड़ानें और रिटेनर और सपोर्ट स्टाफ बड़ी संख्या में होते हैं.

सुषमा करती हैं ट्वीट के जरिए राजनयिकों का काम

एक दायरे में पार्टी और मनोरंजन के लिए बिल राजा की ओर से रिश्वत की तरह है. वास्तव में इसकी जरूरत है तो हमें गंभीरता से इसे जारी रखना चाहिए और इस पर खर्च होने वाली राशि का भी हिसाब रखना चाहिए. सुषमा स्वराज अपनी ओर से इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रही हैं. दस राजनयिकों के लिए मिशन न बनाकर वह एक ट्वीट के जरिए काम कर लेती हैं. पाकिस्तान में कुलभूषण यादव के फंसे होने का मामला लें. वे यहां तक कि राजनयिकों को भी उनसे मिलने नहीं देते.

डोनाल्ड ट्रंप ने यह दिखाया है कि जब वे दुनिया के नेताओं से सीधे बात करते हैं तो किस तरह अपने राजनयिकों को नजरअंदाज करते हैं. यहां तक कि दूतावासों को भी इसकी जानकारी नहीं देते.

गलत न समझें. मैं ये नहीं कह रहा कि हर राष्ट्र एक जैसा है और उनसे संपर्क में नहीं रहना चाहिए. हमें बस अपने राजनयिक सोच को वर्तमान रूप से बदलकर दोबारा खड़ा करना है और इसे 21वीं सदी के हिसाब से बनाना है. ऐसा करने के लिए भारी भरकम या शाही खर्च करते हुए विशेषाधिकार और अतिरिक्त रकम देने की भी जरूरत नहीं है.

अगर इसे वाजिब तरीके से छोटा कर दिया जाए तो कैसा हो? राजनयिक इम्युनिटी इतिहास की बात होगी और उन सभी पाउच और बैग की भी जांच हो सकेगी, जो रहस्यमय रहा करती हैं. राजनयिकों को हवाईअड्डों पर पंक्ति में खड़ा रहना होगा और इस वैश्विक और विशिष्ट क्लब के सभी सामान अतीत की बात हो जाएंगी.

जब राजनीतिक हस्तियां इसे अपनी मर्जी से छोड़ दें तो पुरानी व्यवस्था को क्या कुछ हासिल हो सकता है? मान लीजिए कि नया युग कारोबार के लिए कारोबारी बातचीत, वित्त के लिए वित्तीय वार्ता, सुरक्षा और पुलिस एजेंसियों की अपने समकक्ष से बातचीत होगी. खुले व्यापार के लिए दफ्तर, जहां आधिकारिक पर्यटन केंद्र हों और पेशेवर अपनी मर्जी से काम कर सकें तो कम सुविधाओं के बीच भी पहले से ज्यादा उत्पादकता और प्रभावशाली तरीके से काम किया जा सकता है.

SHASHI THAROOR

ऐसा नहीं है कि राजनयिकों ने मैदान पर युद्ध या अपराध बंद कर दिया है या फिर उन्होंने शांतिपूर्ण युगों में प्रवेश कर लिया है. वास्तव में  वे अक्सर गलतफहमी पैदा करते रहते हैं. हमारे पास वर्तमान समय में 55 हॉट स्पॉट हैं और यूएनएचसीआर के अनुसार 6.55 करोड़ लोग विस्थापित हैं. वास्तव में यह गौरवपूर्ण रिकॉर्ड नहीं है.

मिशन बंद कर हो सकता है पैसों का सही उपयोग

अगर कागजी जरूरतों और संकट की घड़ी में मदद की जरूरत को छोड़ दिया जाए तो किसी को अपने मिशन की परवाह नहीं होती. इंग्लैंड ने 2005 और 2015 के बीच 30 मिशन बंद कर दिए और उस रकम का इस्तेमाल अपने विज्ञान और नवाचार की पहल पर किए. इससे आसमान नहीं गिर पड़ा.

विश्वसनीयता का फासला बड़ा है. एक तरफ आम फ़िल्में और जेम्स बॉन्ड सरीखे ‘डीप-लोमैसी’ और डरावनी मार्टिनी में ओलिव्स हैं. वहीं दूसरी तरफ खड़ा है एक औसत वाणिज्यिक दूतावास या फिर आम दूतावास. आपके पास दूतावास के समक्ष लंबित मुद्दों पर ट्वीट और वाट्सएप करने वाली आधी भारतीय कैबिनेट हो सकती है. यहां तक कि यह सब किसी राजदूत को प्रतिक्रिया देने की आज्ञा मिलने से पहले ही हो जाता है.

यहां तक कि शत्रुता बढ़ने की स्थिति में राजदूत को बुलाने की परंपरा भी लुप्त हो गई है. निश्चित रूप से उन्हें एक खाली पड़े घर में ले जाओ और उसे एक होटल में बदल दो. गरीबी और राजनीतिक लाभ की दुनिया के बीच इस लक्जरी के साथ एक संतुलन होना चाहिए जो वास्तव में नाटकीय नहीं हो.

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