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मिनिमम बैंलेस: एसबीआई की बॉस ने कहा, मीडिया ने बनाया हौव्वा

5,000 रुपए के मिनिमम बैलेंस की जरूरत जैसे एसबीआई के सभी नियम इन एसोसिएट बैंकों के कस्टमर्स पर भी लागू होंगे

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Apr 04, 2017 07:06 PM IST

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मिनिमम बैंलेस: एसबीआई की बॉस ने कहा, मीडिया ने बनाया हौव्वा

फ़र्स्टपोस्ट के साथ एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में एसबीआई की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में इसके एसोसिएट बैंकों के मर्जर का काम अच्छी तरह से चल रहा है.

5,000 रुपए के मिनिमम बैलेंस की जरूरत जैसे एसबीआई के सभी नियम इन एसोसिएट बैंकों के कस्टमर्स पर भी लागू होंगे.

हालांकि भट्टाचार्य ने कहा कि एसबीआई का मिनिमम बैंलेंस का नियम सही तरह से समझा नहीं गया है.

मिनिमम बैलेंस के नियमों में बदलाव नहीं

भट्टाचार्य ने कहा, ‘मिनिमम बैलेंस पर नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. साथ ही मिनिमम एवरेज बैलेंस के नियम भी नहीं बदले हैं. इसके अलावा, 5,000 रुपये की शर्त केवल 6 मेट्रो के लिए है.

शहरी इलाकों के लिए यह जरूरत 3,000 रुपए, सेमी-अर्बन के लिए 2,000 रुपये और ग्रामीण इलाकों के लिए यह शर्त 1,000 रुपए की है. मुझे लगता है कि इसकी सराहना नहीं की जा रही है, न ही मीडिया इसके बता रहा है. जब औसत बैलेंस की बात आती है तो, आपके पास एक दिन 15,000 रुपए हो सकते हैं और अगले दो दिन जीरो बैलेंस हो सकता है. आप पर कोई चार्ज नहीं लगेगा.’

एसबीआई के 5,000 रुपये के मिनिमम बैलेंस के नियम की कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं.

मर्जर के फैसले के पीछे पॉलिटिकल प्रेशर नहीं

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भट्टाचार्य ने कहा कि बैंक पिछले कुछ वक्त से एसोसिएट बैंकों के मर्जर की कोशिश कर रहा है और इसमें कोई राजनीतिक दवाब जैसी चीज शामिल नहीं है. उन्होंने कहा, ‘कहीं से भी कोई राजनीतिक जोर इस डील के लिए नहीं लगाया गया है.

एसबीआई पिछले कुछ वक्त से इसके लिए प्रयास कर रहा है. पद संभालने के बाद यह मेरे कुछ शुरुआती सुझावों में से एक था. मुझसे पहले यहां के कुछ लोग भी ऐसा ही चाहते थे.’

2008 से अब तक 8 बैंकों का मर्जर कर चुका है एसबीआई

एसबीआई में इसके पांच एसोसिएट बैंकों- स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (एसबीबीजे), स्टेट बैंक ऑफ मैसूर (एसबीएम), स्टेट बैंक ऑफ ट्रावणकोर (एसबीटी), स्टेट बैंक ऑफ पटियाला (एसबीपी) और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद (एसबीएच) का मर्जर शनिवार से प्रभावी हो गया.

इन बैंकों के अलावा भारतीय महिला बैंक का भी मर्जर एसबीआई में हो चुका है. भारतीय महिला बैंक पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के दिमाग की उपज था. यूपीए के दूसरे शासनकल में उन्होंने इसकी नींव रखी थी.

एसबीआई इससे पहले अपने दो अन्य एसोसिएट बैंकों का मर्जर कर चुका है. ये स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर थे. ये मर्जर क्रमशः 2008 और 2010 में हुए थे.

ट्रेड यूनियनों की चिंता

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ट्रेड यूनियनों ने लगातार इस मर्जर का विरोध किया है. इनका कहना है कि मर्जर एक राजनीतिक फैसला है और इससे बैंक या इसके कर्मचारियों का कोई भला नहीं होने वाला. साथ ही, एसोसिएट बैंक अच्छा काम कर रहे हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से कामकाज करने की आजादी दी जानी चाहिए.

ऑल इंडिया बैंक एंप्लॉयीज एसोसिएशन के महासचिव सी एच वेंकटचलम ने कहा, ‘यह एक राजनीतिक फैसला था. राजनीतिक नेतृत्व समझता है कि इससे एक ग्लोबल बैंक तैयार होगा, मगर हकीकत यह है कि वे एक ज्यादा बड़ा जोखिम तैयार कर रहे हैं.’

देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक से चार गुना बड़ा है एसबीआई

मर्जर के बाद एसबीआई का एसेट साइज बढ़कर 28.6 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच जाना चाहिए. एसबीआई आकार में बड़ा होगा और यह अपने सबसे नजदीकी प्रतिस्पर्धी एचडीएफसी बैंक के कम से कम चार गुना बड़ा होगा.

मार्च 2016 को एचडीएफसी बैंक का एसेट साइज करीब 7.4 लाख करोड़ रुपए है. तीसरा सबसे बड़ा बैंक आईसीआईसीआई बैंक होगा जिसका एसेट साइज करीब 7.2 लाख करोड़ रुपए है.

एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक को छोड़कर बाकी ज्यादातर बैंक एसबीआई के सामने बौने नजर आते हैं. इस मर्जर के बाद एसबीआई की शाखाओं की संख्या 23,000 से ज्यादा हो जाएगी और इसके एंप्लॉयीज की संख्या ढाई लाख पर पहुंच जाएगी. विकासशील देशों में यह बैंकिंग दिग्गजों में शुमार होगा और अपने साइज के चलते बड़ी डील्स हासिल करने की ताकत रखेगा.

सरकार के दखल का खतरा

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एसबीआई का ग्लोबल शक्ल लेना इंडियन बैंकिंग सेक्टर के लिए एक अच्छी चीज है. लेकिन, जिस बढ़ते जोखिम की ओर ट्रेड यूनियनें संकेत कर रही हैं उसे नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा. एसेट साइज और पहुंच के लिहाज से बाकियों से कहीं आगे होने से एसबीआई के एकाधिकार की चिंता होना लाजिमी है.

एसबीआई पर सरकार के कंट्रोलिंग स्टेक को देखते हुए यह चिंता और जायज हो जाती है. सरकार एसबीआई की प्रमोटर है और इसके कामकाज में दखल दे सकती है. सरकार अपने लोकलुभावन एजेंडे को पूरा करने के लिए एसबीआई का सहारा ले सकती है. या सरकार बैंक को कुछ खास सेक्टरों को लोन देने के लिए निर्देश भी दे सकत है.

पूर्व आरबीआई गवर्नर भी मोनोपॉली का डर जता चुके

हकीकत यह है कि बैंकिंग सेक्टर में एकछत्र राज्य कायम होने को लेकर पिछले आरबीआई गवर्नर भी चेतावनी दे चुके हैं. मिसाल के तौर पर 2013 में, तब के आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने इस मसले को उठाया था.

सुब्बाराव ने कहा था, ‘मौजूदा वक्त में बैंकों के साइज में समानता नहीं है. सिस्टम में दूसरे सबसे बड़े बैंक का आकार सबसे बड़े बैंक के मुकाबले करीब एक-तिहाई है. इससे एकाधिकार जैसे हालात पैदा होते हैं.’

कैपिटल जरूरत पूरी कर पाएगी सरकार

एकाधिकार के सवाल के अलावा ज्यादा बड़े एसबीआई का मतलब होगा कि बैंक को ज्यादा कैपिटल की जरूरत होगी. इसका बोझ कुल मिलाकर सरकारी खजाने पर ही पड़ना है. किसी संकट की स्थिति में, क्या वित्तीय तंगी की शिकार सरकार विशालकाय एसबीआई के कैपिटल रिस्क को मैनेज कर पाएगी?

कंसॉलिडेशन के सपोर्टरों में के वी कामत, उदय कोटक जैसे दिग्गज

दूसरी ओर, एसबीआई में एसोसिएट बैंकों के मर्जर से इसे ग्लोबल बिजनेस में अपने दबदबे को बढ़ाने में मदद मिलेगी. कई सीनियर बैंकर आक्रामक रूप से कंसॉलिडेशन के समर्थक रहे हैं.

इनमें से एक के वी कामत भी हैं, जो कि वरिष्ठ बैंकर और न्यू डिवेलपमेंट बैंक के प्रेसिडेंट हैं. एसबीआई में एसोसिएट बैंकों के मर्जर को एक अच्छा कदम बताते हुए कामत ने कहा है, ‘अगर आप इकनॉमी का आकार देखें तो हमें कुछ ज्यादा बड़े बैंक चाहिए.

ऐसे में निश्चित तौर पर सार्वजनिक सेक्टर और शायद निजी सेक्टर में भी कंसॉलिडेशन की गुंजाइश मौजूद है क्योंकि आपको इस इकनॉमी को सपोर्ट करने के लिए कहीं ज्यादा बड़े बैंकों की जरूरत है.’

न सिर्फ कामत बल्कि उदय कोटक (कोटक महिंद्रा बैंक के वाइस चेयरमैन) भी बैंकिंग सेक्टर में कंसॉलिडेशन की वकालत कर चुके हैं. हाल में ही पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कोटक ने कहा था, ‘ग्लोबल लेवल पर, ज्यादातर देशों में तीन से चार बड़े बैंक होते हैं जिनका दबदबा होता है. हमारे देश में भी बैंकिंग सेक्टर का यही भविष्य है.’

प्राइवेट सेक्टर में आसान नहीं होगा मर्जर

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एसबीआई में एसोसिएट बैंकों का मर्जर एक अपेक्षाकृत आसान काम था क्योंकि टेक्नोलॉजी और वर्क कल्चर के लिहाज से ये बैंक तकरीबन एक जैसे ही हैं. लेकिन, कंसॉलिडेशन का यह काम बाकी बैंकों के लिए शायद इतना आसान न हो. खासतौर पर निजी सेक्टर के बैंकों के लिए यह मुश्किल भरा हो सकता है.

प्राइवेट सेक्टर में ज्यादातर मर्जर के मामले वित्तीय मुश्किलों के चलते या रेगुलेटरी जरूरतों की वजह से सामने आए हैं. आश्चर्यजनक तौर पर, एक तरफ कंसॉलिडेशन की बातचीत चल रही है, वहीं दूसरी ओर इंडियन बैंकिंग सेक्टर में कई छोटे बैंक भी तैयार हो रहे हैं. ये बैंक स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और दो नए कमर्शियल बैंकों के रूप में आए हैं.

नए बैंक लाइसेंस देने की प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान फरवरी 2010 में तब के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने सालाना बजट में किया था.

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