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नैनी झील को बचाना हम सब की जिम्मेदारी है

नैनी के हालात बहुत खराब नहीं हैं और इसे बचाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है

Namita Singh | Published On: Jun 06, 2017 03:18 PM IST | Updated On: Jun 06, 2017 03:18 PM IST

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नैनी झील को बचाना हम सब की जिम्मेदारी है

‘मैं उठूंगा और अब मैं इनिसफ्री जाऊंगा, और एक छोटा कमरा वहां बनाउंगा, यह मिट्टी से बना होगा और जिसके किनारे बाड़ लगाऊंगा. वहां मेरी नौ फलियों की क्यारियां होंगी, मधुमक्खियों के छत्ते होंगे और मैं इस जंगल में अकेला रहूंगा.’

मशहूर आइरिश कवि डब्ल्यू बी यीट्स ने अपनी कविता ‘द लेक आइल फॉर इनिसफ्री’ में अपनी इच्छाएं जाहिर की हैं. लेकिन, शायद ही कोई उत्तराखंड के नैनीताल में मौजूद नैनी झील के लिए ऐसी इच्छा जाहिर करता हो.

घट रहा है नैनी झील में पानी का स्तर

आंख के आकार वाली ताजे पानी की मशहूर नैनी झील कुमांयू की पहाड़ियों के बीच मौजूद है और खुद को दोबारा जिंदा किए जाने का इंतजार कर रही है. नैनी झील में पानी का लेवल गुजरे सालों में लगातार घटा है और अब यह अपने सबसे निचले लेवल पर पहुंच गया है. पर्यावरण को हो रहे नुकसान और टूरिस्ट्स के भारी तादाद में पहुंचने से पैदा हुए दवाब से नैनी झील को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. माना जाता है कि भगवान शिव की पत्नी सती के आत्मदाह करने के बाद उनकी आंखें यहां गिरी थीं.

वॉटर रीचार्ज में कमी, पानी का निकाला जाना वजह

सतह के नीचे से पानी के रीचार्ज में अवरोधों के चलते यह झील सूखने के कगार पर पहुंच गई है. इसके अलावा नैनीताल की प्यास बुझाने के लिए इससे पानी का निकाला जाना भी झील का जलस्तर नीचे जाने की एक वजह है. नैनी झील की अधिकतम गहराई 27 फुट नापी गई थी, अब यह घटकर सामान्य लेवल से 18.5 फुट नीचे पहुंच गई है. नैनीताल में पानी की सप्लाई का एकमात्र जरिया होने की वजह से झील में पानी का स्तर बहुत तेज रफ्तार से कम हुआ है. उत्तराखंड जल संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक, प्रति दिन 1.4 करोड़ लीटर पानी नैनी झील से निकाला जाता है.

जनवरी में ही जीरो मार्क पर पहुंच गया वाटर लेवल

झील के दो किनारे हैं, उत्तरी मल्लीताल और दक्षिणी तल्लीताल. तल्लीताल में सतह को जीरो मार्क किया गया है. झील की गहराई और जलस्तर को इस मार्क को बेस बनाकर नापा जाता है. इस साल और पिछले साल झील में जलस्तर में सबसे कम गिरावट दर्ज की गई और हालिया गुजरे वक्त में झील के जीरो लेवल को छूने को कई बार दर्ज किया गया है. आमतौर पर झील मई-जून के महीनों में जीरो लेवल पर पहुंच जाती है, जो कि गर्मियों का पीक होता है. हालांकि, इस साल झील जनवरी महीने में ही जीरो लेवल पर पहुंच गई.

टूरिस्ट्स की सालभर भीड़ से हो रहा नुकसान

एक पॉपुलर टूरिस्ट प्लेस होने से नैनीताल में पूरे साल टूरिस्ट्स की आवाजाही बनी रहती है. इस वजह से यह खूबसूरत इलाका काफी भीड़भाड़ वाला बना रहता है और यहां की प्राकृतिक सुंदरता को नुकसान होने लगा है.

Nainital

नैनीताल जिले को झीलों का जिला कहा जाता है. यहां कुमांयू की पहाड़ियों के बीच चार झीलें हैं. नैनी झील के अलावा यहां भीमताल, सातताल और नौकुचियाताल झीलें हैं. इन इलाकों में भी खूब पर्यटक आते हैं. इन झीलों में भी जलस्तर घटने और पानी की गुणवत्ता में गिरावट देखी जा रही है. उत्तराखंड सरकार के हाल में लिए गए एक फैसले में नैनी झील को पीडब्ल्यूडी से लेकर सिंचाई विभाग को दे दिया गया है ताकि वह इसके सूखने की समस्या से निपट सके.

सूखाताल के पानी से रीचार्ज होती है नैनी झील

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच), रुड़की की 1995 में की गई एक रिसर्च में पाया गया है कि नैनी झील का मुख्य रीचार्ज जोन सूखाताल है. सूखाताल झील नैनी झील से 50 मीटर ऊपर मौजूद है. यह झील मॉनसून के दौरान पानी को अपने अंदर समा लेती है और फिर यही पानी नैनी झील को सूखे के मौसम के दौरान मिलता है.

एनआईएच और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, रुड़की की 2008 में की गई एक संयुक्त स्टडी में पाया गया है कि नैनी झील का 53 फीसदी वॉटर रीचार्ज सूखाताल के सोखे गए पानी के जरिए होता है. हालांकि, बेरोकटोक कंस्ट्रक्शन के चलते सूखाताल रीचार्ज जोन अच्छी तरह से पानी को सोख नहीं पा रहा है और इसी वजह से नैनी झील को भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है.

अवैध निर्माण, ग्राउंट वॉटर रीचार्ज की मुश्किलें

जल संसाधनों की बहाली के काम में जुटे एनवायरनमेंट कंसल्टेंट सुरेंद्र नागडाली नैनी झील पर काफी शोध कर चुके हैं. नागडाली ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि न केवल सूखाताल बल्कि घटता ग्राउंट वॉटर रीचार्ज भी नैनी झील में पानी की हो रही कमी की एक वजह है. झील को हुआ मौजूदा नुकसान ऐसा नहीं है कि जिसकी भरपाई न हो सके. नैनी झील का कैचमेंट एरिया इतना बड़ा नहीं है कि उसे मैनेज न किया जा सके. इसके अलावा देश की दूसरी झीलों के मुकाबले नैनी झील के आसपास अच्छी बारिश होती है. केवल दिक्कत कम रीचार्जिंग की है. कवर्ड एरिया के बढ़ने से बारिश के पानी को जमीन सोख नहीं पा रही है, इसके चलते ग्राउंट वॉटर रीचार्ज घट रहा है. नागडाली कहते हैं, ‘हालात बहुत खराब नहीं हैं, और केवल दृढ़ इच्छाशक्ति वाले लोगों की जरूरत है.’

नैनी झील का सरफेस 47 हेक्टेयर है. नैनी झील का कैचमेंट एरिया 470 हेक्टेयर है, जो कि टूरिस्ट्स के भारी आवागमन से जूझ रहा है. इसके अलावा, सीवेज डिस्चार्ज, अवैध निर्माण की वजह से झील में गाद और मलवा इकट्ठा हो रहा है. जियोलॉजिस्ट्स का कहना है कि 19वीं शताब्दी में झील को पानी देने के लिए 321 जल संसाधन थे, लेकिन अब इसमें से केवल 10 फीसदी ही जीवित बचे हैं, और इसी वजह से झील सूख रही है.

नैनीताल पर प्रेशर कम करने के लिए नए टूरिस्ट स्पॉट विकसित करेगी सरकार

एक सरकारी सूत्र ने बताया कि उत्तराखंड सरकार नए टूरिस्ट स्पॉट विकसित करने की योजना बना रही है और टूरिस्ट ठिकानों को डायवर्सिफाई करने में लगी है. इससे नैनीताल जैसे भारी आवाजाही वाले इलाकों को थोड़ी राहत मिलेगी. साथ ही अन्य जगहों पर रहने वालों को कारोबार और रोजगार के मौके भी मिलेंगे.

सोशल मीडिया पर नैनी झील के लिए सपोर्ट लगातार बढ़ रहा है. कई सेलेब्रिटीज ने भी यूट्यूब पर वीडियो डाले हैं, फेसबुक ग्रुप बनाए गए हैं. इसके अलावा ट्विटर पर कैंपेन चल रहा है ताकि आम लोगों में इस काम के लिए जागरूकता फैलाई जा सके. 3 जून को करीब 1000 लोगों ने सेव नैनी लेक कैंपेन के सपोर्ट में बेयरफुट साइलेंट मार्च नैनीताल में निकाला.

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