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बनारसः गुरु! तन भले है डस्टबिन, मन तो क्‍लीन है

वाराणसी स्वच्‍छ शहरों की सूची में ऊपर आया तो बनारसी दमक रहे हैं

Shivaji Rai Updated On: May 11, 2017 03:03 AM IST

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बनारसः गुरु! तन भले है डस्टबिन, मन तो क्‍लीन है

बनारसियों का चेहरा पंचरंगी आम की तरह दमक रहा है. 'लव योरसेल्फ' के गायक जस्टिन बीबर से प्रभावित होकर खुद पर ही दिल लुटा रहे हैं. हो भी क्‍यों न, अपना बनारस स्‍वच्‍छ शहरों की सूची में 32वें स्‍थान पर आ गया है.

सभी को लग रहा है कि उनके ही 'रीफ्रेश' बटन दबाने से शहर कंप्‍यूटर की तरह साफ हुआ है. क्‍या नेता, क्‍या कार्यकर्ता सभी खुद को दूसरों से अधिक स्‍वच्‍छता प्रिय घोषित करने के लिए 'धोबीपाट' लगा रहे हैं.

कुछ स्‍वयंसेवक तो साफ सड़कों पर भी बैनर-पोस्‍टर लेकर झाड़ू मार रहे हैं. ऐसा नहीं कि शहर में नगर पालिका नहीं है, या महानगर पालिका अपने कर्तव्‍य से विमुख है. दरअसल शहर में साफ-सफाई समि‍ति गठित कर कचरा साफ करने का नया शौक जन्‍मा है.

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तस्वीर: रॉयटर्स

समिति के सदस्‍यों के क्‍लासिक कार्य को देखकर संविदा सफाईकर्मी भयभीत हैं कि कहीं उनके स्‍वच्‍छता अभियान के चक्‍कर में हमारा सूपड़ा न साफ हो जाए. फिलहाल किंकर्तव्‍यविमूढ़ की स्थिति है, सफाईकर्मी समझ नहीं पा रहे हैं कि निठल्‍ले नुक्‍कड़ पर बैठकर मक्खियां मारें या किसी साफ-सफाई समिति की सदस्‍यता ले लें.

लीलाधर की भी स्‍वच्‍छता अभियान से जुड़ने की प्रबल लालसा है. फिलहाल अभियान के लाभ-हानि और उद्देश्‍य को समझने में जुटे हुए हैं. समझ नहीं पा रहे हैं कि किस राह पर चलें, किसको छोड़ें और किसे अपनाएं. पुरातन ग्रंथों में भी भांति-भांति की सफाई और उसकी अलग-अलग विधि बताई गई है. जिससे असमंजस और बढ़ रहा है.

शास्‍त्र कहते हैं अमुक चीज की सफाई, अमुक व्‍यक्ति करता है. जैसे जमादार कूड़ा साफ करता है तो योगी तन-मन, वैरागी हृदय से दुर्भाव साफ करता है, तो नेता देश और जनता की गाढ़ी कमाई साफ करता है.

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साथ ही सफाई की वस्‍तु भी अलग-अलग होती है. जैसे घर गंदा हो तो झाड़ू से सफाई, पेट गंदा हो तो चूरन से और मन गंदा हो तो गुरु के प्रवचन से. सफाई और पवित्रता के मापदंड भी अपने-अपने होते हैं, किसी के लिए मंदिर-मस्जिद पवित्र हैं तो किसी के लिए मंदिर से अधिक टॉयलेट पवित्र है.

अवधू गुरु तो एग्जिट पोल की तरह स्‍वच्‍छता के इस पोल को ही खारिज कर रहे हैं. गुरु का कहना है कि सफाई के मामले में बनारस न कल पीछे था, न आज किसी से पीछे है. आज भी कोई नहीं है जो साफ-सफाई के मामले में बनारस और बनारसियों का मुकाबला कर सके.

यहां क्‍या कुछ साफ नहीं है? नेताओं के कपड़े झक सफेद-साफ हैं. उनके वादे, उनके आचरण साफ हैं. भ्रष्‍टाचार से नगर निगम का सरकारी खजाना साफ है. मोदीजी के वादों से गंगा और उनका किनारा साफ है. महंगाई और नए-नए टैक्‍स से शहर के लोगों की जेबें साफ हैं. लोगों की थाल से दालें और सब्जियां साफ हैं, गरीबों की पढ़ाई, चिकित्‍सा, न्‍याय, इज्‍जत सब साफ है. पुलिस की तत्‍परता इतनी है कि घर में ताला लगाकर निकलो तो पूरा घर साफ है. माफिया और गुंडों का मंसूबा साफ है. गंभीर अपराध में जेल काटने के बावजूद भी विधायक जी की छवि साफ है. स्‍वयंसेवी संगठनों से समर्पित स्‍वयं सेवकों का पत्‍ता साफ है.

इतना ही नहीं धर्म के ठेकेदारों की वजह से शहर में धार्मिकता, नैतिकता, सद्भाव और आपसी भाईचारा भी साफ है. धन्‍नासेठों ने सफाई के मद्देनजर ही अपना काला धन देश से बाहर रखा है. गुरु को समझ नहीं आ रहा है कि इतनी सफाई के बावजूद मोदीजी को सर्वे कराने की क्‍या जरूरत थी? बनारस का सर्वे कराना तो हास्‍यास्‍पद ही है.

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तस्वीर : रॉयटर्स

गुरु का मानना है कि मोदीजी को सफाई के दूसरे पहलुओं पर ध्‍यान देना चाहिए. पूरा ध्‍यान विपक्षी दलों के सफाए पर लगाना चाहिए. वैसे भी विपक्ष और विधर्मियों को साफ करने का अभियान तो आदिकाल से चलता आ रहा है. साथ ही मोदीजी को यह भी समझना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर कचरा फैलाना संविधान प्रदत्‍त आजादी का प्रतीक है.

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आखिर कूड़ा नहीं रहेगा तो कचरा बीनकर जीवनयापन करने वाले परिवार कहां जाएंगे? अनचाहे भ्रूण और नवजात शिशु कहां फेंके जाएंगे? साफ-सफाई को लेकर लंबे-चौड़े भाषण देने वाले स्‍वयंसेवी संगठनों का क्‍या होगा?

गुरु की मोदीजी से अपील है कि फिलहाल अपने इरादे साफ करिए और बनारस में कूड़े की पीर को पर्वत बनने दीजिए. 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में अपने भगीरथ प्रयास का भरोसा दीजिएगा. जनता में उम्‍मीद बंधाइएगा और वोट की गंगा बहाइएगा. फिलहाल 'कोई नहीं हिसाब, बाग, जंगल सब साफ' के जुमले पर ही बनारस को झूलने दीजिए!!!

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