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सहारनपुर हिंसा: जातीय संघर्ष से लग सकता है मोदी-योगी लहर को झटका

दलित अपनी खोई राजनीतिक सत्ता को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं

Ambikanand Sahay Updated On: May 27, 2017 11:22 AM IST

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सहारनपुर हिंसा: जातीय संघर्ष से लग सकता है मोदी-योगी लहर को झटका

दो सौ साल पहले प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल ने कहा था, 'सरकारें इतिहास से नहीं सीखतीं, और न ही इससे निकले सिद्धांतों पर काम करती हैं.'

अगर आप सहारनपुर के जातीय संघर्ष को करीब से देखें तो हेगेल का कथन आज भी बेहद प्रासंगिक नजर आता है. इस संघर्ष ने योगी आदित्यानाथ के उत्तर प्रदेश में सामाजिक संतुलन को बिगाड़ना शुरू भी कर दिया है.

पहले हमेशा से जाति ग्रस्त रहे हिंदू समाज में एक सामाजिक संतुलन स्थापित हुआ था जिसने महज ढाई महीने पहले भगवा ब्रिगेड को शानदार तरीके से लखनऊ की गद्दी तक पहुंचा दिया था.

बाहुबली राजपूतों और आत्मसम्मान से लबरेज दलितों के बीच चल रही आन-बान की लड़ाई से सहारनपुर का पारा अब भी गरम है. इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब राजपूतों ने रविदास मंदिर के परिसर में दलितों को बी.आर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित करने से रोक दिया था.

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कुछ दिन बाद शब्बीरपुर गांव में दलितों ने राजपूतों के जुलूस पर आपत्ति जताई. वे महाराणा प्रताप के जन्मदिवस के अवसर पर शोभा यात्रा निकाल रहे थे. दोनों जाति समूहों के बीच हिंसा हुई और एक व्यक्ति की मृत्यु और 15 अन्य घायल हो गए.

1950,60 और 70 के दशक में शुरू हुआ राजनीति का नया दौर

इस जाति युद्ध के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ समझने के लिए आपको इतिहास में झांकने की जरूरत है. 1950, 60 और 70 के दशक के शुरुआत में कांग्रेस का बोलबाला था और उच्च जाति के लोगों ने सरकार और समाज का तकरीबन हमेशा नेतृत्व किया.

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यह अलग बात है कि उस समय की कांग्रेस समाज के लगभग सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती थी. वास्तव में उच्च जातियों, दलितों, अति पिछड़ा समुदाय और मुसलमान चार स्तंभ थे, जिस पर कांग्रेस की इमारत खड़ी थी.

वक्त बीतने के साथ कांग्रेस कमजोर होती गई- खासतौर से 1970 के दशक के मध्य में जब जयप्रकाश नारायण ने बिहार आंदोलन का सफल नेतृत्व किया. 1980 के दशक को छोड़कर जब इंदिरा गांधी ने शानदार तरीके से सत्ता में वापसी की थी, बीजेपी और समाजवादी ताकतें तेजी से आगे बढ़ीं.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में राजीव गांधी ने लोकसभा की 542 सीटों में से 411 सीटें जीत कर सबका सफाया कर दिया. लेकिन इसके बाद कांग्रेस के सितारे गर्दिश में चले गए.

यहां इसकी चर्चा प्रासंगिक होगी कि किस तरह बीजेपी और समाजवादियों ने उत्तर भारत में कांग्रेस के पतन का फायदा उठाया. बीजेपी ने कांग्रेस के उच्च जाति के वोट बैंक पर कब्जा किया तो समाजवादियों ने पिछड़ों और मुसलमानों को अपनी राजनीतिक झोली में डाल लिया.

1991 में जब राम मंदिर का आंदोलन अपने चरम पर था, उत्तर प्रदेश में एक असामान्य सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिली: जाति ग्रस्त हिंदू समाज ने अपने मतभेदों को भुला दिया और हिंदू लहर पर सवार होकर पिछड़े वर्ग के कल्याण सिंह ने विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज की.

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तस्वीर: यूट्यूब

संघ परिवार के महत्वपूर्ण लोग चिंतित हैं

अपवादों को छोड़कर कांग्रेस और बीजेपी दोनों के राज में सामाजिक स्तर पर ऊंची जाति के हिंदुओं की तूती बोलती थी. लेकिन तकरीबन दो साल बाद समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी के कांशी राम ने हाथ मिला लिया. उन्होंने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और बीजेपी को शिकस्त दी.

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. आम चुनावों में पिछड़ों और दलितों के गठबंधन को नहीं हरा सकते. अगर मुसलमान भी इस गठबंधन में शामिल हो जाएं तो समझिए कि चुनाव से पहले ही नतीजे सामने आ गए.

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले सहारनपुर में बीजेपी के समक्ष यही तस्वीर पेश हुई है. यही कारण है कि संघ परिवार के महत्वपूर्ण लोग चिंतित हैं. अगर वे दलित हितों की बात करते हैं तो उन्हें राजपूतों को दंडित करना होगा जो उनके ऊंची जाति के वोट बैंक के प्रमुख घटक हैं. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो मायावती और अखिलेश यादव मजबूत हो सकते हैं. दोनों ही सूरत में उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना होगा.

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इसमें कोई संदेह नहीं कि भगवा शिविर खुद को अजीबोगरीब स्थिति में पा रहा है. अखिलेश यादव और मायावती ने पहले ही कई बार संकेत दे दिया है कि वे बीजेपी को हराने के लिए हाथ मिला सकते हैं.

न्यूज18.कॉम को दिए एक इंटरव्यू में अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि वे अपनी तरफ से कांग्रेस के साथ गठबंधन जारी रखना चाहते हैं. हो सकता है कि ऐसा हो.

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लेकिन हकीकत यह है कि क्षेत्र में शांति छिन्न-भिन्न हो गई है. फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है. 'बुधवार को सहारनपुर में फिर से हिंसा हुई, जिसमें तीन लोग घायल हो गए. इसके बाद सरकार ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निलंबित कर दिया. अफवाहों पर रोक लगाने के लिए मोबाइल इंटरनेट और मैसेजिंग सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गईं.'

बीजेपी के राज में ऊंची जातियां अपना वर्चस्व बरकरार रखना चाहती हैं

बुधवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्यपाल से मुलाकात की और कहा कि हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की.

लेकिन दूर-दूर तक शांति दिखाई नहीं देती. मौके का फायदा उठाने की ताक में रहने वाले नेताओं की वजह से हिंदुओं के बीच एकजुटता का नाजुक संतुलन खत्म हो गया है. शांति छिन्न भिन्न हो गई है.

अब आगे क्या होगा? 'ऊपर से पड़ रहे दबाव' के चलते प्रशासन की बढ़ी सक्रियता से कानून-व्यवस्था में सतही सुधार होने की संभावना है, लेकिन ऊंची जातियों और दलितों के बीच पैदा हुई वैमनस्यता जल्द खत्म होने के आसार नहीं हैं.

इसकी वजह यह है कि बीजेपी के राज में ऊंची जातियां अपना वर्चस्व बरकरार रखना चाहती हैं, जबकि दलित अपनी खोई राजनीतिक सत्ता को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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