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बदलने के बजाए इतिहास पर चर्चा क्यों नहीं कराती हैं सरकारें

नाम बदलकर और इमारतें तोड़कर जो लोग यह सोचते हैं कि वे इतिहास मिटा रहे हैं, वे भ्रम में जीते हैं. इतिहास हमेशा बनाने वालों का होता है, मिटाने वालों का नहीं

Rakesh Kayasth Updated On: Sep 13, 2017 03:39 PM IST

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बदलने के बजाए इतिहास पर चर्चा क्यों नहीं कराती हैं सरकारें

भारत विश्वगुरु है. केंद्र सरकार के कई मंत्री आए दिन यह बात जगह-जगह दोहराते हैं. यह अलग बात है कि दुनिया की चोटी की 200 शिक्षण संस्थानों में एक भी नाम भारतीय नहीं है.

सवा अरब लोगों के भारत में 30 करोड़ से ज्यादा लोग अनपढ़ हैं. यानी भारत में अनपढ़ों की तादाद करीब-करीब अमेरिका की आबादी के बराबर है. फिर भी हम विश्वगुरु हैं. शायद हम यह मानते हैं कि विश्वगुरु होने के लिए पढ़ा लिखा होना ज़रूरी नहीं है. सुनहरे अतीत की कहानियां ही काफी हैं.

शिक्षा को नए `स्तर’ पर पहुंचाने के लिए केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकारें अपनी समझ से तरह-तरह के क्रांतिकारी काम कर रही हैं. इनमें स्कूलों के निजीकरण से लेकर मदरसों में वीडियो कैमरे लगवाने जैसे कदम शामिल हैं. लेकिन सबसे ज्यादा ज़ोर इतिहास को बदलने पर है.

इतिहास बदलने की सनक

ऐतिहासिक तथ्यों को बदलने की एक नई पहल आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में होने जा रही है. राज्य के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने ऐलान कर दिया है, 'इतिहास के पाठ्यक्रम में राज्य सरकार अपनी तरफ से 30 फीसदी तक बदलाव करेगी.'

पाठ्यक्रम में बदलाव कोई भी सरकार कर सकती है लेकिन सवाल उठता है, क्या बदलाव और किसलिए? जवाब आपको एक टीवी चैनल को दिए गए डिप्टी सीएम महोदय के इंटरव्यू से मिल जाएगा, ‘मुगल शासक लुटेरे थे, यह इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा. ताजमहल हमारी संस्कृति नहीं है.’

यह अपनी तरह का कोई पहला मामला नहीं है. राजस्थान सरकार ने इतिहास की किताबों में कई बदलाव किए हैं. जिनमें महात्मा गांधी की हत्या के प्रसंग को हटाए जाने से लेकर हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर के बदले महाराणा प्रताप को विजेता बताए जाने जैसी कपोल-कल्पित कहानियां शामिल हैं. पाठ्यक्रम में बदलाव एक एकेडमिक प्रक्रिया है. लेकिन अपने पितृ संगठन आरएसएस को खुश करने के लिए बीजेपी शासित राज्य सरकारें जिस तरह एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं, उसने पूरे मामले को एकेडमिक नहीं बल्कि 100 प्रतिशत राजनीतिक बना दिया है.

महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था, आरएसएस का अपना इतिहास होता है, ठीक उसी तरह जिस तरह उनका अपना विज्ञान होता है'. बीजेपी सरकारों का रवैया को देखें तो आज भी पूरी तरह सही लगती है. संघ के विज्ञान के तहत गणेशजी का सिर प्लास्टिक सर्जरी से जोड़ा जाता है और कर्ण का जन्म स्टेम सेल के जरिए होता है. विज्ञान को फिलहाल छोड़ दें और यह समझने की कोशिश करें कि इतिहास लेकर संघ का ऐसा नज़रिया क्यों है और इसमें मनमाफिक बदलाव हासिल करके वह क्या हासिल करना चाहती है.

तथ्य नहीं कहानियों पर आधारित इतिहास

संघ की आइडोलॉजी का बुनियादी आधार सनातन या हिंदू संस्कृति की श्रेष्ठता है. संघ यह मानता है कि प्राचीनकाल में जो कुछ था, सब बहुत अच्छा था. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता आई भारत का प्राचीन गौरव नष्ट होता गया. विदेशियों और खासकर मुसलमानों के भारत आगमन के बाद भारत की श्रेष्ठता का पतन हुआ, जिसकी फिर से स्थापना की जानी है.

लेकिन क्या ऐतिहासिक तथ्य इस बात की गवाही देते हैं? क्या संघ के इतिहासकार इन तथ्यों पर एकेडमिक सर्किल में बहस को तैयार हैं? ज़ाहिर है, संघ इसके लिए तैयार नहीं है. अगर ऐसा होता तो केंद्र या राज्य सरकारें ऐतिहासिक तथ्यों में बदलाव से पहले एकेडमिक फोरम पर इन्हें लेकर चर्चा करवातीं.

लेकिन ऐसा करने के बदले बीजेपी शासित राज्य चोर दरवाज़े से अपना फर्जी इतिहास किताब के पन्नों में ठूंस रहे हैं. दूसरी तरफ आरएसएस और उसकी सहयोगी संस्थाएं सोशल मीडिया के जरिए अपना कपोल-कल्पित इतिहास करोड़ों लोगों तक रात-दिन पहुंचा रही हैं. संघी इतिहास की एक और खासियत यह है कि इसमें हिस्ट्री और माइथोलॉजी का फर्क अक्सर मिट जाता है.

संघ की नज़र में रामायण और महाभारत भी इतिहास हैं, जबकि सच यह है कि दुनिया की किसी भी और प्राचीन सभ्यता की तरह रामायण और महाभारत माइथोलॉजी हैं, जिन्हें करोड़ों लोग पवित्र मानते हैं, लेकिन इतिहास कतई नहीं. इतिहास और माइथोलॉजी के घालमेल का खतरा यह है कि आस्था का प्रश्न रही पौराणिक कथाएं भी ऐतिहासिक विमर्श के दायरे में आ जाती हैं.

अब ऐसे में कोई इतिहासकार इन कहानियों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाता है, तो फिर लोगों की भावनाएं आहत होती हैं. लोगों में सही इतिहास बोध पैदा करने के बदले बीजेपी अपने वोटरों को यह संदेश देने की कोशिश करती है कि राष्ट्र के गौरव की बात करो तो बुद्धिजीवियों को हजम नहीं होता है. नतीजा यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों पर बहस इतिहास के जानकारों के बीच नहीं होती. एक तरफ इतिहास पढ़ने और पढ़ाने वाले होते हैं तो दूसरी तरफ संघ परिवार के ट्रोल.

राजनतिक मंसूबों के लिए इतिहास से छेड़छाड़

इतिहास घटनाओं की निरंतरता का नाम होता है, जो आपकी पसंद, नापसंद और भावनाओं से परे होते हैं. जो कुछ गुजर गया उसका कुछ नहीं किया जा सकता है, सिवाय उसे स्वीकार करने के. लेकिन संघ को अपना मनपसंद इतिहास चाहिए. डिज़ाइनर सूट या डिज़ाइनर फ्लैट की तरह डिज़ाइनर इतिहास, जिसे पढ़ाकर वह ऐसे नागरिक तैयार कर सके, जो बड़ा राजनीतिक उदेश्य हासिल करने में मददगार हो सकें. बड़ा राजनीतिक उदेश्य है, हिंदू राष्ट्र—जहां सिर्फ एक धर्म और एक सांस्कृतिक पहचान का अस्तित्व हो, बाकी सब या तो गौण हो जाएं या पूरी तरह मिटा दिए जाएं.

ज़ाहिर सी बात है, ऐसी सामूहिक सोच तभी बनाई जा सकती है, जब इसके मुताबिक तथ्य गढ़े जाएं और लोगों तक पहुंचाए जाएं. इतिहास में बदलाव की संघ की जिद और जल्दबाजी का एकमात्र कारण यही है. 2014 में नरेंद्र मोदी विकास एजेंडे के आधार पर सत्ता में आए थे. उसके बाद से अलग-अलग राज्यों में जहां भी बीजेपी की सरकार बनी है, वह मोदी के करिश्मे की वजह से ही बनी है. ज़ाहिर है, यह करिश्मा मोदी की विकास पुरुष वाली छवि का है. लेकिन यह बहुत साफ है कि बीजेपी के लिए आर्थिक एजेंडे से पहले आरएसएस का सांस्कृतिक एजेंडा है.

संघ परिवार के लिए इतिहास, संस्कृति और राजनीति अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं. उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा अगर मुगल शासकों को लुटेरा कहते हैं तो इसका मतलब बहुत साफ है. यह मुसलमानों पर एक तरह का प्रतीकात्मक हमला है. यह हमला बीजेपी के कट्टर हिंदू वोटरों को लामबंद करता है. कट्टरता जैसे-जैसे बढ़ेगी, समाज में विभाजन उतना ही गहरा होता जाएगा और यह विभाजन वोटरों को और गोलबंद करने में मदद करेगा. यह एक सोची समझी राजनीतिक शैली है.

डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने जो कहा उसे तार्किक कसौटी पर कसकर देखें तो समझ में आज जाएगा कि वे कहां खड़े हों है. डिप्टी सीएम साहब फरमाते हैं, 'जिस संस्कृति में गद्दी के लिए पुत्र अपने पिता की हत्या कर देता हो और ताज बनाने वालों के हाथ काट दिए जाते हों वह हमारी संस्कृति नहीं हो सकती.'

पहली बात तो यह है कि मुगल शाहजादों का विद्रोह जैसी घटनाएं इतिहास के पन्नों में तथ्य के रूप में दर्ज हैं. यह भारत की किस किताब में लिखा है, इस घटना से प्रेरणा लेनी चाहिए या इसके आधार पर एक संस्कृति को श्रेष्ठ माना चाहिए? किसी एक घटना के आधार पर एक पूरी संस्कृति को कटघरे में खड़ा करना समाज में विभाजन की एक योजनाबद्ध कोशिश है.

मान लीजिए कोई दिनेश शर्मा के तर्क के आधार पर यह सवाल उठाए कि बिना शिक्षा दिए गुरुदक्षिणा में द्रोण का एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लेना कौन सी श्रेष्ठ संस्कृति है या फिर अफवाह फैलाने वाले लोगों की बातों आकर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल देना कौन सी श्रेष्ठता है, तो इसका कोई क्या जवाब देगा? ऐसे सवालों से सिर्फ भावनाएं आहत होंगी. भावनाओं को आहत करने वाले सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए. हिंदू संस्कृति के यह प्रश्न आस्था के प्रश्न हैं, इनको अपनी जगह छोड़ दिया जाना चाहिए.

इसी तरह याद रखा जाना चाहिए कि इतिहास सिर्फ घटना और उससे जुड़े प्रामाणिक तथ्यों का संकलन होता हैं. इसका इस्तेमाल किसी समुदाय को निशाना बनाने, अपमानित करने और भावनाएं भड़काने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. गलत इतिहास पढ़ाने जाने के नतीजे क्या हो सकते हैं, इसका सबसे अच्छा उदाहरण पाकिस्तान है. बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान बना तो वहां के नेताओं में अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक अजीब सा भ्रम पैदा हो गया.

उन्हें लगा कि अगर वे हज़ारों साल पुरानी भारतीय उपमहाद्वीय संस्कृति से खुद को जोड़ेंगे तो हिंदू संस्कृति के करीब आ जाएंगे. इस डर की वजह से उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों में छेड़छाड़ किए. पाकिस्तानी कोर्स की किताबों में बहुत दिनों तक इतिहास सिंध में अरबों के आक्रमण से शुरू होता रहा. ऐसा करके पाकिस्तान ने ना पूरी दुनिया में अपनी जगहंसाई कराई बल्कि सिंधु घाटी की महान विरासत से भी खुद को महरूम किया.

इतिहास को नकारने के नतीजे भयावह होंगे

जो समाज इतिहास को उसकी संपूर्णता में नहीं समझते हैं, वे अपने साथ-साथ पूरे मानव समुदाय का नुकसान करते हैं. अफगानिस्तान इसकी बहुत बड़ी मिसाल है. इस्लामी सभ्यता की श्रेष्ठता की सनक में डूबे तालिबानियों ने बामियान की गुफाओं में मौजूदा ना जाने कितनी बौद्ध प्रतिमाओं को मोर्टार से उड़ा दिया.

वे प्रतिमाएं संपूर्ण मानव जाति की धरोहर थी. हज़ारों साल पहले किन कारीगरों ने रात-दिन मेहनत करके उन प्रतिमाओं को बनाया होगा और तोड़ने में कितना वक्त लगा, शायद चंद घंटे. बीमार शिक्षा तालिबानियों को एक ऐसा हत्यारा बना दिया, जिसे लेकर इतिहास उन्हे कभी माफ नहीं करेगा.

इतिहास नालंदा विहार के विश्वप्रसिद्ध पुस्तकालय में आग लगाने वाले बख्तियार खिलजी को भी माफ नहीं करेगा. इराक और सीरिया में भी इतिहास को मिटाने की ऐसी ही कोशिशें चल रही हैं.

बहावी विचारधारा के आईएसआईएस लड़ाके शिया और दूसरे इस्लामिक फिरकों द्वारा बनाई गई ऐतिहासिक इमारतों को तोड़ रहे हैं. नुकसान किसका हो रहा है, शियाओं का, मुसलमानों का या संपूर्ण मानव समाज का? नाम बदलकर और इमारतें तोड़कर जो लोग यह सोचते हैं कि वे इतिहास मिटा रहे हैं, वे भ्रम में जीते हैं. इतिहास हमेशा बनाने वालों का होता है, मिटाने वालों का नहीं.

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