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भारतीय मुसलमानों को भड़काने के लिए हो रहा है रोहिंग्या संकट का इस्तेमाल

अफसोस की बात है कि रोहिंग्या लोगों के दुख-दर्द की कहानी को घुमाकर ‘दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म’ की कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है

Ghulam Rasool Dehlvi Updated On: Sep 18, 2017 09:19 AM IST

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भारतीय मुसलमानों को भड़काने के लिए हो रहा है रोहिंग्या संकट का इस्तेमाल

अफसोस की बात है कि रोहिंग्या लोगों के दुख-दर्द की कहानी को घुमाकर ‘दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म’ की कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है और इसका इस्तेमाल मुस्लिम नौजवानों के एक गैर-जानकार तबके के मन में यह बात बैठाने के लिए हो रहा है कि मुसलमान सताए जा रहे हैं. इससे ज्यादा खराब बात यह है कि आम मुसलमान जिस पर इस तरह के चरमपंथी जुमले का असर होता है, ऐसे किसी असर की बात से बेखबर है.

जैश-ए-मोहम्मद-अल-कलाम नाम के आतंकी संगठन की घरेलू पत्रिका में एक लेख प्रकाशित हुआ है. इस लेख में दक्षिण एशिया के मुसलमानों से कहा गया है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के दमन-उत्पीड़न का बदला लेने के लिए हिंसक जेहाद छेड़ने की जरूरत है.

चरमपंथी इस्लामी पत्रिका अल-कलाम उर्दू में प्रिंट और ऑनलाइन दोनों ही रूप में प्रकाशित होती है और भारतीय उपमहाद्वीप के नाजुक-खयाल और जुझारू तेवर के नौजवानों को आसानी के साथ हासिल है. इस किस्म के जेहादी साहित्य का पाकिस्तान, कश्मीर और भारत के अन्य उर्दूभाषी इलाके के भोले-भाले नौजवानों को बहकाने में बड़ा हाथ है.

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यह साप्ताहिक पत्रिका अपने को इस्लामी सहाफत (पत्रकारिता) का झंडाबरदार कहती है और इस पत्रिका के ताजे संस्करण में मौलाना मसूद अजहर का लिखा एक लेख छपा है. मसूद अजहर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सरगना है.

Masood Azhar

मसूद अजहर

अजहर म्यांमार की सरकार को जुल्मी करार देते हुए धमकी दे चुका है कि वह (म्यांमार) जैश-ए-मोहम्मद के 'विजेता लड़ाकों के पैरों की गूंज सुनने के लिए तैयार' रहे. मसूद अजहर का दावा है, 'म्यांमार जल्दी ही अमन-चैन के लिए तरस जाएगा'.

इस भड़काऊ लेख की बातों पर सरसरी नजर डालने भर से पता चल जाता है कि उसमें पाठक का माइंडवॉश करने की तासीर है. लेख में एक जगह आता है: 'दुनिया का मुस्लिम समुदाय (उम्मा) मुस्लिम मुल्क के दर्द को महसूस कर रहा है. म्यांमार के मुसलमानों के त्याग के कारण उम्मा को होश आया है और हम देख रहे हैं कि दुनिया के मुसलमानों में एक जागरुकता आई है. म्यांमार के मुसलमानों के लिए हम जो भी कर सकते हैं हमें वह सब कुछ जरूर करना चाहिए. उनके लिए दुआ मांगिए और उनकी मदद के लिए उठ खड़े होइए. आपको अपना किया दिखाने की जरूरत नहीं, सिर्फ करते जाइए और इस राह में रुकिए मत.' उर्दू में लिखा यह पूरा लेख इस लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है.

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इस तरह, ऐसा पहली बार हुआ है जब दक्षिण एशिया के किसी चरमपंथी विचारक ने म्यांमार में जेहाद करने का आह्वान किया है. यहां अहम बात यह है कि जेहाद का यह युद्ध-नाद अल-कलाम के साप्ताहिक स्तंभ में आया है जिसे मौलाना मसूद अजहर, सा’दी के छद्मनाम से लिखता है. जैश-ए-मोहम्मद की घरेलू पत्रिका के इस 'बेताब बर्मा' शीर्षक लेख में, भारतीय उप-महाद्वीप के आम मुसलमानों से अपील की गई है कि वे 'कुछ करें'.

यह देख पाना मुश्किल नहीं कि दक्षिण एशिया के सबसे कुख्यात चरमपंथी जमात ने जेहाद का आह्वान एक ऐसे वक्त में क्यों किया है जब भारत में मुसलमानों की एक बड़ी तादाद 'रोहिंग्या के लिए उठ खड़े होने के नारे लगा रही है.'

देश के मुस्लिम नागरिकों को इस बात का दुख है कि म्यांमार के उनके रोहिंग्या धर्म-बंधुओं पर वहां की सरकार जुल्म ढा रही है. उनके मन में अभी रोहिंग्या मुसलमानों के लिए गहरी धार्मिक संवेदना उमड़ रही हैं. जैश-ए-मोहम्मद और उस जैसी जमातों का जेहाद का आह्वान भारत में इस्लामी भावनाओं को उबाल पर लाने का काम करेगा.

म्यांमार में जेहाद का पहला आह्वान करके जैश-ए-मोहम्मद ने मजहबी फसाद के बीज बो दिए हैं. मौलाना मसूद अजहर के फतवे पर अमल करने की उन्मादी दावेदारी में अतिवादी मुस्लिम जमातें रोहिंग्या जेहाद के लिए उतावली हो रही हैं. बांग्लादेश को भी अब लगने लगा है कि रोहिंग्या का मुद्दा वहां की आतंकी जमातों के लिए जेहादियों को भर्ती करने का कहीं मौका ना साबित हो.

बांग्लादेश के अधिकारियों को आशंका है कि वहां की सरजमीं पर पनपे जेहादी समूह देश में फैले मदरसों से छात्रों को रोहिंग्या के अधिकारों की खातिर लड़ने के लिए बतौर जेहादी भर्ती करेंगे.

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आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से ऐसी आशंकाएं भारत को लेकर भी हैं. इस्लाम-आधारित बहुत से सोशल मीडिया समूह रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे जुल्म की तस्वीरें थोक भाव से शेयर कर रहे हैं और इस तरह से ये समूह भारत के आम मुसलमानों के मन में यहां की सरकार के प्रति भय-भावना जगा रहे हैं.

रोहिंग्या शरणार्थी बॉर्डर पार करने के बाद नाफ नदी पार करने के लिए नावों का इंतजार करते हुए.

अपने धर्मबंधुओं के प्रति भारतीय मुसलमानों के मन में हमदर्दी स्वाभाविक है. इसे सीधे-सीधे खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे आंतरिक सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा हो गया है. खासकर यह देखते हुए कि पाकिस्तान की जेहादी जमातें इस तर्ज पर सहानुभूति जताते हुए पुरजोर लफ्जों में समर्थन जाहिर कर रही हैं और फसादी मंसूबों वाले बयान जारी करके भय का माहौल बना रही हैं.

क्या एक समुदाय के रूप में सभी रोहिंग्या कट्टरपंथी इस्लामी जमात अका मुल मुजाहिद्दीन से जुड़े हैं और क्या इस लिहाज से उनका गैर-कानूनी अप्रवास भारत की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है? ये सवाल अब भी बहसतलब है. लेकिन रोहिंग्या के कट्टरपंथी तेवर की मुखालफत में मजहबी आधार पर कोई तर्क भी सामने नहीं आया है.

और फिर, इस बात के भी पर्याप्त सबूत हैं कि रोहिंग्या से जुड़े अतिवादी या तो पाकिस्तानी वहाबियों के शुद्धतावादी विचारों के असर में हैं या फिर उनपर भारत स्थित इस्लाम के प्रचार-प्रसार के वैश्विक आंदोलन तब्लीगी जमात का प्रभाव है. इस बात को ध्यान में रखते हुए उप-महाद्वीप के मुख्यधारा के मुसलमानों को चाहिए कि अल-कलाम जैसी पत्रिकाओं के जरिए फैल रहे रोहिंग्या जेहाद के कट्टरपंथी जुमले का विरोध करें. भारत के इस्लामी नेताओं के मन में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए हमदर्दी है और वे उन्हें नैतिक समर्थन दे रहे हैं. यह बात अपनी जगह ठीक है. लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम समुदाय कट्टरता की भावनाओं के चंगुल में ना फंस जाए.

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रोहिंग्या-संकट के बारे में विचारधारा के कोण से जांच-परख करने पर पता चलता है कि भारत में रहने वाले रोहिंग्या लोगों का एक हिस्सा इस्लामी चरमपंथी जमातों के असर में आ चुका है. ये चरमपंथी जमातें रोहिंग्या मुसलमानों को अहसास दिलाती रहती हैं कि वे लोग मजलूम हैं, उन पर जुल्म ढाए जा रहे हैं. भारत के अधिकारियों को भी इस बात के सबूत मिले हैं कि चरमपंथी जमातों ने कुछ रोहिंग्या लोगों को आकर्षित करने मे कामयाबी हासिल की है और उनसे वादा किया है कि म्यांमार, बांग्लादेश तथा भारत में बदले की कार्रवाई करने के लिए उन्हें मदद दी जाएगी.

माना जा रहा है कि रोहिंग्या शरणार्थी असम, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा जम्मू-कश्मीर सहित भारत के कई हिस्सों में रह रहे हैं. सिर्फ दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में लगभग 5000 रोहिंग्या शरणार्थी मौजूद हैं. हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक गुड़गांव के नजदीक सोहना रोड से लगती झुग्गी-झोपड़ियों में रोहिंग्या शरणार्थियों की तादाद ज्यादा है.

बॉर्डर पार करने के बाद रोहिंग्या शरणार्थियों को मिली खाने की मदद. (रॉयटर्स)

बॉर्डर पार करने के बाद रोहिंग्या शरणार्थियों को मिली खाने की मदद. (रॉयटर्स)

दुर्दशा में पड़े लोगों को रोटी-कपड़ा-मकान मुहैया कराना बेशक इंसानियत का तकाजा है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इस नाते रोहिंग्या शरणार्थियों को मदद देने की उम्मीद ठीक ही है. लेकिन भारत के नागरिकों के लिए यह बात बड़ी परेशान करने वाली साबित हो सकती है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के तार किसी ना किसी तरीके से पाकिस्तान से जुड़े हो सकते हैं.

मिसाल के लिए रोहिंग्या लोगों की एक चरमपंथी जमात अका मुल मुजाहिद्दीन है. यह हरकत-उल-जेहाद इस्लामी अराकान की पैदाइश है, जिसके गहरे रिश्ते जैश-ए-मोहम्मद और जमात-उद-दावा से हैं. इस तरह की खबरें भी आई हैं कि कुछ रोहिंग्या कश्मीर में पाकिस्तानी अतिवादियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ रहे हैं. इनका शीर्ष का एक नेता छोटा बर्मी पिछले साल जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर आदिल पठान के साथ कश्मीर में मारा गया था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक छोटा बर्मी पाकिस्तान में हफीज सईद के साथ मंच साझा कर चुका था.

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रोहिंग्या अतिवादियों और पाकिस्तानी उग्रवादियों के बीच विचारधारा के स्तर पर सांठगांठ है. यह बात अल-कायदा से जुड़े पाकिस्तानी उग्रवादी उस्ताद फारुख के बयान से एकदम जाहिर है. साल 30 सितंबर, 2013 को उस्ताद फारुख ने भारतीय सरकार को चेतावनी दी थी, 'कश्मीर और गुजरात के बाद... अपने शैतानी कारनामों की लिस्ट में तुम चाहो तो असम को भी जोड़ सकते हो.' इसके बाद से लगातार यह चिंता जाहिर की जाती रही है कि असम के मुसलमान कहीं कट्टरपंथी भावनाओं के जाल में ना फंस जाएं.

कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिद्दीन म्यांमार के मुसलमानों को जुल्म का सताया हुआ बताकर कट्टरपंथी भावनाओं को भड़काने में लगा है. इस अतिवादी संगठन से सहानुभूति रखने वाले लोगों ने ईद-उल-अदहा के मौके पर सोशल मीडिया ग्रुप्स में उर्दू का एक पोस्टर बड़े पैमाने पर शेयर किया.

पोस्टर में घाटी के मुसलमानों से गुजारिश की गई थी कि हलाल किए गए जानवर की खाल हिज्बुल मुजाहिद्दीन को दान कीजिए, क्योंकि वह रोहिंग्या मुसलमानों का मददगार है. पोस्टर में कहा गया था, 'कश्मीर, फिलीस्तीन, अफगानिस्तान, इराक और अब बर्मा. पूरी दुनिया में मुसलमानों का बेरहमी से कत्ल-ए-आम हो रहा है. लेकिन हिज्बुल मुजाहिद्दीन के नौजवान हर जगह मुसलमानों पर हो रहे हमले से निपटने के लिए अच्छी तरह तैयार हैं.

अब आपका जिम्मा बनता है कि आप इस नेक काम के लिए दान दें. सो आपको इस्लामी दान और चंदा (सदाकत और खैरियत) जरूर देना चाहिए, खासकर हलाल जानवर की खाल हिज्बुल मुजाहिद्दीन को बतौर चंदा जरूर दीजिए क्योंकि हिज्बुल मुजाहिद्दीन ने संकट में पड़े मुसलमानों को फंदे से छुड़ाने का बीड़ा उठाया है.'

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जम्मू में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का एक बच्चा.

पोस्टर पर बर्मा, फिलीस्तीन, अफगानिस्तान और इराक में बेरहमी से मारे गए मुस्लिम बच्चों और औरतों की भयावह तस्वीर नुमाया है. प्रगतिशील और उदारवादी रुझान के उर्दू दैनिक नया जमाना में छपे एक लेख के मुताबिक पोस्टर पर तीन जिम्मेदार लोगों के फोन नंबर पर दिए गए हैं.

अचरज नहीं कि हिज्बुल मुजाहिद्दीन के कमांडर रह चुके कश्मीरी उग्रवादी जाकिर हुसैन ने, जो अब कश्मीर में जेहादियों की एक नई जमात अनसार गजवत-उल-हिन्द का सरगना है. हाल में जारी एक वीडियो में भारत को धमकी दी है कि अगर जम्मू में रह रहे 8000 रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर निकाला जाता है तो कत्ल-ए-आम मचा देंगे.'

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इस्लामी कट्टरपंथी भावनाओं को उभारने की पाकिस्तान के सिरे से होने वाली कोशिश कभी मंद नहीं पड़ती और इसके बीच रोहिंग्या लोगों का संकट भारत के लिए बड़ी चिंता का सबब बन गया है. खबरों में आया है कि लश्कर-ए-तैयबा के नाम से कुख्यात आतंकी संगठन जमात-उद-दावा ने इंडोनेशिया में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए शरणार्थी शिविर लगाए हैं. अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हफीज सईद के नेतृत्व में चलने वाला जमात-उद-दावा अपने को मानवतावादी संगठन बताकर कई देशों में रोहिंग्या अप्रवासियों को भोजन, कपड़े और शरण मुहैया करा रहा है.

भारत में आमतौर पर बुद्धिजीवी, जिसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार और इस्लामी नेता शामिल हैं, रोहिंग्या संकट को विचारधारा के गहरे कोण से शायद ही कभी देखते हैं. वे इस बात को देख पाने में नाकाम हैं कि कट्टरपंथी इस्लामी जमातें, खासकर पाकिस्तान के जेहादी समूह किस तरह रोहिंग्या मामले का दुरुपयोग कर रहे हैं. सिद्धांत की रोशनी में देखकर रोहिंग्या मुद्दे पर छाया धुंधलका हटाना जरूरी है.

(लेखक इस्लाम के जानकार हैं. संस्कृति-विश्लेषक तथा मीडिया एंड कम्युनिकेशन स्टडीज के रिसर्चर हैं. उनसे grdehlavi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

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