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रोहिंग्या: क्या सच में देश को इनसे खतरा है?

रोहिंग्या समुदाय बर्मा लौटना तो चाहते हैं लेकिन वहां के हालात इतने बद्तर हैं कि वे दर-दर भटकने के मजबूर हैं

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Sep 19, 2017 10:25 PM IST

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रोहिंग्या: क्या सच में देश को इनसे खतरा है?

सोमवार को भारत सरकार की तरफ से कोर्ट में जमा किए गए हलफनामा में कहा गया है कि देश की सुरक्षा को रोहिंग्या मुसलमानों से खतरा है. हलफनामे में ये भी कहा गया कि रोहिंग्या मुसलमान आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं. यह भी कहा जा रहा है कि इनका संपर्क पाकिस्तान और आतंकी संगठन आईएस से भी है.

दर-बदर भटकने को मजबूर

दिल्ली के मदनपुर खादर में बर्मा से आए रोहिंग्या मुसलमानों के 47 परिवार यहां रहते हैं. सब के सब 2012 में यहां आएं थे. कोई समुद्र के रास्ते...कोई जंगल के रास्ते. कहानियां भले अलग हैं पर हालात कमोबेश एक से.

बर्मा से अपना घर छोड़ कर आई सोफिया कहती हैं, हिंदुस्तान में तो फुटपाथ पर भी रहने में अच्छा लगता है. लेकिन बर्मा के बारे में तो सोच भी नहीं सकती. वहां न खाने को कुछ है और न रोजगार. बच्चों को पढ़ाना तो दूर की बात अगर परिवार में बेटी हो तो उसके साथ रेप आम बात है. शादी करने के लिए भी सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है.

जिंदगी का हिस्सा बना दर्द

ये सोफिया जैसी तमाम रोहिंग्या महिलाओं की कहानी का एक हिस्सा है. ये बयां करता है कि बर्मा में किन दुश्वारियों के चलते ये अपना सबकुछ छोड़कर मारे-मारे फिर रहे हैं. हालांकि अपने वतन की मिट्टी की खुशबू आज भी इनकी यादों में बसी है. सोफिया की आंखों में ये कहते हुए अजीब सी चमक आ जाती है कि अगर बर्मा में सबकुछ ठीक हो जाएगा तो वो वापस अपने देश लौट जाएंगी.

लेकिन क्या वाकई बर्मा के हालातों को देखते हुए बीस साल से हिंदुस्तान में बसे रोहिंग्या वापसी के बारे में सोच सकते हैं? शायद नहीं, क्योंकि जो खूनी यादें इनसे जुड़ी हुई हैं वो दिमाग से शायद ही कभी मिट सकें.किसी ने बाप को तो किसी ने भाई को तो किसी ने बेटे को अपनी आंखों के सामने मरते देखा है. लेकिन जब हिंदुस्तान में उन्हें पांव रखने की जमीन मिली और सिर पर छत तो उन्हें अहसास हुआ कि सुरक्षा और सुकून क्या होता है.

जाएं तो जाएं कहां?

अपनी मां के साथ जिंदगी बचा कर भारत पहुंची तस्लीमा बताती हैं कि उनके पिताजी और चाचा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. तस्लीमा के तीन बच्चे हैं. अपने 6 x 6 के इस घर में वो अपने बच्चे और पति के साथ खुश है. खुश इसलिए क्योंकि वो जिंदा हैं.

सलीमुल्लाह बताते हैं कि साल 2012 में जब बर्मा से भागना पड़ा था तब और अब के हालातों में कोई फर्क नहीं है. इनके कई रिश्तेदार आज भी बर्मा में नर्क की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. हिंसा के चलते गांव के गांव जलाए जा रहे हैं. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है. लोग जान बचाकर भागने को मजबूर हैं. लेकिन बड़ा सवाल जाएं तो जाएं कहां?

सलीमुल्लाह वही हैं जिनकी पीटिशन पर सरकार ने कोर्ट में हलफनामा जमा किया है. सलीमुल्लाह कहते हैं उन्होंने कोर्ट से दरख्वास्त की है कि वो ये ना देखें कि हम मुस्लमान हैं या रोहिंग्या. हम भी इंसान हैं, हमे भी जीने का हक है. हमारे अपने देश में हमें रिफ्यूज़ी बना कर रखा गया. हमारा कोई देश नहीं है. बहुत दुख होता है जब हम सुनते है कि हमसे देश को खतरा है.

न देश ना परदेस 

रोहिंग्या के मुसलमानों का इम्तिहान खत्म ही नहीं हो रहा है. भारत में शरण मिली तो अब देश से निकाले जाने का खतरा दिखाई देने लगा है. सलीमुल्लाह कहते हैं भारत बहुत अच्छा है. यहां आजादी है, सुविधाएं हैं. भारत सवा सौ करोड़ लोगों का देश है. क्या इस बड़े देश में हम चालीस हजार के लिए जगह नहीं है. इस देश में और भी कितने शरणार्थी है फिर सिर्फ हमसे क्या परेशानी है.

सैफ ने कहा कि वो खुश हैं कि इस देश में वो ईद की नमाज पढ़ सकते हैं. उनके अपने देश में उन्हें छुप कर नमाज पढ़नी पड़ती थी. स्कूल में उनके समुदाय के लिए अलग सेक्शन बनाए जाते थे ओर दसवीं से आगे पढ़ाई करने की आजादी नहीं है. सैफ कहते है वापस जाने से अच्छा है हम पहले ही बर्मा में मर जाते.

शक के घेरे में रोहिंग्या

रोहिंग्या मुसलमानों के पूरे समुदाय को शक की निगाह से देखा जा रहा है जिसका उन्हें मलाल है. उनका कहना है कि वो भी इंसान हैं. उनकी फरियाद है कि उन्हें भारत से बेदखल न किया जाए. बहरहाल इनकी बस्तियों में बड़ी ख्वाहिशें जन्म नहीं ले सकती हैं क्योंकि जिंदगी जीने और एक आसरा पाने की जद्दोजहद है.

वहीं एक संघर्ष परिवार के बच्चों की परवरिश को लेकर है. ये जानते हैं कि किश्तों में मिली ज़िंदगी भी किश्तों में मिली बसेरे की तरह है इसलिए आरजुओं को अपनी औकात में ही रहने देते हैं. इनकी बदनसीबी का आलम इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि जहां के नागरिक बने उसी मुल्क में रहने का अधिकार नहीं मिला.

एक सवाल यह भी है कि जो लोग अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं दे पा रहे हैं. आसरे की तलाश में एक देश से दूसरे देश भटक रहे हैं. क्या वे सच में आतंकी हैं या यह हमारे मन का मैल है?

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