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80 के दशक में रोहिंग्या मुसलमानों का स्वागत और अब नफरत क्यों?

भारत में रोहिंग्या मुसलमान 80 के दशक से रह रहे हैं और लगभग 37 सालों के बाद सरकार को सुरक्षा की चिंता सताने लगी है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Sep 19, 2017 04:04 PM IST

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80 के दशक में रोहिंग्या मुसलमानों का स्वागत और अब नफरत क्यों?

पिछले कुछ दिनों से देश में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है. इस बहस के बीच में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें कहा गया है कि रोहिंग्या मुसलमान भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है.

भारत सरकार की दलील है कि क्योंकि यह मसला देश के करोड़ों लोगों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देनी चाहिए.

भारत में रोहिंग्या मुसलमान 80 के दशक से रह रहे हैं. लगभग 37 सालों के बाद भारत सरकार को सुरक्षा की चिंता सताने लगी है.

अब सवाल यह है कि इतने सालों से इस मुद्दे को क्यों दबाया गया और अब इस मामले को क्यों उठाया जा रहा है. क्या भारत का राजनीतिक हालात रोहिंग्या मुसलमानों के लिए खतरा बन गया है या फिर रोहिंग्या मुसलमान आतंकी गतिविधियों में शामिल होते हैं?

म्यांमार से लेकर भारत तक रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में कई तरह की बातें चल रही हैं. रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में कई आतंकी संगठनों कूदने के बाद भारत में रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में शक और गहरा गया है.

इतने सालों बाद क्यों जागी सरकार?

अब सवाल यह है कि भारत सरकार इतने सालों के बाद क्यों नींद से जागी है? भारत सरकार इतने सालों से रोहिंग्या मुसलमानों पर नजर क्यों नहीं रखी? भारत की जांच एजेंसियां इतने सालों से क्यों चुप थी? अगर भारत की जांच एजेंसियों ने सरकार को पहले आगाह किया तो पूर्व की सरकारों ने इस पर क्यों नहीं कार्रवाई की?

इतने सालों के बाद अब यह तर्क क्यों दिया जा रहा है कि रोहिंग्या मुसलमान भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है?

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक, भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की रजिस्टर्ड संख्या 14 हजार से अधिक है. लेकिन, कुछ दूसरे आंकड़ों से पता चलता है कि यह संख्या लगभग 40 हजार के करीब है जो अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं.

रोहिंग्या मुसलमान भारत में मुख्य तौर पर जम्मू, हरियाणा, हैदराबाद, दिल्ली के शाइनबाग एरिया में और  राजस्थान के आस-पास के इलाकों में रह रहे हैं.

क्या भारत की जांच एजेंसियों के पास रोहिंग्या मुसलमानों की आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के कोई सुबूत हैं? कितने रोहिंग्या मुसलमान आतंकी गतिविधि में शामिल हैं?

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ये कुछ सवाल हैं जिनका जवाब केंद्र सरकार को आने वाले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी. रोहिंग्या मुसलमानों का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में देश के जाने-माने अधिवक्ता प्रशांत भूषण रख रहे हैं.

प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर कई तर्क रखे हैं जिसका जवाब केंद्र सरकार को अगले कुछ दिनों में देना है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार युसुफ अंसारी फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए इस पर शुद्ध राजनीति हो रही है. बीजेपी अपनी राजनीति कर रही है और मुस्लिम संगठन अपनी राजनीति कर रही है. रोहिंग्या मुसलमानों को इंसानियत की नजर से देखने की जरूरत है हिंदू या मुसलमान की नजर से नहीं. देश या विदेश के जो भी मुस्लिम संगठन शोर मचा रहे हैं, उनको बॉर्डर पर जा कर रोहिंग्या मुसलमानों के लिए काम करना चाहिए. दुनिया के 50 मुस्लिम कंट्री जो मुसलमानों की रहनुमाई की बात करते हैं क्यों नहीं सामने आ रहे हैं?'

अंसारी आगे कहते हैं, ‘मैं आपको बता दूं कि एक निजी चैनल ने रोहिंग्या मुसलमानों के ठिकानों पर जा कर तहकीकात की. इस तहकीकात में रोहिंग्या मुसलमानों पर अभी तक सिर्फ 14-15 मामले ही दर्ज होने का पता चला है. आपस में लड़ाई-झगड़े और चोरी के ये मामले दर्ज हैं. एक भी मामला बड़े अपराध का नहीं है. ये बातें लोकल लेवल के जो पुलिस अधिकारी हैं वह कह रहे हैं. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा पेश किया है वह विवादास्पद है.’

यह भी पढ़ें: भारतीय मुसलमानों को भड़काने के लिए हो रहा है रोहिंग्या संकट का इस्तेमाल

अंसारी आगे कहते हैं, 'म्यांमार में तो रोहिंग्या मुसलमान के साथ-साथ हिंदू भी हैं. साल 2015 में देश की गृह मंत्रालय ने एक नोटिस जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में हिंदू, सिख या बौद्धों को धर्म के नाम पर अगर भेदभाव किया जाता है तो भारत अपने यहां उनको प्राथमिकता पर नागरिकता देगी. बीजेपी ने 2014 के अपने घोषणापत्र में भी यह बात कही थी. बीजेपी मुख्य एजेंडा है किसी भी तरह 2019 का चुनाव जीतना.’

Rohingya muslim india

सुरक्षा और विदेशी मामलों के जानकारों की राय में भी रोहिंग्या मसला फंसता हुआ नजर आ रहा है. कुछ सुरक्षा सलाहकारों का कहना है कि अलकायदा और आईएसआईएस ने पिछले कई मौकों पर कहा था कि दक्षिण एशिया में भी उनका एक बड़ा धड़ा मौजूद है.

जानकार यह मान कर चल रहे हैं कि यह बड़ा धड़ा बांग्लादेश और म्यांमार में मौजूद है. हो सकता है कि यह धड़ा रोहिंग्या मुसलमानों का हो.

क्या इंसानियत के नाते नहीं हो सकती मदद?

जानकारों की बात को सच भी मान लें कि ये जो रोहिंग्या मुसलमान हैं, इनका कुछ धड़ा आतंकी गधिविधियों में शामिल है. इसके बावजूद वर्तमान परिस्थिति में जो समस्या रोहिंग्या मुसलमानों के साथ पैदा हुई है, उसका जवाब भारत सरकार या म्यांमार सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में मिलती है.

क्या मानवता और इंसानियत के नाम पर किसी की मदद नहीं की जा सकती है? क्या उन मासूम बच्चों और लोगों को ऐसे ही छोड़ दिया जाए जो लगातार तथाकथित जुल्म का शिकार हो कर पलायन कर रहे हैं? क्या विश्व या भारत के मानवाधिकार संगठन रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन पर चुप रह सकते हैं? यह तमाम वो सवाल हैं जिनका जवाब रोहिंग्या मुसलमान मांग रहे हैं.

भारत सरकार की रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर नीति बहुत जटिल रही है. इसका एक पहलू सुरक्षा का है. म्यांमार से जुड़ी सीमा बिलकुल बंद है, वहां से कोई शरणार्थी नहीं आ रहे हैं लेकिन भारत में रह रहे रोहिंग्या की जिम्मेदारी भारत की है.

म्यांमार से दोस्ती और उसकी चीन से बढ़ रही दोस्ती का भी पहलू है. म्यांमार से लगती सीमा को लेकर भी भारत उसका सहयोग चाहता है. म्यांमार एक्ट ईस्ट नीति के कारण भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है.

रोहिंग्या मसले को लेकर बांग्लादेश और म्यांमार एक दूसरे के आगे तने हुए हैं जिसमें चीन ने मध्यस्थता के लिए कहा है. इसको भारत केवल देखता नहीं रह सकता है.

शरणार्थियों को लेकर स्पष्ट नीति का अभाव

अंतरराष्ट्रीय मुद्दा होने के कारण भारत की रोहिंग्या को लेकर नीति स्पष्ट नहीं नजर आ रही है. अलग-अलग सरकारों की अलग-अलग नीति आने वाले दिनों में एक बड़ा संकट का रूप ले सकती है.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों को लेकर किसी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन इतिहास देखें तो भारत ने हमेशा शरणार्थियों का स्वागत किया है.

1950 से तिब्बत से शरणार्थी आते रहे हैं. इसके अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका से भी आते रहे हैं.

रोहिंग्या मुसलमान भारत में शरणार्थी के रूप में रहेंगे या नहीं यह सवाल भविष्य के गर्भ में है. इसमें सांप्रदायिकता का मसला भी कहीं न कहीं है. जम्मू में बाहर से आए हिंदुओं को नागरिकता देने की बात हो रही है तो मानवता के नाम पर रोहिंग्या मुसलमानों के साथ यह बर्ताव क्यों किया जा रहा है?

80 के दशक में जब रोहिंग्या मुसलमान भारत आए थे तब उनका स्वागत किया गया था लेकिन आज सरकार की नीति कुछ और हो गई है. देश की सरकारों ने शरणार्थियों की समस्या को अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरीकों से भुनाया, लेकिन शरणार्थी आज भी शरणार्थी बन कर ही जीवन यापन कर रहे हैं.

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