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रोहिंग्या शरणार्थी: बढ़ती जा रही हैं असम की मुश्किलें

तमाम बातों के बावजूद असम की सीमा पर जरूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं

Kangkan Acharyya Updated On: Sep 14, 2017 09:30 AM IST

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रोहिंग्या शरणार्थी: बढ़ती जा रही हैं असम की मुश्किलें

म्यांमार में धार्मिक जुल्म के शिकार हो रहे रोहिंग्या शरणार्थी बड़ी तादाद में बांग्लादेश में पनाह ले रहे हैं. इस वजह से असम में एक बार फिर बांग्लादेश से घुसपैठ का खतरा मंडरा रहा है. ये खतरा इसलिए है क्योंकि बांग्लादेश से लगी सीमा पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. हाल ही में रोहिंग्या मुसलमानों का एक समूह बांग्लादेश के रास्ते असम में दाखिल हो गया था.

मेघालय टाइम्स ने एक पुलिस अधिकारी का हवाला देते हुए कहा कि अगस्त में महीने में असम की बराक घाटी में स्थित करीमगंज जिले में पुलिस ने 6 रोहिंग्या गिरफ्तार किए थे. इनको चुड़ाईबारी इलाके से गिरफ्तार किया गया था. ये लोग त्रिपुरा के रास्ते असम पहुंचे थे. अखबार के मुताबिक, ये रोहिंग्या, म्यांमार के रखाइन सूबे से भागकर बांग्लादेश पहुंचे थे. वहां से ये लोग असम होते हुए नेपाल जाना चाह रहे थे.

असम पुलिस ने बांग्लादेश से लगी सीमा पर एलर्ट जारी किया है. म्यांमार के रखाइन राज्य से करीब तीन लाख रोहिंग्या, जुल्म से बचने के लिए बांग्लादेश में पनाह ले चुके हैं.

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हालांकि असम में इस बात को लेकर ज्यादा फिक्र नहीं दिखती. जबकि असम की बांग्लादेश से लगी सीमा पूरी तरह से असुरक्षित है. सुरक्षा में खामी का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि 6 रोहिंग्या बांग्लादेश से असम में घुस आए.

आल असम स्टूडेंट यूनियन के महासचिव लुरिनज्योति गोगोई कहते हैं कि ये बेहद फिक्र की बात है. असम के स्थानीय लोग घुसपैठ के इस नए खतरे से परेशान हैं. इस बात की पूरी आशंका है कि बांग्लादेश से रोहिंग्या असम में घुस सकते हैं.

यूं तो असम की सीमा म्यांमार से नहीं लगती. मगर असम और बांग्लादेश की सीमाएं मिलती हैं. इस सीमा पर घुसपैठ रोकने के इंतजाम नहीं के बराबर हैं. ये देश की सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक स्थिति है. लुरिनज्योति गोगोई कहते हैं कि जो भी चाहता है वो बांग्लादेश से असम में घुस आता है.

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अभी तक नहीं उठाए गए हैं कदम

ये पूरा इलाका नदियों वाला है. इसकी सही तरीके से बाड़बंदी नहीं की गई है. यूं तो केंद्र सरकार ने कई बार कहा कि वो आधुनिक तकनीक की मदद से बांग्लादेश से लगी असम की सीमा की निगरानी करेगा. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि जरूरत हुई तो लेजर तकनीक या सैटेलाइट की मदद भी सरहद की निगरानी के लिए की जाएगी. लेकिन गोगोई का कहना है कि अब तक केंद्र ने सिर्फ बातें ही की हैं, सीमा की रखवाली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए.

भारत और बांग्लादेश के बीच चार हजार 96 किलोमीटर लंबी सीमा है. असम में इसका 263 किलोमीटर का इलाका पड़ता है. करीमगंज जिले में जिस हिस्से से नदियां बहती हैं, सीमा के उस हिस्से में बाड़ नहीं लगाई जा सकी है.

रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर विवाद उस वक्त खड़ा हुआ, जब असम की कांग्रेस कमेटी ने इंसानियत के आधार पर रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में पनाह देने की वकालत की.

कांग्रेस के नेता अब्दुल खालिक ने कहा कि भारत में लोगों को शरण देने की ऐतिहासिक परंपरा रही है. खास तौर से पड़ोसी देशों में जुल्म के मारे लोगों को हिंदुस्तान ने कई बार पनाह दी है. जैसे 1971 की लड़ाई के दौरान बांग्लादेश से भाग रहे लोगों ने भारत में शरण ली थी. इसी तरह चकमा शरणार्थियों को भी भारत ने अपनाया था और तिब्बती लोगों को भी.

अब्दुल खालिक ने कहा कि भारत को इसी परंपरा को निभाते हुए रोहिंग्या लोगों को भी शरण देनी चाहिए.असम में अब्दुल खालिक के इस बयान का कड़ा विरोध हुआ था. असम के मूल निवासियों ने अब्दुल खालिक के बयान पर तगड़ा ऐतराज जताया था.

आल असम स्टूडेंट यूनियन के महासचिव लुरिनज्योति गोगोई ने कहा कि असम पहले ही बांग्लादेश से आए घुसपैठियों और शरणार्थियों की बड़ी तादाद का बोझ उठा रहा है. इस वजह से असम में कई इलाकों में तो मूल निवासी ही अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं.

गोगोई ने कहा कि अगर केंद्र सरकार रोहिंग्या लोगों को भारत में शरण देने का फैसला करती भी है तो इन्हें असम में नहीं जगह दी जाएगी. बाद में कांग्रेस ने भी सफाई दी थी कि वो रोहिंग्या शरणार्थियों को असम के बजाय दूसरे राज्यों में शरण देने की पक्षधर है.

असम की राजनीति में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा हमेशा से अहम रहा है. सत्तर के दशक में ही असम में घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजने की मांग जोरदार तरीके से उठी थी.

करीब 6 साल चले आंदोलन के बाद 1985 में सरकार ने असम समझौता किया था. इसके बाद जाकर वो आंदोलन खत्म हुआ था. लेकिन इस समझौते से घुसपैठियों का मुद्दा खत्म नहीं हुआ. आज भी भारत और बांग्लादेश की सीमा जस की तस है. कई हिस्सों की सीमा को लेकर तो दोनों देशों में विवाद भी है.

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सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका के बाद सीनियर वकील उपमन्यु हजारिका की अगुवाई में एक आयोग बनाया था. इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में घुसपैठियों की बढ़ती तादाद पर चिंता जताई थी. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि घुसपैठिये असम में घुसकर बड़े आक्रामक तरीके से राज्य के संसाधनों पर कब्जा जमा रहे हैं. इससे आबादी का गुणा-भाग भी बिगड़ रहा है. आयोग ने ये भी कहा था कि सरकार भी इन घुसपैठियों की मददगार बन गई है.

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ज्यादातर घुसपैठिये मुसलमान हैं. इस वजह से असम में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है.बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के सबूत हर दशक में होने वाली जनगणना से भी मिलते हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक असम के 27 में से 9 जिलों में मुस्लिम बहुमत में आ गए हैं. 2001 में मुस्लिम बहुल जिलों की संख्या 6 थी. दस साल में बोंगाईगांव, मोरीगांव और दरांग में भी मुस्लिम आबादी बहुमत में हो गई.

2001 में बरपेटा, धुबरी, करीमगंज, गोलपाड़ा, हैलाकांडी और नौगांव जिले ही मुस्लिम बहुल थे. इन जिलों में वक्त उस 38.5 फीसद आबादी मुसलमानों की थी. 2011 में मोरीगांव में 47.6 फीसद और दरांग में 35.5 फीसद आबादी मुस्लिम हो गई थी.

हालांकि बहुत से सियासी दलों ने बढ़ती मुस्लिम आबादी को चुनावी मुद्दा बनाया. लेकिन कांग्रेस ने हमेशा से ये कहा कि असम में मुस्लिम आबादी घुसपैठ की वजह से नहीं, बल्कि अशिक्षा की वजह से बढ़ रही है. 2014 में असम में बीजेपी ने ये वादा करते हुए जीत हासिल की कि वो घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजेगी.

हालांकि केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वो रोहिंग्या को भारत में शरण नहीं देगी. लेकिन अवैध घुसपैठ का खतरा तो देश में मंडरा ही रहा है. और ये खतरा सिर्फ असम के लिए नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों के लिए भी है. असम में ये खतरा बांग्लादेश के साथ लगी असुरक्षित सीमा की वजह से है. एक वजह ये भी है कि स्थानीय लोगों और घुसपैठियों में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल है. क्योंकि घुसपैठियों और असम के स्थानीय निवासियों में ज्यादा फर्क नहीं है.

पैट्रियोटिक फोरम ऑफ असम के नबा ठाकुरिया कहते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या कमोबेश एक जैसे कपड़े पहनते हैं. दोनों की बोली भी एक है. ऐसे में दोनों में फर्क कर पाना मुश्किल है.

ठाकुरिया के मुताबिक असम में बाहर से आने वाले लोगों की वजह से आबादी पूरी तरह से बदल गई है. स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं. असम में असम के मूल निवासी ही आज कम हो गए हैं. ऐसे में लुरिनज्योति गोगोई डर जताते हैं कि अगर रोहिंग्या भी राज्य में घुस आए, तो असम अपनी पहचान पूरी तरह खो देगा.

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