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राइट टू प्राइवेसी: सुप्रीम कोर्ट का फैसला धारा 377 के खिलाफ लड़ाई में बड़ी जीत है

कोर्ट के फैसले के बाद भारत के लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल, ट्रांस-जेंडर और क्वीअर (LGBTQ) समुदाय को बड़ा अचरज हुआ कि इसी अदालत ने उनकी पहचान को अपना समर्थन ना देते हुए धारा 377 को बहाल रखा था

Phalguni Rao Updated On: Sep 03, 2017 10:22 PM IST

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राइट टू प्राइवेसी: सुप्रीम कोर्ट का फैसला धारा 377 के खिलाफ लड़ाई में बड़ी जीत है

जब सुप्रीम कोर्ट ने 30 अगस्त को राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार करार दिया और इसके दायरे में लोगों के सेक्सुअल ओरिएन्टेशन (यौन-जीवन संबंधी रुझान) को शामिल किया था. कोर्ट के फैसले के बाद भारत के लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल, ट्रांस-जेंडर और क्वीअर (LGBTQ) समुदाय को बड़ा अचरज हुआ कि इसी अदालत ने उनकी पहचान को अपना समर्थन ना देते हुए धारा 377 को बहाल रखा था.

‘धारा 377 के होते सरकार को अधिकार है, वह झांककर देख सकती है कि हम अपने बेडरूम में क्या कर रहे हैं, लेकिन यह हमारी प्राइवेसी का उल्लंघन है. पहले हम धारा 377 में कमियां खोजा करते थे लेकिन इस फैसले के जरिए कोर्ट ने एक तरह से हमें बताया है कि उम्मीद हारने की जरुरत नहीं. हम अब अपनी बात को आगे ले जा सकते हैं.’ यह कहना है 28 वर्षीय अलेक्स मैथ्यू का. मैथ्यू एक स्वयंसेवी संस्था में कम्युनिकेशन ऑफिसर के रूप में काम करते हैं. वे एक ड्रैग आर्टिस्ट हैं और खुद को क्वीअर बताते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला राहत की बात है

धारा 377 के विरुद्ध शुरुआती याचिका कोर्ट में नाज फाउंडेशन ने लगाई थी. इस फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक (एक्जिक्टिव डायरेक्टर) अंजली गोपालन को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके लिए बड़ी राहत की बात है और खुशी की भी. अंजली का कहना है- ‘हम इस(फैसले) से बहुत खुश हैं. यह LGBTQ समुदाय के लिए बहुत बड़ा कदम है. अब कम से कम एक फैसला तो है जो उन्हें एक ना एक तरीके से उनकी हिफाजत करता है. हालांकि अभी होमो-सेक्सुअलिटी अपराधों की श्रेणी में ही शामिल है लेकिन राइट टू प्राइवेसी के कारण अब LGBTQ समुदाय को एक किस्म की सुरक्षा हासिल हुई है.’

22 वर्षीय अंकुर चक्रवर्ती अपने को ‘गे’ और ‘जेंडर नॉन-कंफर्मिंग’ बताते हैं. वे ड्रैग क्वीन रैंडी स्कारहोल की अदाकारी भी करते हैं. वे मानते हैं कि राइट टू प्राइवेसी के दायरे में सेक्सुअल ओरियन्टेशन को शामिल करने की बात सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ. वे खुश हैं कि ऐसा होने की वजह से अब धारा 377 पर बहस आसान हो जाएगी.

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अंकुर बताते हैं ‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे लोग इसे शामिल करेंगे और यह कहेंगे कि आपलोग जो अपने बेडरूम में करते हैं वह आपकी प्राइवेसी के दायरे में आता है. लेकिन मेरी भावनाएं इस मामले में बहुत साफ नहीं हैं क्योंकि धारा 377 अब भी अमल में है और यह धारा समलैंगिक यौन-संबंध को अपराध बताती है लेकिन प्राइवेसी का अधिकार हमारी लैंगिक पहचान की हिफाजत करता है. दो परस्पर विरोधी कानून एक साथ मौजूद हैं लेकिन यह बात तय है कि अब हम धारा 377 के खात्मे की दिशा में पहले से कहीं ज्यादा नजदीक हैं.’

राइट टू प्राइवेसी से संबंधित फैसला भारत के LGBTQ समुदाय के संवैधानिक अधिकारों के हक में है. इसमें दो बात मानी गई है. एक तो यह कि सेक्सुअल ओरिएन्टेशन (यौन-संबंध के मामले में रुझान) प्राइवेसी का अनिवार्य हिस्सा है. तीन अन्य जजों के दस्तखत वाले जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ के फैसले में कहा गया है- ‘यौन-संबंधों के मामले में किसी व्यक्ति के रुझान के आधार पर भेदभाव करना उस व्यक्ति की गरिमा और आत्म-सम्मान पर गहरा आघात है. समानता का तकाजा है कि समाज के हर व्यक्ति के सेक्सुअल ओरिएन्टेशन की समान धरातल पर रक्षा की जाए.’ अपने फैसले में जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ ने यह भी लिखा है कि ‘प्राइवेसी का अधिकार तथा सेक्सुअल ओरिएन्टेशन की सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का अनिवार्य हिस्सा है.’

बेंगलुरु के एक वकील मोहम्मद अफीफ का कहना है ‘दूसरी बात, जजों ने माना है कि सहमति से बनाए गए समलैंगिक सेक्स-संबंधों को अपराध करार देने का सुरेश कौशल बनाम नाज फाउंडेशन (2013) मामले वाला फैसला गलत है और अगर कोई दावा संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है तो उसे अमान्य ठहराने के लिए दो वजह (कम आबादी तथा 150 सालों में मात्र 200 लोगों की दोषसिद्धि) को पर्याप्त संवैधानिक आधार नहीं कहा जा सकता.’

तस्वीरें वायरल होने के बाद प्रोफेसर ने आत्महत्या कर ली थी

जस्टिस संजय किशन कौल का फैसला अन्य जजों के फैसले से भी मेल खाता है. नौ जजों में से पांच ने साफ-साफ कहा है कि व्यक्ति के सेक्सुअल-ओरिएन्टेशन को राइट टू प्राइवेसी के तहत सुरक्षा हासिल है.

गोपालन तनिक अफसोस और रुखाई भरे स्वर में कहती हैं ‘मैं सोच रही हूं कि अगर यह फैसला दो साल पहले आया होता तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिरस ने आत्महत्या नहीं की होती.’

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मराठी प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस सेक्स-संबंधों के मामले में अपने रुझान से समलैंगिक थे. साल 2010 में मीडिया के लोग बगैर अनुमति के उनके घर में घुस आए और प्रोफेसर सिरस की उनके पार्टनर के साथ तस्वीरें उतार लीं. इस घटना के बाद प्रोफेसर सिरस को निलंबित (सस्पेंड) कर दिया गया था. कुछ महीने बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली. प्रोफेसर सिरस की कहानी के आधार पर बाद के दिनों में हंसल मेहता ने अलीगढ़ नाम से एक फिल्म बनाई.

खुद को बाई-सेक्सुअल बताने वाली माइक्रोबायोलॉजी की छात्रा 19 वर्षीय अनाहिता अनंथ भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आश्चर्य में हैं. उनका कहना है, ‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे लोग सेक्सुअल-ओरिएन्टेशन को राइट टू प्राइवेसी के दायरे में शामिल करेंगे. जानकर अच्छा लग रहा है क्योंकि एक देश के रूप में यह आगे की ओर उठा बड़ा कदम है. लेकिन साथ में मुझे शंका भी है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समाज में लोगों की मानसिकता बदलेगी. फैसला इस बात की गारंटी नहीं करता कि लोग LGBT समुदाय के लोगों के यौन-संबंध के मामले में वैकल्पिक राह अपनाने को बुरा नहीं समझेंगे.

अंकुर चक्रवर्ती की राय इस मामले में कुछ अलग है. वे कहते हैं, ‘कानून में बदलाव आने से बहुत फर्क पैदा होता है. अभी की हालत ये है कि धारा 377 समाज में विषमलिंगी यौन-संबंधों को मानक (हट्रोनॉरमेटिव) ठहराता है और इस कारण क्वीअर-फोबिया (LGBT समुदाय में प्रचलित यौन-संबंध को लेकर दुराव) की स्थिति कायम है. लेकिन प्राइवेसी को मौलिक अधिकार बताने का फैसला आता है या फिर धारा 377 को खत्म कर दिया जाता है तो समाज में विषमलिंगी यौन-संबंध को मानक ठहराने का आधार ही खत्म हो जाता है. इसका समुदाय पर गहरा असर होगा. धारणाओं को बदलने में समय लगता है. ऐसा नहीं हो सकता कि लोग एक सुबह जागें और कह दें कि भाई गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर और बाई-सेक्सुअल लोगों से हमें कोई परेशानी नहीं है.

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आगे की राह

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका सुनवाई के लिए लंबित है. इसमें धारा 377 को खत्म करने की प्रार्थना की गई है. इस याचिका पर पांच जजों की संवैधानिक पीठ को सुनवाई करनी है. इस तथ्य को ध्यान में रखकर पूछा जा सकता है कि राइट टू प्राइवेसी के मामले पर आए फैसले से सुनवाई पर कितना असर होगा?

गोपालन का कहना है, ‘मुझे लगता है कि इससे यकीनी तौर पर हमारी दलील को मजबूती मिलेगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जब सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया था तो उसका तर्क था कि इस मामले में प्राइवेसी का कोई दखल नहीं है. हम सिर्फ इतना भर कह रहे हैं कि धारा 377 को फिर से पढ़ा जाए और सहमति से बने समलैंगिक यौन-संबंधों को इस दायरे में शामिल ना किया जाए.’

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वकील मोहम्मद अफीफ का कहना है कि धारा 377 में राहत देने के लिए लगाई हुई याचिका पर होने वाली सुनवाई में राइट टू प्राइवेसी वाले फैसला का निश्चित ही असर पड़ेगा. वे अपनी बात को समझाते हुए कहते हैं कि हर फैसले के दो हिस्से होते हैं. एक हिस्सा ऑबिटर डिक्टम का होता है. इसमें जज किसी मामले में अपनी राय का इजहार करते हैं.

यह लिखित भी हो सकता है और मौखिक भी लेकिन यह हिस्सा मामले में दिए गए फैसले के लिहाज से अनिवार्य नहीं होता. इस कारण ना तो यह किसी नजीर (प्रिसीडेन्ट) के रूप में प्रभावकारी होता है ना ही उस मूल नियम (रेशियो डेसिडेन्डी) के रूप में जिसे आधार बनाकर फैसला सुनाया गया है और जो नजीर होने के कारण आगे के लिए बाध्यकारी है.

प्राइवेसी और इसका स्वरूप क्या है

प्राइवेसी का अधिकार मामले में कोर्ट के सामने सवाल यह था कि प्राइवेसी और इसका स्वरूप क्या है. वकील अफीफ का कहना है कि इस सवाल के मद्देनजर ‘कोर्ट ने अधिकार के भीतर उसकी मुख्य वस्तु की परिभाषा की और ऐसा करने के क्रम में ही सेक्सुअल ओरिएन्टेशन को राइट टू प्राइवेसी का अनिवार्य हिस्सा माना. इसलिए, मुझे लगता है कि प्राइवेसी के दायरे में सेक्सुअल-ओरिएन्टेशन को शामिल करना वैधानिक रूप से नजीर का काम करेगा.’

बहरहाल, सुरेश कौशल बनाम नाज फाउंडेशन(2013) मामले में दिए गए फैसले में इसे (प्राइवेसी) गलत करार देना दरअसल एक मौलिक अधिकार के रूप में प्राइवेसी के निर्धारण में अनिवार्य नहीं है. अफीफ का कहना है, ‘बहुत संभावना है कि इसे ऑबिटर डिक्टम मान लिया जाए और सुप्रीम कोर्ट में दायर राहत संबंधी याचिका पर इसका सकारात्मक असर हो.

बहरहाल अफीफ अपनी बात को स्पष्ट करते हुए यह भी कहते हैं कि ‘मैं भले सेक्सुअल ओरिएन्टेशन को राइट टू प्राइवेसी के दायरे में शामिल कर उसे वैधानिक रूप से अमल में मान लूं लेकिन राहत के लिए लगाई हुई अर्जी की सुनवाई करने वाली पीठ इसका पाठ अलग तरीके से भी कर सकती है. इसलिए फैसला आने से पहले कोई भी बात ठीक-ठीक नहीं कही जा सकती.’ बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि व्याख्या कैसे की जाती है. गुजरे वक्त में ऐसा बहुत बार देखने में आया है जब जजों ने वैधानिक रूप से अमल में जान पड़ने वाली किसी स्थिति के संबंध में एक राह निकाल ली और एकदम अलग तर्क से सोचते हुए फैसला सुनाया.

अतीफ का कहना है कि ‘प्राइवेसी का अधिकार होने से अब एक नई जमीन तैयार हुई है जिसपर खड़े होकर चुनौती के स्वर में कहा जा सकता है कि धारा 377 प्राइवेसी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है. अब एक मजबूत मामला बनता है. इसके बाद भी अगर कोर्ट धारा 377 को अमान्य नहीं ठहराता तो उसे बहुत ज्यादा आलोचना का सामना करना पड़ेगा.

अब यह देखने वाली बात होगी कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ राइट टू प्राइवेसी की रोशनी में राहत की याचिका पर क्या नजरिया अपनाती है.

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