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नोटबंदीः आरबीआई पर अपनी साख और प्रतिष्ठा बचाने की जिम्मेदारी

सरकार के फैसले पर आरबीआई ने चूं तक न की

Akshaya Mishra Updated On: Jan 11, 2017 11:45 PM IST

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नोटबंदीः आरबीआई पर अपनी साख और प्रतिष्ठा बचाने की जिम्मेदारी

नोटबंदी से रिजर्व बैंक (आरबीआई) की इमेज को धक्का पहुंचा है. देश की करेंसी के मैनेजर के तौर पर केंद्रीय बैंक से उम्मीद थी कि वह सरकार को बेहतर सलाह देगा.

रिजर्व बैंक से उम्मीद थी कि वह जरूरत पड़ने पर नोटबंदी के खिलाफ आवाज उठाएगा.

सरकार के फैसले पर आरबीआई ने चूं तक न की    

अब तक के तथ्य बता रहे हैं कि आरबीआई सरकार को यह चेतावनी देने में नाकाम रहा कि बिना तैयारी के नोटबंदी का फैसला लेने से आम लोगों को कितनी परेशानी होने जा रही है. आरबीआई सरकार के साथ खड़ा रहा और किसी भी बिंदु पर इसने सरकार का विरोध नहीं किया.

इस पूरी प्रक्रिया में आरबीआई ने न तो सरकार के साथ इंसाफ किया और न ही एक संस्थान के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा को बचा पाया.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी का फैसला सरकार का था न कि आरबीआई का.

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नोटबंदी के दौरान बैंकों और एटीएम की लाइन में घंटों तक खड़े रहने को मजबूर रहे लोग

7 नवंबर को सरकार ने नोटबंदी का सुझाव दिया और अगले ही दिन आरबीआई के बोर्ड ने विचार-विमर्श के बाद इसकी इजाजत दे दी.

8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का बड़ा एलान कर दिया. देश की करेंसी का 86 फीसदी हिस्सा एक झटके में कूड़ा हो गया.

बोर्ड मीटिंग में क्या चर्चा हुई, इसका खुलासा हो

आरबीआई ने बोर्ड की मीटिंग की जानकारी सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है. ऐसे में बोर्ड की मीटिंग में किस विषय पर क्या चर्चा हुई, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन, बाद के घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि सरकार ने बिना किसी उचित सलाह या जमीनी हालात पर फीडबैक लिए बिना ही इतना बड़ा फैसला ले लिया.

हैरान करने वाली बात यह है कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में कहा था कि नोटबंदी का फैसला आरबीआई बोर्ड ने लिया था. लेकिन, बीजेपी के बयान इस बारे में हर संदेह को दूर करते हैं कि यह फैसला राजनीतिक हलके का था.

आरबीआई की स्वायत्ता पर खतरा

इस पूरे घटनाक्रम से आरबीआई की स्वायत्तता और एक संस्थान के तौर पर उसकी साख पर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि रिजर्व बैंक की पेश की जाने वाली मौद्रिक नीति पर प्रभाव डालने की सरकारी कोशिशों से कोई अनजान नहीं है. लेकिन सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि अब रिजर्व बैंक ने इनका विरोध करना बंद कर दिया है.

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अपनी जिम्मेदारी निभा नहीं पाया आरबीआई?

यह बात कल्पना के परे है कि देश की मुद्रा का प्रबंधन करने वाला संस्थान नोटबंदी के विनाशकारी नतीजों से अनजान रहा हो.

आरबीआई सरकार को चेतावनी दे सकता था कि यह फैसला ग्रोथ और आर्थिक गतिविधियों पर बुरा असर डाल सकता है. साथ ही लोगों को असहनीय तकलीफों के दौर से गुजरना पड़ सकता है.

इसके उलट आरबीआई कैश निकासी और जमा के नियमों में बदलाव करने तक सीमित रह गया. संकट के विकराल होने के साथ हर दिन आरबीआई नए-नए नियम बनाता रहा.

केंद्रीय बैंक के लिए सबसे अहम है साख बचाना

सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई वी रेड्डी ने कहा कि केंद्रीय बैंक की भूमिका खतरे में है. इसे एक राष्ट्रीय समस्या के तौर पर हल करने की जरूरत है.

उन्होंने कहा ‘आरबीआई की संस्थागत पहचान को नुकसान पहुंचा है. हाल के वक्त में हुए घटनाक्रमों से मैं यह बात कह सकता हूं कि मैंने अर्थशास्त्रियों, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स की टिप्पणियां देखी हैं. ये परेशान करने वाली हैं. आरबीआई के लिए, एक केंद्रीय बैंक के लिए, प्रतिष्ठा का जोखिम सबसे बड़ा जोखिम होता है. साख पर खतरा सबसे बड़ा जोखिम है. अंतरराष्ट्रीय मत में इस वक्त ऐसा ही हो रहा है. मुझे लगता है कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है’.

नोटबंदी के एक हफ्ते बाद, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के डायरेक्टर कायरन करी ने कहा था ‘इससे आरबीआई की योग्यता और स्वतंत्रता पर सवाल उठा है’.

देश के पूर्व प्रधानमंत्री और आरबीआई के पूर्व गवर्नर मनमोहन सिंह ने सवाल उठाया था कि ‘क्या आरबीआई को नोटबंदी पर फैसला लेने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था?’

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मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सवाल उठाए थे (फोटो: गेटी इमेज)

परोक्ष रूप से उनका सवाल यह था कि क्या आरबीआई को सरकार के फैसले का साथ देने के लिए मजबूर किया गया. अगर हकीकत में ऐसा हुआ है तो आरबीआई की साख और प्रतिष्ठा खतरे में है.

संस्थानों के साथ सरकार की लापरवाही ठीक नहीं

सरकार को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए. सरकार संस्थानों के साथ डील करने में फिक्रमंद नहीं रही है. ये संस्थान अब तक किसी भी राजनीतिक प्रभाव और विवादों से अछूते रहे हैं.

इन संस्थानों में आर्मी और न्यायपालिका शामिल हैं. अगर आरबीआई स्वतंत्र होने की अपनी प्रतिष्ठा खो देता है तो पूरी दुनिया में इसकी कमाई गई साख पर धब्बा लगेगा.

सरकार और बैंक को एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है. ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होना चाहिए कि दोनों हर बात पर एक-दूसरे से सहमत हों.

फिलहाल, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि नोटबंदी के विवाद से आरबीआई की साख और प्रतिष्ठा को कोई चोट नहीं पहुंचेगी.

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