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नीरज सिंह मर्डर: असल जिंदगी में कब खत्म होगी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी

कब खत्म होगी धनबाद के गैंग्स ऑफ वासेपुर की रियल लाइफ कहानी

Ravi Prakash Updated On: Mar 25, 2017 07:50 PM IST

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नीरज सिंह मर्डर: असल जिंदगी में कब खत्म होगी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी

कहानी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी है, जगह भी वही है, झारखंड का धनबाद. पर फिल्म से अलग 30 हत्याओं के बावजूद कोई भी ‘कट’ या ‘द एंड’ नहीं कह पा रहा. क्योंकि यह जिन्दगी है फिल्म नहीं.

लगभग तीस साल से चली आ रही इस फिल्म के ताजा सीन में फिर चार लोग मारे गए. इस बार मरने वाले थे नीरज सिंह, उनके ड्राइवर, बॉडीगार्ड और पीए.

21 मार्च दिन भर चिपचिप 35 डिग्री की गर्मी के बाद लोग निकल ही रहे थे कि शाम करीब 7.30 खबर फैली कि धनबाद के दो पावरफुल व परस्पर प्रतिद्वंद्वी घरानों में से एक ‘रघुकुल’ के वारिस नीरज सिंह को स्टील गेट के पास एके-47 से भून दिया गया है. उनके ड्राइवर, बाडीगार्ड और पीए को भी गोलियां लगी हैं. सबको सेंट्रल अस्पताल ले जाया गया है.

इसके बाद अस्पताल के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गयी. दुकानों के शटर गिर गए.

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नीरज सिंह की गाड़ी

झारखंड के पूर्व मंत्री और नीरज के चाचा बच्चा सिंह अस्पताल पहुंचे. इसके बाद करीब 8.30 बजे अस्पताल प्रबंधन ने नीरज सिंह और उनके तीनों लोगों की मौत हो जाने की बात सार्वजनिक की.

कहा गया कि चारों लोग मौके पर ही मर चुके थे. गुस्साई भीड़ ने सिटी एसपी अंशुमान के साथ भी वहां धक्का-मुक्की की यहां तक भी एसएसपी पिछले दरवाजे से अस्पताल में घुसे.

तब से अब तक झारखंड सकते में हैं और कोई भी और कत्लों के होने की आशंका से मुक्त नहीं है.

मरने वाले नीरज सिंह थे कौन

नीरज सिंह धनबाद के डिप्टी मेयर रह चुके थे. 2014 के विधानसभा चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उन्होंने अपने चचेरे भाई और ‘सिंह-मेंशन’ के वारिस संजीव सिंह को झरिया सीट पर कड़ी टक्कर दी थी.

संजीव सिंह उस चुनाव में भाजपा के टिकट पर विजयी हुए. इससे पहले 2009 के चुनाव में उन्होंने धनबाद सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और तीसरे नंबर पर रहे.

झरिया ‘सिंह-मेंशन’ की घरेलू सीट मानी जाती है. 1977 से लेकर 2014 तक के विधानसभा चुनावों में सिर्फ एक मौके को छोड़ दें, तो यह सीट ‘सिंह-मेंशन’ के कब्जे में ही रही है.

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सिंह मेंशन

1977 में सूरजदेव सिंह यहां से पहली बार चुनाव जीते. उनकी मौत के बाद उनके भाई बच्चा सिंह, फिर पत्नी कुंती सिंह और अब उनके बेटे संजीव सिंह यहां के विधायक हैं.

इस बीच 1995 में एक बार यह सीट ‘सिंह-मेंशन’ के हाथ से खिसक गयी. तब लालू यादव की पार्टी राजद के टिकट पर आबो देवी ने यहां जीत हासिल की थी.

चचेरे भाई पर हत्या का आरोप

किसी जमाने के मशहूर सूरजदेव सिंह के भतीजे नीरज सिंह की हत्या के मामले में उनके चचेरे भाई और झरिया के भाजपा विधायक संजीव सिंह को नामजद किया गया है.

उनके चार अन्य सहयोगियों के खिलाफ भी हत्या की रिपोर्ट दर्ज करायी गयी है. इस बीच मुख्यमंत्री रघुवर दास के निर्देश पर डीजीपी ने सीआइडी के एडीजी अजय कुमार सिंह के नेतृत्व में एसआईटी गठित की है.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की इस टीम ने घटना के वक्त नीरज सिंह की कार में मौजूद पांचवें शख्स आदित्य सिंह को पकड़ रखा है.

वह उस रात हुई अंधाधुंध फायरिंग में रहस्यमय तरीके से बच गया था और घटना के बाद से फरार था.

एडीजी अजय कुमार सिंह ने मीडिया से कहा कि उन्हें आदित्य से कुछ सुराग मिलने की उम्मीद है.

पुलिस ने इस मामले में शामिल बताए जा रहे भाजपा विधायक संजीव सिंह से अभी पूछताछ नहीं की है.

'हम जांच को तैयार'

इधर, संजीव सिंह ने 23 मार्च को एक प्रेस कांफ्रेंस कर इस घटना में अपनी संलिप्तता से इनकार किया है.

उन्होंने कहा कि वे भी इस हत्या से उतने ही हतप्रभ हैं, जितना कि कोई आम धनबादवासी. बकौल संजीव सिंह- मैं किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हूं और मामले की जांच पूरी होने तक धनबाद छोड़कर नहीं जाउंगा.

पूर्व प्रधानमंत्री से रिश्ते

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से सूरजदेव सिंह के काफी नजदीकी रिश्ते थे. नवंबर 1990 में चंद्रशेखर बतौर प्रधानमंत्री सूरजदेव सिंह से मिलने धनबाद आए और ‘सिंह-मेंशन’ में समय गुजारा. तब सूरजदेव सिंह अपने तीन भाइयों राजन सिंह, बच्चा सिंह और रामाधार सिंह के साथ ‘सिंह-मेंशन’ में रहते थे.

1991 में सूरजदेव सिंह के देहांत के कुछ दिन बाद तक चारों परिवार ‘सिंह-मेंशन’ में ही रहे. नीरज सिंह का जन्म इसी घर में हुआ था.

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पत्नी के साथ नीरज सिंह

ये गैंगवार शुरू कैसे हुआ

दरअसल धनबाद में गैंगवार की शुरुआत 70 के दशक में हुई. तब कोयला व्यवसाय पर बीपी सिन्हा का कब्जा था.

उन्होंने ही अपने लठैत के तौर पर सूरजदेव सिंह को बलिया से यहां बुलाया था. 1970-71 में सूरजदेव सिंह अपने बाहुबल और भाइयों की ताकत की बदौलत बीपी सिन्हा से अलग हो गए.

इसके बाद 1978 में बीपी सिन्हा की हत्या कर दी गयी. इसका इल्जाम सूरजदेव सिंह लगा. बाद में वे अदालत से बरी हो गए. इस दौरान कई लोगों की हत्या हुई.

‘सिंह-मेंशन’ वर्सेस ‘रघुकुल’

1991 में सूरजदेव सिंह के देहांत तक यह परिवार एकजुट रहा. उनकी मौत के बाद परिवार बिखरा और सूरजदेव सिंह के भाई भतीजों के बीच आपसी लड़ाई शुरू हो गई.

दरअसल, यह लड़ाई कोयले के व्यवसाय पर वर्चस्व की है जिसमें साल दर साल हत्याएं होती रही.

टूट गई कड़ी

सूरजदेव सिंह की मौत के बाद परिवार को एक डोर में बांधकर रखनी वाली कड़ी टूट गई.

उनके एक भाई विक्रमा सिंह शुरू से ही बलिया (उत्तर प्रदेश) स्थित अपने पैतृक घर में रहते हैं.

इधर, सूरजदेव सिंह के बेटे संजीव सिंह ने ‘सिंह-मेंशन’ की गद्दी संभाल ली. उन्हें चाचा रामाधीर सिंह का साथ मिला.

उधर, बच्चा सिंह और राजन सिंह (नीरज सिंह के पिता) अलग हो गए. एक दूसरा घर बना. नाम रखा गया- ‘रघुकुल’.

कुछ साल पहले राजन सिंह के देहांत के बाद ‘रघुकुल’ की कमान उनके बेटे नीरज सिंह के हाथ में आ गयी.

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रघुकुल के बाहर नीरंज सिंह की शवयात्रा

बाद में बच्चा सिंह रघुकुल के पास ही एक दूसरे घर में रहने लगे लेकिन निःसंतान बच्चा सिंह ने अपनी राजनीतिक विरासत नीरज सिंह को ही सौंपी. तब से दोनों परिवारों के बीच वर्चस्व की लड़ाई सुर्खियां बनती रही हैं.

इस बीच आई ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’

धनबाद के कोल माफियाओं पर अनुराग कश्यप ने 2012 में गैंग्स ऑफ वासेपुर बनाई थी. बाद में इसका दूसरा पार्ट भी रिलीज किया गया. इसमें धनबाद में गैंगवार की कहानी थी. कुछ हिस्सों में सिंह मेंशन की भी कहानी फीचर की गई थी. बताते हैं कि इस फिल्म की एक सीन पर सफाई देने के लिए अनुराग को ‘सिंह-मेंशन’ तलब किया गया था.

अनुराग कश्यप अपनी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर का भाग तीन ले कर आ रहे हैं. लेकिन असलियत में धनबाद में तो लगता है कि इस फिल्म का पहला भाग ही अभी खत्म नहीं हुआ.

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