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राजस्थान: सिर मुंडवाकर किए जा रहे सिपाही ‘विद्रोह’ की क्या है सच्चाई?

महानिदेशक की कोशिशों के बावजूद सिपाही इतनी जल्दी अपने आंदोलन से पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं

Mahendra Saini Updated On: Oct 21, 2017 09:56 AM IST

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राजस्थान: सिर मुंडवाकर किए जा रहे सिपाही ‘विद्रोह’ की क्या है सच्चाई?

1857 के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को इतिहास की किताबों में सिपाही विद्रोह की संज्ञा दी जाती है. कहते हैं कि क्रांति के पीछे सिपाहियों की नाराजगी भी बड़ी वजह थी. इस क्रांति को कठोरतम तरीकों से जरूर कुचल दिया गया. लेकिन अंग्रेज सरकार इस आग को बुझा नहीं सकी. यही कारण है कि 90 साल के अंदर 1947 में ग्रेट ब्रिटेन का वो सूरज अस्त हो गया जिसके लिए दूसरी ही कहावतें कही जाती थी.

इस सिपाही विद्रोह के 160 साल बाद अब राजस्थान में सिपाही एक बार फिर ‘बागी’ बने हुए हैं. विरोध का झंडा बुलंद हो चुका है और ये आग अब थाने दर थाने फैलती ही जा रही है. हम बागी जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कई इलाकों में सिपाहियों ने काम करना छोड़ दिया यानी सामूहिक छुट्टी ले ली है, तो कई जगह सरकारी मैस का बहिष्कार कर दिया. कहीं सिर मुंडा लिए तो कहीं काली पट्टी बांधकर नाराजगी जताई जा रही है. महकमे के बड़े अधिकारियों और सरकार की सख्ती के बावजूद विरोध कम होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है.

बताया जा रहा है कि जोधपुर में नाराज सिपाहियों ने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को सलामी देने तक से इंकार कर दिया. इज्जत बचाने के लिए उच्चाधिकारियों ने आननफानन में दूसरी टीम को भेजकर गार्ड ऑफ ऑनर की व्यवस्था की. दरअसल, अपने ही अधिकारियों की उपेक्षा से सिपाही भारी गुस्से में हैं और अब उन्होंने राजनीतिक समर्थन के लिए कांग्रेस से भी संपर्क साधा है.

विरोध के तरीके अनेक

सिपाहियों का विरोध काफी दिनों से चल रहा है. हाल के दिनों में इसमें तेजी आई है. कुछ दिन पहले सिपाहियों ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताना शुरु किया. अपेक्षित नतीजे निकलते न देखकर सिपाहियों ने सरकारी मैस का बहिष्कार करना शुरू कर दिया. इसके बाद सामूहिक छुट्टियों के आवेदन भेजे जाने शुरू हुए. ‘ऊपरी आदेशों’ के कारण छुट्टियां मंजूर नहीं की गई तो विरोध के दूसरे तरीके भी अपनाए गए.

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15 अक्टूबर को जयपुर जिले की रायसर चौकी इंचार्ज और 5 कांस्टेबलों ने सिर मुंडाकर अपना विरोध जताया. सर मुंडाकर विरोध करने के इस तरीके ने फौरन असर भी किया. अब तक ध्यान नहीं दे रहे महकमे के उच्चाधिकारी हरकत में आए. लेकिन बदकिस्मती से ये असर नकारात्मक ही था. जैसे ही सर मुंडाने वाले जवानों की तस्वीरें मीडिया में हाइलाइट हुई कि इन सबको लाइन हाजिर कर दिया गया.

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क्या सख्ती से रुकेगी 'बगावत' ?

1857 में ब्रिटिश सरकार ने सिपाहियों के खिलाफ सख्ती बरती थी. अब राजस्थान में भी सिपाहियों के खिलाफ लाइन हाजिर करने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. लेकिन समझना होगा कि तब तानाशाही थी और अब लोकतंत्र है. लोकतांत्रिक विरोध को सख्ती का सहारा लेकर नहीं कुचला जा सकता.

रायसर चौकी के सिपाहियों पर कार्रवाई की खबर फैलते ही सर मुंडाने वाले जवानों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. लगभग आधा दर्जन जिलों के किसी न किसी थाने में जवानों ने सर मुंडाकर एक तरह से उच्चाधिकारियों और सरकार को चुनौती दे डाली है. जयपुर शहर में ही सिविल लाइंस मेट्रो स्टेशन के 10 और पुलिस लाइन के दर्जनों जवानों ने मुंडन करा लिया. बात यहीं नहीं रूकी, जवानों ने पुलिसलाइन के सामने प्रदर्शन भी किया. बाद में प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर पहुंचकर विपक्ष से अपने लिए समर्थन भी मांगा. हालात संभलते न देखकर उच्चाधिकारियों ने घंटों तक जवानों को समझाने की कोशिशें की.

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भरतपुर के पहाड़ी थाने में भी 23 पुलिसकर्मियों ने सिर मुंडाकर प्रदर्शन किया. वहीं, पाली में जवान थाने में ही धरने पर बैठ गए. सीकर में एक कांस्टेबल हवा सिंह, शोले के धर्मेंद्र की तरह पानी की टंकी पर चढ़ गया. 2 घंटे की समझाइश के बाद वो नीचे उतरा. श्रीगंगानगर में भी दर्जनों जवानों ने काम का बहिष्कार कर दिखा दिया कि उनकी मांग को जोर-जबरदस्ती से नहीं दबाया जा सकेगा.

जोधपुर में तो हालात और खराब हैं. करीब हफ्ते भर तक जवानों ने सरकारी मैस का बहिष्कार किया और ऐन दिवाली के पहले सामूहिक अवकाश पर जाने का ऐलान कर दिया. शहर में ट्रैफिक की व्यवस्था चरमरा गई तो मान-मनौव्वल का दौर शुरू हुआ.

महानिदेशक उतरे मैदान में

सिपाहियों के बढ़ते विरोध से हालात ये हो गए कि धनतेरस से एक दिन पहले खुद पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह को एक संदेश पत्र जारी करना पड़ा. पत्र में लिखा था कि सभी पुलिस थानों में रोल कॉल के दौरान सिपाहियों को ये पत्र पढ़कर सुनाया जाए और उनको समझाने की कोशिश की जाए ताकि वे सामूहिक अवकाश पर न जाएं. पत्र में लिखा था कि सिपाहियों की मांगों को लेकर सरकार से बातचीत हो रही है. इस दौरान सिपाही सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें.

डीजीपी अजीत सिंह ने बताया कि सोशल मीडिया का सहारा लेकर कुछ लोग माहौल खराब करने में लगे हैं. सिंह ने कहा है कि सरकार के सामने पुलिस विभाग ने पूरी गंभीरता के साथ अपना पक्ष रखा है. इसलिए जवानों को भी ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे विभाग की गरिमा को ठेस पहुंचे.

महानिदेशक की कोशिशों के बावजूद सिपाही इतनी जल्दी अपने आंदोलन से पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं. सिपाहियों का कहना है कि महकमे के अफसर ही स्वार्थी और जवानों के प्रति असंवेदनशील बने हुए हैं. एक सिपाही ने बताया कि महानिदेशक के इस पत्र के पीछे का स्वार्थ ये है कि अगर सिपाही छुट्टी पर चले जाते तो दीपावली पर सुरक्षा व्यवस्था कौन संभालता.

क्यों परेशान है पुलिस ?

बड़ा सवाल ये है कि पुलिस के सिपाही आखिर परेशान क्यों हैं. दरअसल, इनकी नाराजगी की वजह है वित्त विभाग का एक कथित आदेश. इस आदेश से वे पुलिसकर्मी प्रभावित होंगे जो 2006 या उसके बाद भर्ती हुए हैं. सोशल मीडिया पर चल रही खबरों के मुताबिक, 2400-2600 ग्रेड पे वाले इन पुलिसकर्मियों की तनख्वाह में कटौती का प्रस्ताव कैबिनेट कमेटी ने मंजूर कर लिया है. इसे ऐसे समझें कि अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो 2006 के बाद के हर पुलिसकर्मी की तनख्वाह से हर महीने करीब 3-4 हजार रुपए तक कम हो सकते हैं.

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बताया जा रहा है कि कथित वेतन कटौती और मैस अलाउंस समेत दूसरी कई मांगों से प्रभावित होने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या करीब 40 हजार है. प्रभावित होने वाले 6 हजार पुलिसकर्मी तो जयपुर कमिश्नरेट में ही तैनात हैं. इनमें से बहुत से सिपाही आदेश के खिलाफ मुखर विरोध कर रहे हैं. कई अभी शांत हैं और सरकार के आगामी कदमों का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन एक बात तय है कि विरोध को दबाने का अलोकतांत्रिक कदम उठाया गया तो इन लोगों को भी ज्यादा दिन तक शांत रख पाना मुश्किल हो जाएगा.

शायद यही वजह है कि खुद राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया को भी आगे आना पड़ा है. कटारिया ने कहा है कि पुलिस तो क्या सरकार ने किसी भी कर्मचारी के वेतन में कटौती का कोई आदेश नहीं निकाला है. कटारिया ने कहा कि वेतन कटौती को मंजूरी दिए जाने की खबर सिर्फ सोशल मीडया की देन है. उन्होंने जोर देकर कहा कि वेतन विसंगति से जुड़ा प्रकरण कैबिनेट कमेटी के पास विचाराधीन जरूर है. लेकिन अभी उस पर किसी भी तरह का फैसला नहीं किया गया है.

वेतन कटौती और सिपाहियों के विरोध के तरीके पर मत विभेद हो सकता है. लेकिन ये बात भी समझनी होगी कि एक पुलिसकर्मी कितने विपरीत हालात में अपनी ड्यूटी करता है. हम सबके पास किसी पुलिसवाले की हजार शिकायतें हो सकती हैं. लेकिन एक कांस्टेबल का दर्द उसी के शब्दों में यूं बयान किया जा सकता है कि बिना वीकली ऑफ 24 घंटे ड्यूटी देने के बावजूद उनकी तनख्वाह, 2 साप्ताहिक अवकाशों के साथ सिर्फ 8 घंटे ड्यूटी देने वाले किसी चपरासी से ऊपर नहीं है.

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