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पंजाब में भारतीय खाद्य निगम का 2011-16 तक 700 करोड़ रुपए का गेहूं खराब हुआ: कैग

रिपोर्ट के अनुसार खराब गेहूं की भंडार राशन की दुकानों के जरिए आपूर्ति नहीं की जा सकी

Bhasha Updated On: Aug 04, 2017 08:09 PM IST

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पंजाब में भारतीय खाद्य निगम का 2011-16 तक 700 करोड़ रुपए का गेहूं खराब हुआ: कैग

देश के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने पाया है कि पंजाब में 31 मार्च 2016 तक 700 करोड़ रुपए मूल्य का एफसीआई का गेहूं खराब हुआ. इसका कारण स्टोरेज की सुविधा की कमी के कारण अनाज को खुले में रखा जाना था.

कैग की संसद में शुक्रवार पेश ताजा रिपोर्ट के अनुसार खराब गेहूं का भंडार राशन की दुकानों के जरिए आपूर्ति नहीं की जा सकी.

कैग ने 2011-16 के दौरान स्टोरेज केपेसिटी सृजित करने के लिए पीईजी (प्राइवेट एंटरप्रेन्योर गारंटी) योजना के क्रियान्वयन और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अपने कर्ज, श्रम और प्रोत्साहन भुगतान के प्रबंधन के तरीकों का ऑडिट किया है. कैग ने यह पाया कि एफसीआई ने 2013-14 में थोक ग्राहकों को कम भाव पर गेहूं बेचने से 38.89 करोड़ रुपए की वसूली नहीं हो पाई.

इसके अलावा, अधिशेष कार्यबल को युक्तिसंगत नहीं किए जाने और अपने गोदामों में महंगे श्रम की नियुक्ति से एफसीआई को 237.65 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय करना पड़ा.

कैग के अनुसार इतना ही नहीं एफसीआई ने अधिक दर और वास्तिवक दूरी के बजाए लंबी दूरी तक अनाज परिवहन के बिल का भुगतान कर परिवहन ठेकेदारों को क्रमश: 14.73 लाख रुपए और 37.89 लाख रुपए का अधिक भुगतान किया.

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पीईजी योजना के बारे में ऑडिटर ने कहा कि शुरूआती साल में इसका क्रियान्वयन नगण्य था और सात साल बाद भी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं हो पाया. योजना का क्रियान्वयन विभिन्न खामियों के कारण प्रभावित हुआ.

पंजाब में 53.56 लाख टन गेहूं चबूतरा बनाकर खुले में ढककर (कवर्ड और प्लिंथ-सीएपी) और मंडी में रखे गए थे. रिपोर्ट के अनुसार इसमें से 700.30 करोड़ रुपए मूल्य के 4.72 लाख टन गेहूं खराब हो गया. इस गेहूं को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए नहीं बेचे जाने योग्य घोषित किया (मार्च 2016) गया. इसका कारण इसे खुले में रखा जाना था.

कैग के अनुसार पीईजी योजना के क्रियान्वयन में देरी से बड़ी मात्रा में गेहूं खुले में रखे गए और इस प्रकार का भंडार 2011-12 में 103.36 लाख टन से बढ़कर 2012-13 में 132.68 लाख करोड़ रुपए हो गया.

इसके अलावा कैग ने पाया कि गोदामों के निर्माण का ठेका बहुत कम ठेकेदारों को दिया गया. इसके कारण 2012-13 से 2015-16 के बीच किराये के रूप में 21.04 करोड़ रुपए का अनुचित लाभ निजी इकाइयों को दिए गए.

एफसीआई में श्रमिकों के बारे में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने कहा कि एफसीआई गोदामों में श्रम प्रबंधन गतिविधियों में कमी पाई गई जिसका कारण खराब प्रसाशनिक नियंत्रण है. नियमों का उल्लंघन कर काम न करने वाले को वेतन दिया गया और अस्वीकार्य प्रोत्साहन भुगतान दिया गया.

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रिपोर्ट के अनुसार, ‘एफसीआई गोदामों में दूसरे से काम कराने की समस्या प्राक्सी लेबर से निपटने में विफल रहा.’ कैग ने निगम से अपने नाम पर दूसरे से काम कराने की समस्या को खत्म करने के लिए कार्रवाई करने का सुझाव दिया है.

एफसीआई पर कर्ज के बारे में कैग ने पाया कि खाद्य मंत्रालय द्वारा सब्सिडी जारी करने में देरी या अपर्याप्त सब्सिडी इसका कारण है. इसके कारण एफसीआई को बाह्य स्रोतों से कर्ज लेना पड़ा जिससे उस पर ब्याज बोझ बढ़ा.

एफसीआई का ब्याज बोझ 2011-16 के दौरान 35,701.81 करोड़ रुपए रहा. रिपोर्ट के मुताबिक एफसीआई का व्यय 2011-12 में 1,05,355 करोड़ रुपए था, जो 2015-16 में बढ़कर 1,42,487 करोड़ रुपए पहुंच गया. वहीं खाद्य सब्सिडी इसी अवधि में 67,694 करोड़ रुपए से बढ़कर 1,03,283 करोड़ रुपए पहुंच गई.

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