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प्रियंका के पांव और मोर के आंसू पर बतिया लिए हों तो मूल सवाल पर आएं

यहां कुछ लोग मोर के आंसू रो रहे हैं तो कुछ प्रियंका के गैर-संस्कारी व्यवहार की निंदा कर रहे हैं

Rajendra P Misra Rajendra P Misra | Published On: Jun 03, 2017 04:02 PM IST | Updated On: Jun 03, 2017 04:02 PM IST

प्रियंका के पांव और मोर के आंसू पर बतिया लिए हों तो मूल सवाल पर आएं

कुछ दिनों से राष्ट्रीय विमर्श में दो विषय प्रमुखता से छाए हुए हैं. मोर के आंसू और बॉलीवुड-हालीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की खुली टांगे राष्ट्रीय मुद्दा बन गई हैं. राष्ट्रीय मीडिया में इस पर बहस हो रही है.

सोशल मीडिया में हर कोई इस विषय पर अपनी राय रख रहा है. कुछ लोग मोर के आंसू रो रहे हैं तो कुछ प्रियंका के गैर-संस्कारी व्यवहार की निंदा कर रहे हैं. हर किसी के पास इस बारे में कुछ-न-कुछ कहने के लिए है.

जस्टिस शर्मा का दिव्य ज्ञान

राजस्थान हाईकोर्ट के जज महेश शर्मा ने अपने रिटायरमेंट के दिन गौवंश के संरक्षण पर फैसला सुनाया और गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सरकार से सिफारिश की. अपने फैसले के पीछे उन्होंने जो आधार बताए उस पर सवाल उठने ही थे. बकौल शर्मा, उन्होंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज और भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए सुनाया. यानी, देश का संविधान और कानून जस्टिस शर्मा के फैसले के मुख्य आधार नहीं थे.

खैर, जस्टिस शर्मा इतने पर ही नहीं रुके. अपने फैसले के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाए जाने के पीछे जो तर्क दिए, उससे बवाल और बढ़ गया. उन्होंने कहा कि मोर आजीवन ब्रह्मचारी रहता है. मोरनी उसके आंसू पीकर गर्भवती होती है. इसीलिए उसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया है.

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मजाक के पात्र बने जस्टिस शर्मा

जस्टिस शर्मा के इस दिव्य ज्ञान ने उन्हें सोशल मीडिया पर मजाक का कारण बना दिया. आंसू पीने से जुड़े जितने मुहावरे थे, उनके अर्थ बदल गए. किसी ने फेसबुक पर लिखा कि ‘मोरनी ने मोर से कहा, कभी आंसू बहाने मेरे यहां आना’, तो किसी ने लिखा कि ‘अब पुरुषों को आंसू बहाने के लिए कोई महिला कंधा नहीं देगी, इसमें बड़े खतरे हैं.’ जाहिर है कि अपनी करतूतों से जस्टिस शर्मा हंसी के पात्र तो बने ही साथ ही भारतीय न्यायपालिका की भी खूब खिल्ली उड़वाई.

पैर दिखने से भारतीय संस्कृति को खतरा

पैर के शो-ऑफ का मामला अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा से जुड़ा है. बर्लिन में अपनी हॉलीवुड फिल्म का प्रमोशन करने पहुंची प्रियंका ने जर्मनी दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.

उन्होंने घुटनों तक की ड्रेस पहनी थी और पीएम मोदी के सामने कुर्सी पर पैर क्रॉस करके बैंठी. यही बात सोशल मीडिया के संस्कारी टोली को खल गई. वे कदर आहत हुए कि सोशल मीडिया पर प्रियंका को इतना भला बुरा सुनाया जिसकी उन्हें कभी उम्मीद नहीं रही होगी.

खैर, प्रियंका आत्मविश्वास से भरी एक अभिनेत्री हैं. उन्होंने अपनी मां के साथ अपनी एक तस्वीर पोस्ट कर संस्कारी टोली को करारा जवाब दिया. इस तस्वीर में प्रियंका और उनकी मां घुटनों तक की ड्रेस पहनी हुई हैं.

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प्रियंका की अंतरराष्ट्रीय पहचान

जस्टिस शर्मा के गाय वाले फैसले के पीछे चर्चा पाने की चाहत हो सकती है. उनके ब्रह्मचारी मोर वाले दिव्य ज्ञान को बकवास समझ कर खारिज किया जा सकता है. प्रियंका चोपड़ा को जस्टिस शर्मा की तरह किसी पब्लिसिटी की दरकार नहीं है. वे पहले से ही बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री हैं और हॉलीवुड में वह मुकाम बना चुकी हैं जो अब तक किसी भारतीय एक्टर को हासिल नहीं हुआ है.

बहरहाल, दोनों घटनाओं ने कुछ सवालों को जन्म दिया है जिन पर चर्चा जरूरी है. दोनों ही मामलों में भारतीय समाज और संस्कृति का हवाला दिया गया है. गाय का भारतीय संस्कृति में क्या स्थान है, इस पर पहले से ही काफी चर्चा हो रही है. हमारे समाज का महिलाओं के प्रति क्या नजरिया है, यह भी किसी से छिपा नहीं है.

समाज का नजरिया जिम्मेदार

पितृ-सत्तात्मक समाज में महिलाओं का स्थान हमेशा दोयम दर्जे का होता है. हम इसे अपने देश में सबसे बड़ी आबादी वाले हिंदू और मुसलमान दोनों समाजों में देख सकते हैं. यह आम सोच है कि महिलाएं घर की शोभा होती हैं घर की इज्जत को चारदीवारी में रहना चाहिए. पुरुष कमाएगा और महिलाएं घर और बच्चों को संभालेंगी.

हिंदी के प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था, 'भारतीय नारी आंदोलन के इतिहास में अर्थशास्त्र का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.' परसाई जी का मतलब साफ है कि महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की इजाजत मिलने की मुख्य वजह परिवार के आर्थिक हालात थे. केवल पति की कमाई से घर नहीं चल सकता, लिहाजा पत्नी को भी कमाना होगा.

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पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकती महिलाएं?

बहरहाल, पितृसत्तात्मक समाज ने भले ही कामकाजी महिलाओं को बाहर निकलने की इजाजत दे दी हो, लेकिन पुरुषों के बराबर हक नहीं दिया है.

महिलाएं वह सब कभी नहीं कर सकती जो एक पुरुष कर सकता है. पुरुष वर्ग को महिलाओं का ऊंचा मुकाम हासिल करना भी बर्दाश्त नहीं होता.

महिलाएं अपनी प्रतिभा और मेहनत से बड़े मुकाम हासिल कर भी लें तो भी समाज उन्हें उतनी इज्जत नहीं देता जितना उनकी ही हैसियत वाले पुरुष को देता है. इसके पीछे सोच बिल्कुल साफ है, कामकाजी महिलाओं के लिए ज्यादा जरूरी है संस्कारी होना.

प्रियंका के पीछे पड़ी संस्कारी टोली की भी यही सोच है 'आखिर इस तरह के छोटे कपड़ने पहन कर प्रियंका देश के प्रधानमंत्री के सामने कैसे जा सकती हैं!' ऊपर से उनके बैठने का तरीका भी ठीक नहीं था. यानी भले ही देश आजाद है और हमारा संविधान महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का हक देता है, समाज के लिए महिलाएं अब भी दोयम दर्जे की नागरिक हैं.

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पितृसत्तात्मक समाज का कसूर

संस्कारी टोली को प्रियंका चोपड़ा की उपलब्धि पर नाज नहीं है. उसने दुनिया में भारतीय कलाकारों का मान बढ़ाया, इसकी उन्हें परवाह नहीं. उन्हें परवाह सिर्फ इस बात की है कि प्रियंका 'उनकी तरह संस्कारी' नहीं हैं. उन्हें बड़ों के सामने पेश आने का सलीका नहीं मालूम है, जो भारतीय संस्कृति के हिसाब से अक्षम्य है. दरअसल, यह सोच एक बार फिर साबित करती है कि देश में पितृ-सत्तात्मक समाज की जड़ें अब भी बेहद मजबूत हैं और नारीवादी आंदोलन को अभी कई मुकाम हासिल करने होंगे.

सवाल यह भी है कि एक महिला के जीवन और उसके शरीर पर किसका अधिकार है? पुरुष का या खुद उसका अपना? क्या एक महिला भारतीय संविधान में मिले अधिकारों के मुताबिक अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी नहीं जी सकती? क्या उसे पुरुषों की सहमति अथवा इजाजत से ही अपने जीवन का सफर तय करना होगा? अगर वह पुरुषों की तरह जीने की कोशिश करती है तो क्या भारतीय संस्कृति का अनादर हो जाएगा?

दिव्य ज्ञान और भारतीय संस्कार

अगर भारतीय संस्कृति और संस्कार जस्टिस शर्मा के दिव्य ज्ञान से मजबूत होते हैं और प्रियंका चोपड़ा की खुली टांगों की वजह से कमजोर होते हैं, तो मानना चाहिए कि भारतीय समाज के सामने संकट बहुत बड़ा है. यह सोच और संस्कार देश को पीछे ही ले जाएंगे. इन्हें बदले बगैर समाज में लैंगिक समानता और आजादी की जड़ें गहरी नहीं हो सकती.

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