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वैवाहिक बलात्कार: कानून और कोर्ट की सरपरस्ती से रस्म बनता अपराध (पार्ट-1)

वैवाहिक बलात्कार के कई मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों ने दूरी बनाई है

Deya Bhattacharya Updated On: Apr 28, 2017 08:31 AM IST

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वैवाहिक बलात्कार: कानून और कोर्ट की सरपरस्ती से रस्म बनता अपराध (पार्ट-1)

संपादक की कलम से: किसी भी देश के नागरिक देश के सामने खड़ी चुनौतियों और अपने निजी मुद्दों को किस नजरिए से देखते हैं, इस पर देश की न्यायिक व्यवस्था का गहरा असर होता है. हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है. इस संविधान में कई बदलाव भी हो चुके हैं. कई नई बातें इन संशोधनों के जरिए संविधान में जुड़ चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश भी आज कानून के तौर पर मान्यता हासिल कर चुके हैं. इसके बावजूद हमारा कानून, समाज में आए बदलावों से कदमताल नहीं कर सका है. हमारी न्यायिक व्यवस्था अभी भी पुराने पड़ चुके कानूनों के बोझ तले दबी नजर आती है. इसीलिए फ़र्स्टपोस्ट, कई किस्तों की एक सीरीज शुरू कर रहा है. इसका नाम है, 'लेटर ऑफ द लॉ'. इस सीरीज के जरिए हम देश की न्यायिक परंपराओं और कानूनों पर चर्चा को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे. इस सीरीज के जरिए हम देश के कानूनों के तमाम पहलुओं की राय और समीक्षा के जरिए पड़ताल करेंगे...

'जब कोई कातिल किसी का कत्ल करता है, तो वो उसके शरीर को ही नुकसान पहुंचाता है. लेकिन एक बलात्कारी, बेबस महिला की अंतरात्मा पर चोट करता है, उसे खराब करता है. अगर कोई बलात्कार पीड़ित दिमागी तौर पर बीमार हो, तो उससे बलात्कार न सिर्फ शारीरिक हिंसा है, बल्कि उसके किरदार को भी चोट पहुंचाने वाली होती है. बलात्कार उसकी अंतरात्मा को भी तकलीफ देता है, उसे गंदा करता है. बलात्कारी उसकी बेबसी का बेजा फायदा उठाता है'.

(जस्टिस अरिजित पसायत, तुलसीदास कनोलकर बनाम गोवा सरकार 2003)

बलात्कार के मामलों में सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के दावों को खारिज करता रहा है. ये सिलसिला कई दशकों से चला आ रहा है. बलात्कार के कानूनों और अदालतों के फैसलों के साथ बड़ी दिक्कत ये है कि वो हमेशा भटके हुए दिखे हैं.

अदालतें, पिछले कई सालों से बलात्कार के बदलते रंग-रूप को लेकर बहस में शामिल रही हैं. इसमें पीड़ित का पक्ष इस तरह से समझा जाता रहा है कि वो समाज में एक बलात्कार पीड़ित बनकर ही न रह जाए.

अदालतें ये समझने की कोशिश भी करती रही हैं कि बलात्कार के जुर्म का समाज पर, लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है. लेकिन यहां दिक्कत इस बात की रही है कि अदालतों को समाज की ज्यादा फिक्र रही. वो बलात्कार पीड़ित महिला को हुए नुकसान को लेकर उतने फिक्रमंद नहीं रहीं.

यही वजह है कि बलात्कार के मामलों में अदालतों ने सोचा-समझा कुछ और, टिप्पणियां तो सख्त कीं मगर अक्सर बलात्कारी को सख्त सजा देने से परहेज किया. अदालतों की टिप्पणी और सजा में इस फासले की बड़ी वजह हमारे समाज की सोच है.

हमारा महिलाओं और उनके साथ होने वाले अपराधों को देखने का एक खास नजरिया है. अदालतें भी इसी चश्मे से देखती आई हैं. समाज में प्रचलित किस्सों पर यकीन करती आई हैं. यही वजह है कि बलात्कार के आरोपी पर जुर्म साबित करने के मामले में कानून ने अक्सर नाइंसाफी की है.

बलात्कार को लेकर हमारी न्यायिक व्यवस्था पूर्वाग्रह से ग्रस्त दिखती है. ये सिलसिला दशकों पुराना है. बलात्कार के मामलों के निपटारे में अदालतों का जो रवैया रहा है, उससे ये केस एक खास पैमाने पर ही कसे गए हैं.

यही वजह है कि हमारे समाज में बलात्कार एक परंपरा बन गए हैं. नेता ही नहीं, कई बार तो अदालतें भी इस जुर्म को संगीन के बजाय अपनी टिप्पणियों से हल्का कर देती हैं. शादीशुदा जिंदगी में महिलाओं के साथ होने वाली जबरदस्ती को तो कानून मान्यता ही नहीं देता.

अदालतें ये कहकर इसमें दखल नहीं देतीं, कि, ये तो किसी वैवाहिक रिश्ते में जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी होगी, जोकि ठीक नहीं.

निर्भया कांड से सदमे में आई थी न्यायिक व्यवस्था

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प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर इमेज)

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए बलात्कार कांड ने पूरे देश को, हमारी न्यायिक व्यवस्था को सदमे में डाल दिया था. 22 साल की ज्योति पांडे के साथ जो हैवानियत हुई, उससे पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई. लोगों ने कहा कि ऐसे बलात्कारियों से निपटने में हमारी न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह नाकाम रही है.

लोगों ने मांग की कि इस कमी को दूर किया जाए. माहौल ऐसा बना कि पीड़ित के दामिनी, निर्भया और अमानत जैसे नाम रखकर उसे महान बनाने की कोशिश की गई. असल में उसे महानता का दर्जा देकर उसके साथ हुई हैवानियत को हल्का करने की कोशिश की जा रही थी.

उस घटना के बाद छिड़ी बहस के दौरान कई लोगों ने तकनीकी सवाल भी उठाए कि उसके साथ जो हैवानियत हुई, वो असल में बलात्कार नहीं कहा जा सकता. बलात्कार तो तभी माना जाएगा जब कोई इंसान, महिला से जबरदस्ती जिस्मानी ताल्लुक बनाए. इस मामले के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी को ऐसे तकनीकी पहलुओं से भी दो-चार होना पड़ा था.

इससे पहले 1970 के दशक में भी भारत की अदालतों के सामने यही सवाल आ खड़ा हुआ था. मथुरा नाम की एक युवती के साथ हवालात में बलात्कार हुआ. वो जिस्मानी ताल्लुक बनाने की आदी थी. यानी वो बलात्कार से पहले भी सेक्स करती रही थी. सेशन्स कोर्ट ने उससे बलात्कार के आरोपी दो पुलिसवालों को ये कहकर बरी कर दिया कि उन्होंने मथुरा से उसकी रजामंदी से सेक्स किया था.

हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट का फैसला पलट दिया. हाई कोर्ट ने कहा कि डर और दबाव में सेक्स के लिए राजी होने का मतलब ये नहीं कि लड़की के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाए गए. उसने डर की वजह से ऐसा किया. लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले में भयंकर गलती की.

अदालत ने कहा कि चूंकि पीड़ित युवती के शरीर पर चोट के निशान नहीं पाए गए, इसका मतलब ये हुआ कि उसने जिस्मानी रिश्ते बनाते वक्त विरोध नहीं किया. इसका ये मतलब निकलता है कि वो सेक्स के लिए रजामंद थी.

इसीलिए 1979 का तुकाराम बनाम महाराष्ट्र सरकार का ये केस बलात्कार के मामलों की मिसाल बन गया. इस केस से साबित हुआ कि किस तरह बलात्कार पीड़ित, मर्दवादी सोच के दलदल में फंसती है. किस तरह उसे ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. किस तरह कमजोर कानून आरोपियों के आगे लाचार नजर आते हैं.

बरसों बाद 2012 में भी यही हुआ. यहां भी लड़की के साथ हैवानियत के बाद उसके चरित्र को लेकर सवाल उठे. उसके किरदार की चर्चा हुई. बलात्कार के मामलों में अक्सर यही होता आया है. महिला के किरदार, उसके चरित्र का मसला सबसे पहले उठ खड़ा होता है.

पीड़ित को ही उसके साथ हुए जुर्म के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है. मगर 2012 के इस केस में संसद, समाज, सरकार और न्यायपालिका, पहली बार एकजुट हुए. सबने एक सुर से माना कि उस युवती के साथ हैवानियत हुई.

हैवानियत की घटनाओं के बाद ही बदलेगा समाज?

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16 दिसंबर 2013 को निर्भया केस के एक साल पूरे होने पर रखे गए विरोध प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर. (रायटर इमेज)

सवाल ये है कि क्या समाज में बदलाव के लिए किसी लड़की के साथ हैवानियत होना जरूरी है? क्या ऐसी वारदातों के बाद ही हम महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक होंगे? आखिर हमारी न्यायिक व्यवस्था, उस बलात्कार के बारे में कब जागेगी, जो घरों के भीतर होते आए हैं?

आईपीसी की धारा 375, बलात्कार के बारे में है. इसमें एक बात से छूट है. जिन शादीशुदा महिलाओं का उनके पति बलात्कार करते हैं, उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं हासिल है. क्योंकि आईपीसी में शादीशुदा रिश्ते में जबरदस्ती सेक्स करने को बलात्कार नहीं माना जाता. इस छूट का इतिहास काफी पुराना है. हमने ये बात अंग्रेजों की परंपरा से उठाई है और आज तक उसे ढो रहे हैं.

सत्रहवीं सदी के ब्रिटिश जज सर मैथ्यू हेल ने कहा था, 'किसी पति को अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती करने पर बलात्कारी नहीं कहा जा सकता. शादी करने पर कोई भी महिला अपने पति को अपने साथ जिस्मानी संबंध बनाने की इजाजत देती है. इससे वो मुकर नहीं सकती'.

इसी तरह उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश कानूनविद् लॉर्ड हेल्सबरी ने भी कहा था कि, 'किसी भी आदमी को अपनी पत्नी से बलात्कार का मुजरिम नहीं कहा जा सकता. शादी के बाद कोई महिला अपने पति के साथ हमबिस्तर होने को रजामंदी देती है. ये बात शादी का अटूट हिस्सा है'.

भारत में जुर्म के कानून यानी दंड संहिता बनाने वाले लॉर्ड मैकाले ने बलात्कार के जुर्म के लिए सजा का प्रावधान, 1860 के आईपीसी की धारा 359 और 360 में किया था. इसमें भी वैवाहिक बलात्कार को किसी सजा से छूट दी गई थी.

इस मामले में सजा का सिर्फ एक आधार था, वो था रजामंदी की उम्र. पहले के कानून के मुताबिक इसके लिए लड़की की उम्र दस साल होनी चाहिए थी. आज ये उम्र पंद्रह साल है. लेकिन अब उम्र की पाबंदी का कोई मतलब नहीं. अगर किसी पति को अपनी पत्नी से जबरदस्ती की इजाजत है, तो ये उस महिला के मानवाधिकार के खिलाफ है.

( जारी... )

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