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खुले में शौच के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई से बनेगी बात?

अगर गिरफ्तार करने से लोग टॉयलेट बनवाने लायक हो जाएंगे तो करवा लीजिए

Tulika Kushwaha Updated On: Aug 23, 2017 10:30 AM IST

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खुले में शौच के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई से बनेगी बात?

देश में इस वक्त बहुत सी ऐसे मुद्दों पर बात हो रही हैं, जिनपर अबतक बहुत बात नहीं होती थी. ज्यादा उलझे और पॉलिटिकल मुद्दों पर मत जाइए. बस सीधा सादा सा मामला देख लें तो सबसे पहले तो सफाई ही आती है.

क्या कभी देश में सफाई को लेकर लोगों को इतनी नसीहतें सुनाई गई थीं? या किसी को सड़क पर कूड़ा फेंकते वक्त या फेंकने के बाद दोबारा सोचने की जरूरत पड़ी थी? या आजतक कोई इसलिए गिरफ्तार हुआ था क्योंकि वो खुले में शौच कर रहा था?

आदत या मजबूरी?

देश में अबतक सफाई एक बेसिक जरूरत और आदत थी, लेकिन अब अभियान है. पूरा देश स्वच्छ भारत अभियान को जानता है. कुछ लोग बड़ी शिद्दत से देश को साफ रखने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता. कुछ लोगों के पास गंदगी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

द हिंदू में जयपुर की एक खबर छपी है. स्वच्छ भारत अभियान के तहत गांव जहाजपुर को साफ करने में जुटी पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया क्योंकि वो खुले में शौच कर रहे थे. पुलिस ने उन्हें एक दिन तक हिरासत में रखा और अगले दिन उन्हें इस शर्त पर छोड़ा कि वो अगले 15 दिनों में अपने घरों में शौचालय बनवा लेंगे और इस्तेमाल करेंगे.

एक और चीज इस गांव के एसडीओ करतार सिंह ने लोगों के खुले में शौच करने से तंग आकर आदेश दे दिया था कि जो भी बाहर शौच करेगा उसके घर की बिजली काट दी जाएगी. बहुत अच्छा. लेकिन इसके भी अपने नतीजे होंगे. अपनी परेशानियां होंगी. क्या इस बारे में सोचा गया है?

open defecation

क्या जबरदस्ती कार्रवाई है हल?

देश में लगभग अभी भी आधी जनसंख्या के पास टॉयलेट तक पहुंच नहीं है. और कहने की जरूरत नहीं कि इनमें से अधिकतर लोग शौकिया नहीं जाते होंगे बाहर हल्का होने. उनकी क्षमता नहीं है कि वो अपने घर में टॉयलेट बनवा पाएं. कुछ तो ऐसे भी होंगे, जिनके पास टॉयलेट बनवाने लायक घर भी नहीं होगा. ऐसे में फिर कहां से जबरदस्ती कर लेंगे आप? कहां जाएं वो? क्या हम इस स्तर तक भी पहुंच सके हैं कि खुले में शौच को गैर-कानूनी घोषित कर सकें? जब नहीं तो जबरदस्ती कैसी?

क्या सख्ती जरूरी है?

लेकिन फिर वही बात आती है जबतक भारत में लोगों के सिरपर कुछ थोपा नहीं जाता, उनके समझ में नहीं आती. जबतक बात सिर से ऊपर नहीं जाती लगती, वो अपना पल्ला झाड़े रखते हैं. ऐसे में थोड़ी सख्ती जरूरी होती है.

जैसे- देश में सबसे बड़ी लापरवाही नियम-कानूनों को लेकर ही देखने को मिलती है. अगर आप उत्तर प्रदेश में जाएं, तो हेलमेट ऐसी चीज है, जो आपको इक्का-दुक्का दिखेगी. शायद वहां लोग बाइक और हेलमेट को एक दूसरे से जुड़ी चीज के तौर पर नहीं देखते हैं. वहीं दिल्ली में आपको कुछ लोग ही दिखेंगे, जो बाइक चलाते हुए हेलमेट का इस्तेमाल नहीं करते. दिल्ली में इस नियम का सख्त पालन होता है. भले चालान ही कटे, लेकिन कार्रवाई होती ही है.

लेकिन इन दोनों समस्याओं में बहुत फर्क है. लोगों को टॉयलेट बनवाने का आदेश देने या जागरूक करने से समस्या हल तो नहीं हो जाएगी. उसके पहले भी कुछ कदम हैं, जो उठाने जरूरी हैं. लोगों के पास संसाधन होंगे, वातावरण होगा और कोई मजबूरी नहीं होगी तो वो अपने आप जागरूक होंगे. लेकिन हमें सबसे पहले लोगों को मकान, सैनिटेशन, टॉयलेट जैसी बेसिक सुविधाएं उपलब्ध करवानी होंगी. जब हम ये लक्ष्य हासिल कर लें, तब गैर-कानूनी, गिरफ्तारी या बिजली काटने जैसी कार्रवाई का नंबर आना चाहिए.

तो क्या हमें खुले में शौच करने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए? अगर गैर-कानूनी घोषित कर देने से समस्या खत्म हो जाएगी, गिरफ्तार करने से लोग टॉयलेट बनवाने के लायक हो जाएंगे तो करवा लीजिए.

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