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#NotInMyName: क्या जुनैद की जंग जीत पाएगी 'सेल्फी जेनरेशन'

ऑनलाइन कैंपन की बदौलत जंतर-मंतर पर भीड़ तो जुटी लेकिन एक भीड़ जुनैद के सामने भी थी, जिसने कुछ नहीं किया...अब देखना है यह भीड़ क्या कर पाती है!

Ankita Virmani Updated On: Jun 29, 2017 06:53 PM IST

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#NotInMyName: क्या जुनैद की जंग जीत पाएगी 'सेल्फी जेनरेशन'

दिल्ली की पहली बारिश और जंतर-मंतर पर जुनैद खां और भीड़ द्वारा मारे गए लोगों के लिए जुटी हजारों की भीड़. किसी के हाथ में लहराता भारत का झंडा, तो किसी के हाथ में भारत का संविधान, कई हथकड़ियों से बंधे हाथ, तो कई बाजुओं पर बंधे काले पट्टे.

बातों और गुस्से में अखलाक भी था और पहलू भी. एक स्टेज भी सजा था और उसके पीछे भारत का एक मैप भी लगा था. मैप पर उन सारी तारीखों का लेखा-जोखा था जब भीड़ ने किसी मासूम को धर्म के नाम पर मारा, या अफवाह के नाम पर.

इस भीड़ का हिस्सा बच्चे भी थे, बूढ़े भी, नेता भी और गायक भी. पर फिर भी कुछ अजीब थी ये भीड़. उस भीड़ का हिस्सा मैं भी थी.

सेल्फी वाली भीड़

कुछ चेहरों पर गुस्सा था तो कुछ पर मायूसी. कुछ लोगों का कहना था कि उन्हें अफसोस है खुद के हिंदू होने पर क्योंकि उनके जैसे कुछ हिंदू भीड़ बनकर मासूमों को मार रहे हैं. तो कुछ थी सेल्फी भीड़, जो वहां थी सिर्फ फेसबुक और ट्विटर के लिए. कभी अकेले तो कभी किसी के साथ सेल्फी लेने में मस्त थी ये भीड़.

प्रोटेस्ट में सेल्फी लेते लोग.

प्रोटेस्ट में सेल्फी लेते लोग.

सुंदर, रेशमी साड़ियों में कुछ औरतें भी थी इस भीड़ का हिस्सा. कहने को कुछ खास नहीं था और शायद जुनैद के अलावा बाकी मामलों की जानकारी भी नहीं थीं. बस सोलिडेरिटी के लिए साथ खड़ा होना चाहती थी.

कुछ बुजुर्ग भी जो बहुत गुस्से में थे. उनका कहना था कि वो भारत के नागरिक हैं और चिंतित हैं, दुखी हैं. देश हाइजैक हो रहा है और ये एक अघोषित इमरजेंसी जैसा है. क्या वो देश तरक्की कर सकता हैं जहां पॉवर आउटसोर्स हो जाए मॉब को, भीड़ को.

'हिंदू अगेंस्ट हिंदुत्वा'

कुछ कॉलेज के छात्र भी थे किसी के गले में पोस्टर टंगा था तो किसी के हाथ में तख्तियां थी. किसी पर लिखाा था 'हिंदु अगेन्सट हिंदुत्वा' तो किसी पर लिखा था 'नफरत के खिलाफ हम सब की आवाज'.

कुछ युवा थे जो हाथ में #NOTINMYNAME के पोस्टर लिए खड़े थे. मैंने पूछा आपके लिए क्या मतलब हैं इसका? बड़े गुस्से से उन्होंने कहा...राष्ट्र के नाम पर नहीं होगा, हमारे नाम पर नहीं होगा और भारत के संविधान के नाम पर ये नहीं होगा

इस सरकार को हमने चुना है. हमने चुना है उन्हें देश चलाने के लिए और जिस भाईचारे के लिए भारत दुनिया भर में जाना जाता है, वो भाईचारा देश में खत्म हो रहा हैं. भीड़ एक आसान तरीका बन गया है किसी को भी मारने का.

एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला भी मिलीं. कहने लगीं, 'मैं इस देश में बहुत से नेताओं से पहले पैदा हुई. मैं क्यों इस देश को छोड़कर जाऊं? ये मुल्क मेरा है. मेरी मां इस मिट्टी में दफन हैं. मेरे नाम के पीछे खान लगा है सिर्फ इसलिए मैं अपनी पहचान से डरने लगूं? सब मुकर गए जुनैद की मौत का चश्मदीद गवाह बनने से क्योंकि मै क्यों मरूं? जुनैद तो मर गया, उसके लिए बयान देकर मैं क्यों मरूं?

नारों की तख्ती के साथ युवा.

नारों की तख्ती के साथ युवा.

भीड़ का हिस्सा व्हीलचेयर पर बैठा एक लड़का भी था. उससे पूछा कि आपके लिए #NOTINMYNAME का क्या मतलब है. उसने जवाब दिया कि 'भारत में रहने वाला कोई भी इंसान, चाहे वो मेरे जैसा विकलांग हो बराबर है. वो किसी भी धर्म का हो, किसी भी जाति का हो वो पहले भारतीय है. बड़े दुख की बात है कि लोग आगे बढ़कर मदद नहीं करते. हम सब बराबर तब ही होंगे जब हम सब एक दूसरे को बराबरी की नजरों से देखेंगे.'

क्यों फैला है डर?

एक अजीब सा वर्ग भी था इस भीड़ में, जो वहां मौजूद तो था पर कुछ कहना नहीं चाहता था. अजीब इसलिए था कि जो कैंपेन सिस्टम के खलाफ, सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए था, वहां ये वर्ग मीडिया के कैमरे से छुपना चाहता था. मौन रहना चाहता था. कहने के लिए या तो शब्द नहीं थे या हिम्मत नहीं थी ये बताने कि वो भी इस भीड़ का हिस्सा थे. पर चलिए वो मौजूद तो थे. मौन ही सही.

फेसबुक पर #NOTINMYNAME से शुरू हुआ ये कैंपेन और देखते-देखते देश भर में फैल गया. सोशल मीडिया और सेल्फी की दीवानी जेनरेशन वर्चुअल वर्ल्ड के विरोध-प्रदर्शन को जंतर-मंतर की सड़कों पर ले आई. सोशल मीडिया की बदौलत ही #NOTINMYNAME का कैंपेन लंदन तक पहुंचा और वहां भी जुनैद के लिए विरोध-प्रदर्शन हुआ.

पर मेरे मन में सिर्फ एक सवाल. हजारों की तादाद में जमा हुई भारत के अलग-अलग शहरों जैसी एक भीड़ उस दिन असौती रेलवे स्टेशन पर भी मौजूद थी. पर जुनैद की मदद के लिए किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया. जुनैद पर हमला होता रहा और लोग खड़े तमाशा देखते रहे.

तो क्या सिस्टम, कानून व्यवस्था, सरकार से पहले ये सवाल खुद से होना जरूरी नहीं? क्या 200 लोगों की भीड़ उन चंद लोगों पर काबू पाने के लिए काफी नहीं थी? सवाल कीजिए, कोई बुराई नहीं है. पर पहला सवाल खुद से कीजिए.

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