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प्लास्टिक बैन: शहर की सफाई बहुत जरूरी है भाई...

एनजीटी ने दिल्ली में 50 माइक्रोन से भी कम मोटाई वाले अक्षरणीय प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल पर अंतरिम प्रतिबंध लगा दिया है.

Subhesh Sharma Updated On: Aug 11, 2017 01:42 PM IST

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प्लास्टिक बैन: शहर की सफाई बहुत जरूरी है भाई...

देश की राजधानी दिल्ली को प्लास्टिक फ्री बनाने की दिशा में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बड़ा कदम उठाया है. एनजीटी ने दिल्ली में 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल पर अंतरिम प्रतिबंध लगा दिया है. एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी घोषणा की कि अगर किसी व्यक्ति के पास से इस तरह के प्रतिबंधित प्लास्टिक बरामद होते हैं, तो उससे 5000 रुपए का पर्यावरण हर्जाना भी वसूला जाए. साथ ही दिल्ली सरकार को भी एक सप्ताह के अंदर ऐसे प्लास्टिक के समूचे भंडार को जब्त करने का निर्देश दिया है.

नए प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 के तहत, प्लास्टिक थैलियों की मोटाई 40 माइक्रोन्स से बढ़ाकर 50 माइक्रोन्स कर दी गई. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, ऑल इंडिया प्लास्टिक इंडस ट्राइस एसोसिएशन (एआईपीआईए) के अध्यक्ष रवि कुमार अग्रवाल ने कहा, ये प्रतिबंध पहले से ही था. इसमें नया कुछ नहीं है. नियमों का उल्लंघन करने वाले उपभोक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए.

दुनियाभर में लड़ी जा रही है प्लास्टिक के खिलाफ लड़ाई

दुनियाभर में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए मुहिम चलाई जा चुकी हैं. कई देशों ने अपने-अपने तरीके से प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाया. जैसे कि आयरलैंड ने प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर 90 फीसदी तक टैक्स लगा दिया था. वहीं इससे मिलने वाले टैक्स से देश भर में प्लास्टिक बैग को रिसाइकल करने का अभियान चलाया गया. फ्रांस ने भी 2005 से प्लास्टिक बैग के प्रयोग पर बैन लगाना शुरू किया और धीरे-धीरे 2010 तक ये पूरी तरह से लागू हो गया. वहीं ऑस्ट्रेलिया ने भी अपने नागरिकों से स्वैछिक तौर पर प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल न करने की अपील की. ऑस्ट्रेलिया में आज प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 90 फीसदी तक बंद हो गया है.

क्या है देश के मेट्रो शहरों का हाल

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज 690 टन, चेन्नई में 429 टन, कोलकाता में 426 टन और मुंबई में 408 टन पॉलीथीन फेंकी जाती है. जबकि पूरे देश में हर साल 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है. 9025 टन प्लास्टिक रीसाइकिल की जाती है. जबकि 6137 टन प्लास्टिक हर साल फेंकी जाती है.

जलभराव है सबसे बड़ी मुश्किल

जरा सी बारिश हुई नहीं की सड़के भर जाती हैं, नाले उफान मारने लगते और बड़े-बड़े गड्ढे मौत का कुंआ में बदल जाते हैं. गांव की बात तो छोड़िए. दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े मैट्रो शहरों में भी जलभराव आम बात है. जलभराव के कारण कई पानी से होने वाली बीमारियां जन्म लेती हैं. एक्सीडेंट के मामले बढ़ते हैं और गंदगी फैलती है. जलभराव का सबसे बड़ा कारण है पॉलीथीन बैग्स. बांग्लादेश में भी 2002 में जलभराव के कारण पॉलीथीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी.

लोग कहीं पर भी पॉलीथीन फेंक देते हैं, जिससे ड्रेनेज सिस्टम ब्लॉक हो जाता है और जलभराव होने लगता है. बारिश के पानी को कहीं से निकलने की जगह नहीं मिलती और पानी प्रदूषित भी होता है. पीडब्ल्यूडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है प्लास्टिक बैग्स के कारण जगह-जगह जलभराव होता है और इससे डेंगू-चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छर पैदा हो सकते हैं. इसके अलावा सीवर व्यवस्था के बिगड़ने, पानी के जहरीला होने और जमीन के बंजर होने के पीछे भी पॉलीथीन जिम्मेदार है.

शहर को साफ रखन के लिए

शहर को साफ सुथरा बनाए रखने के लिए एनजीटी ने एक जनवरी 2017 को दिल्ली/एनसीआर में डिस्पोजेबल प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था. पूरे शहर में विशेष कर होटलों, रेस्टोरेंट्स और सार्वजनिक एवं निजी कार्यक्रमों में डिस्पोजेबल प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगायी थी. सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने पर सब्जी बेचने वालों और बूचड़खानों पर 10,000 रुपए का पर्यावरण हर्जाना भी लगाया गया. यही नहीं अधिकरण ने इससे पहले 31 जुलाई को रोक के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में प्लास्टिक के अंधाधुंध एवं बेहिसाब इस्तेमाल पर दिल्ली सरकार को फटकार भी लगायी थी.

50 माइक्रोन ही क्यों

50 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग्स पर रोक लगाना इसलिए भी अहम है. क्योंकि इनका मार्केट शेयर 25 फीसदी है. ये रीसाइकिल नहीं हो पाते हैं और इन्हें खत्म होने में कई साल लग जाते हैं. इसका ज्यादातर इस्तेमाल सब्जी विक्रेताओं द्वारा किया जाता है. आपको बता दें कि 1000 माइक्रोन एक मिलीमीटर के बराबर होता है. ये हमारे बाल के डायामीटर जितना होता है. इसकी कीमत काफी कम होती है. जिस कारण विक्रताओं द्वारा इसका ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. उपभोक्ताओं को भी ये आसानी से मिल जाता है, इस वजह से वो कैरी बैग रखने के बारे में ज्यादा नहीं सोचते. वहीं कूड़ा बिनने वाले इन्हें इसलिए नहीं उठाते क्योंकि उन्हें इसका कोई खास दाम नहीं मिलता है.

क्या होगा बैन

- घरों में इस्तेमाल किए जाने वाले ज्यादातर कूड़ा रखने वाले प्लास्टिक बैग 50 माइक्रोन से ज्यादा के हैं. इसके चलते इनपर बैन नहीं लगेगा.

- आमतौर पर सब्जी विक्रेताओं द्वारा दी जाने वाली पन्नी की थैलियां पतली होती हैं और इनकी मोटाई 50 माइक्रोन से कम है. जिस कारण इन पर बैन लगाया गया है.

- कैनवास, डेनिम, जूट, कपड़े और पेपर बैग्स विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

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