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नवाज शरीफ का हश्र और आधार को पैन से जोड़ने की वजह!

अदालत में अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि नवाज शरीफ ने कोई गलत काम किया है

Prakash Nanda Updated On: Aug 03, 2017 05:06 PM IST

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नवाज शरीफ का हश्र और आधार को पैन से जोड़ने की वजह!

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पनामा पेपर्स लीक्स मामले में इस्तीफा देना पड़ा और मंगलवार को पनामा पेपर्स लीक्स का मामला भारत की लोकसभा में भी गूंजा, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सदन को आश्वस्त किया कि ‘पनामा पेपर्स खुलासे’ से जुड़े मामलों में फौजदारी के कानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी, जो लोग जांच-पड़ताल से बचने के लिए अपने एनआरआई होने का दावा कर रहे हैं उनके दावों की जांच टैक्स-डिपार्टमेंट करेगा.

पाकिस्तान में नवाज शरीफ के इस्तीफे की बात उठाकर विपक्षी कांग्रेस पार्टी, खासकर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मोदी सरकार पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह के खिलाफ कार्रवाई के लिए जोर डाल रहे हैं. अभिषेक सिंह का नाम पनामा पेपर्स लीक में अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन आया है. पनामा पेपर्स लीक्स में क्वेस्ट हाइट्स लिमिटेड का जिक्र है और अभिषेक सिंह इस कंपनी के शेयर होल्डर थे.

बताते चलें कि पनामा पेपर्स लीक्स गुप्त सूचनाओं के एक विशाल भंडार के एकबारगी सार्वजनिक होने का मामला है. ये सूचनाएं 1977 और उससे बाद की हैं. सार्वजनिक हुई सूचनाओं का भंडार 1 करोड़ 10 लाख दस्तावेजों में दर्ज है और इन दस्तावेजों में 2,14,000 विदेशी व्यापारिक इकाइयों का जिक्र है. इन सूचनाओं का खुलासा पनामा में 2015 में हुआ. फ़र्स्टपोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पनामा पेपर्स खुलासे में भारत से जुड़ी 22 ऑफशोर व्यापारिक इकाइयों, 1046 व्यक्तियों, 42 मध्यस्थों तथा 828 पतों का जिक्र है.

अभिषेक सिंह

अभिषेक सिंह

अभिषेक सिंह का नाम भी है पनामा पेपर्स लीक में

लीक्स में भारत से जुड़े पते दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चैन्नई जैसे बड़े महानगरों के अत्यंत संभ्रान्त इलाकों के हैं तो हरियाणा के सिरसा, बिहार के मुजफ्फरपुर और मध्यप्रदेश के मंदसौर तथा राजधानी भोपाल के भी नाम इस सूची में शामिल हैं. अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय, विनोद अडानी सहित भारत की 424 जानी-मानी हस्तियों के नाम पनामा पेपर्स लीक्स में शामिल हैं.

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अभिषेक सिंह, जिनका नाम पनामा पेपर्स लीक्स में अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है (उनके नाम शेयर एक ऐसी कंपनी में होना जिसका एक अवैध विदेशी खाता है, कांग्रेस ने यही अनुमान लगाया है अन्यथा अभिषेक सिंह का नाम पनामा पेपर्स लीक्स से अन्य किसी रीति से नहीं जुड़ता) अभिषेक को छोड़ दें तो अन्य किसी भी बड़े भारतीय नेता का नाम इस खुलासे में शामिल नहीं है. इसके उलट लीक हुई सूचनाओं में मौजूदा या भूतपूर्व 12 राष्ट्राध्यक्षों के नाम शामिल हैं जिनमें कुछ नाम तानाशाहों के भी हैं.

राष्ट्राध्यक्षों तथा राजनेताओं के 60 से ज्यादा रिश्तेदार या सहायकों के नाम भी पनामा पेपर्स लीक्स में सामने आए हैं. लीक्स से यह भी पता चलता है कि काले धन के लेन-देन से जुड़े एक नेटवर्क में रूस के राष्ट्रपति के घनिष्ठ सहायक, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साले, यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो प्रोसेन्को, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति मोरिसिवो मारसी तथा सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल असद जुड़े हैं.

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरोन के स्वर्गीय पिता का नाम भी इस लीक्स में आया है. नाम आने के बाद कैमरोन तथा तत्कालीन वित्तमंत्री जॉर्ज आसबर्न और विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन पर टैक्स-रिटर्न के ब्यौरे सार्वजनिक करने का सियासी दबाव काफी बढ़ गया था. दरअसल पनामा पेपर्स लीक्स के बाद लेबर पार्टी के नेता और ब्रिटेन की संसद में 2015 से नेता प्रतिपक्ष जेरमी कोर्बिन पर सियासी दबाव इतना बढ़ा कि उन्हें टैक्स संबंधी अपनी निजी सूचनाएं सार्वजनिक करनी पड़ीं.

नवाज पर लगे आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं

पनामा पेपर्स लीक्स में विश्व के जिन 143 बड़े राजनेताओं के नाम आए हैं उनमें सबसे ज्यादा गंभीर नतीजा सिर्फ नवाज शरीफ को भुगतना पड़ा है. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद से हटा दिया. लीक्स के जरिए सामने आए पेपर्स से उस वक्त यह भी जाहिर हुआ था कि आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिगमंडर गनलॉसन का अपनी पत्नी की संपदा से कोई अघोषित रिश्ता है. इस मामले को लेकर इतना बावेला मचा कि उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना ही ठीक समझा.

अब बात चाहे जो हो लेकिन पनामा पेपर्स में नाम आ जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई व्यक्ति निश्चित रुप से दोषी है. आखिर विदेशों में जितने खाते हैं उनमें सबका इस्तेमाल अवैध लेन-देन या ढंके-छुपे मकसद से ही तो नहीं होता. हां, यह देखने को जरूर मिलता है कि लोग टैक्स बचाने के लिए विदेशों में कंपनी खोल लेते हैं, सरकारी प्राधिकरणों से अपनी संपदा छुपाते हैं, आपराधिक गतिविधियों के लिए धन का लेन-देन करते हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बच निकलते हैं.

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पनामा पेपर्स का जोर मुख्य रूप से ऐसे ही ढंके-छुपे मकसद को उजागर करना है. कोई व्यक्ति दोषी है या नहीं यह बताना आखिरकार अदालत का काम है और यह इसपर निर्भर है कि आरोप अदालत में सिद्ध हो पाते हैं या नहीं. जहां तक नवाज शरीफ और उनके बेटी-बेटों का सवाल है, अदालत में अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि उनलोगों ने कोई गलत काम किया है. मामले में अब भी जांच जारी है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को यह कहकर सजा दी है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के पद को बदनाम किया. जान पड़ता है, कोर्ट का नजरिया यह है कि प्रधानमंत्री का हर हाल में पुरजोर ईमानदार और नैतिक नजर आना जरूरी है.

दूसरे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान की घटना यह संकेत करती है कि समस्या कानून के उल्लंघन की नहीं बल्कि उससे कहीं आगे की है. समस्या यह नहीं है कि आपका आचरण कानून के अनकूल है या नहीं. कानून का उल्लंघन ना हुआ तब भी किसी मामले की गंभीरता कम नहीं हो जाती बशर्ते वह मामला नैतिक आचार और इंसाफ का हो. लेकिन, इस सिद्धांत को मान लेने के नतीजे बड़े खतरनाक हो सकते हैं, इसका भारी दुरुपयोग किया जा सकता है. अगर किसी राष्ट्राध्यक्ष की नैतिकता अदालत की जांच-परख का विषय मान ली जाए तो फिर दुनिया में कहीं स्थिर सरकार ही कायम नहीं रह सकती क्योंकि कानून या नियम एक सुपरिभाषित दायरे की भीतर काम करते हैं जबकि नैतिकता-अनैतिकता का मामला बहुत कुछ लोगों के मन-मानस पर निर्भर करता है.

इस बात से यह भी समझा जा सकता है कि दुनिया भर में क्यों सरकारों का जोर ऐसे कानून बनाने पर है जिससे सुनिश्चित हो सके कि लोग अपना टैक्स भरें और टैक्स संबंधी जानकारी प्रदान करें. मोदी सरकार के आधार-कार्ड को पैन-कार्ड से जोड़ने के फैसले को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. लेकिन फैसले को यह कहते हुए चुनौती दी गई कि इससे निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है. मामले ने इतना ज्यादा तूल पकड़ा है कि इस पर अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के सामने बहस हो रही है.

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टैक्स की चोरी रोकना सरकार के लिए चुनौती है

टैक्स संबधी पारदर्शिता के दो पहलू हैं. एक पहलू यह है कि टैक्स-सूचनाओं की प्रणाली जितनी ज्यादा पारदर्शी होगी टैक्स चुराने के अवसर उतने ही कम होंगे. लोगों को अगर पता हो कि उनके टैक्स संबंधी ब्यौरों की जांच-पड़ताल होगी तो वे अपने ब्यौरे ज्यादा संगत तरीके से भरेंगे और टैक्स से बचने के लिए आड़ी-तिरछी योजनाओं का सहारा लेने में संकोच करेंगे.

लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है. मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा होता है कि वह कानून में अपने बचाव के लिए कोई ना कोई सुराग ढूंढ़ ही लेता है. टैक्स-चोरी की आदत में बदलाव तो हो सकता है लेकिन इस आदत का पूरी तरह से खात्मा नामुमकिन है. इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि अगर धनी लोगों के टैक्स संबंधी ब्यौरे सार्वजनिक हों तो फिर उनकी सुरक्षा में सेंधमारी के हिंसक अपराध जिसमें अपहरण और हत्या भी शामिल है, का बड़ा सवाल उठ खड़ा होगा. इसलिए सूचना की गोपनीयता सीधे-सीधे व्यावहारिकता का तकाजा है.

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि टैक्स संबंधी सूचनाओं को सार्वजनिक करने की बात को उचित ठहराने के लिए तर्क दिया जा सकता है कि यह लोक-कल्याण का मामला है. लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आयकर संबंधी नियमों का पालन करवाने के नाम पर सरकारी अधिकारी और सरकार को मनमानी करने की छूट ना मिल जाए.

नियंत्रण और संतुलन की एक व्यवस्था होनी चाहिए ताकि सांसद, मीडिया तथा आम जनता को कर उगाही में लगे अधिकारियों के प्रशासनिक बर्ताव को जानने और उसपर सवाल उठाने की राह बनी रहे. जो लोग कानून बनाते और लागू करते हैं उन्हें यह बात दिखानी होगी कि यह हितों के टकराव का मामला नहीं है.

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