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ऑर्गेनिक खेती: मध्य प्रदेश के इस शख्स के पास है किसानों की मुसीबतों का हल

खेती का ऑर्गेनिक तरीका बदल सकता है किसानों की जिंदगी.

FP Staff Updated On: Jun 30, 2017 07:37 PM IST

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ऑर्गेनिक खेती: मध्य प्रदेश के इस शख्स के पास है किसानों की मुसीबतों का हल

अगर देश में ऐसी खेती की तकनीक विकसित की जाए, जिसमें ट्रैक्टर, कीटनाशक, रासायनिक खाद और जुताई वगैरह के बगैर अच्छी फसल उगाई जा सके तो? किसानों की अधिकतर समस्याएं हल हो जाएंगी. देश का एक किसान ऐसी ही खेती कर रहा है.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के राजू टिटस 31 सालों से बिना ट्रैक्टर की जुताई या पेस्टीसाइड्स के उपयोग के अच्छी फसल उगा रहे हैं. उनकी खेती की तकनीक जापानी रिसर्च फार्मर मसानोबू फुकुओका के किताब 'वन स्ट्रॉ रिवॉल्यूशन' पर आधारित है.

बेटर इंडिया की रिपोर्ट में राजू टिटस कहते हैं, 'मैंने अपने 12 एकड़ जमीन पर खेती के नए प्रयोग किए. मैंने हरित क्रांति की देखा-देखी रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग किया. इससे फसल तो बढ़ी लेकिन जितने फायदे की उम्मीद थी उतनी हुई नहीं. इसके बाद मैंने नए खेती के तरीके इलेक्ट्रिक पंप, बायोगैस प्लांट आजमाए, लेकिन धीरे-धीरे मेरी उपजाऊ जमीन बंजर जैसी हो गई, मिट्टी की क्वालिटी खत्म हो गई.'

1984 में 15 साल तक ऐसी कोशिशें करते हुए आखिर उन्होंने अपनी जमीन बेचने का फैसला किया.

लेकिन उनकी मां ने किसी दूसरे मदद की सोची और वो रसूलिया गांव के फ्रेंड्स रूरल सेंटर पहुंचीं. उन्हें यहां वो किताब दी गई, जो उन्हें अगले सालों में एक लहलहाती हुई फसल देने वाली थी.

जापान के रिसर्च फार्मर मसानोबू फुकोओका की किताब 'वन स्ट्रॉ रिवॉल्यूशन' का सीधा फंडा है- प्रकृति के साथ रहो, उस पर राज मत करो. ये किताब सिखाती है कि प्रकृति के हिसाब से अपनी खेती को ढालो. प्रकृति के हिसाब से अपनी खेती के तरीके विकसित करो. इस किताब में कीटनाशकों, रासायनिक खादों और जुताई के तरीकों की भी निंदा की गई है.

1985 में उन्होंने इस किताब के अनुसार खेती करनी शुरू की. उन्होंने घास की कई किस्मों के बीज डाले. बारिश के बाद उनके खेत की मिट्टी बेहतर हुई और उस बार की फसल पिछली फसलों से बेहतर हुई.

लेकिन खेती के दुश्मन घास की किस्में खेत में डालने, बिना जुताई के खेती करने की ये विधियां गांव वालों के समझ से बाहर थीं. उनका मजाक उड़ाया गया. इसके बाद उन्हें कई विरोधों का भी सामना करना पड़ा.

लेकिन ये सारी मुश्किलें तब छूमंतर हो गईं, जब 1998 में उनके खेत को खुद मसानोबू फुकुओका देखने आएं. वो इंडियन साइंस कांग्रेस सेशन में हिस्सा लेने आए थे.

इसके बाद उन्होंने इस किताब के और भी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू किया. मिट्टी और खाद के गोलों और खेती के प्राकृतिक तरीकों की वजह से आज उनके खेत लहलहा रहे हैं. 71 साल के राजू और उनकी पत्नी शालिनी आज देश भर में अपनी प्राकृतिक तरीकों से की जाने वाली खेती की वजह से जाने जाते हैं.

राजू कहते हैं, 'खेती की समस्या बस किसानों की समस्या नहीं है, वो खाने वालों की समस्या भी है. अगर आपको स्वस्थ और शुद्ध चीजें खानी हैं, तो आपकी मिट्टी भी शुद्ध होनी चाहिए.'

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