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राष्ट्रगान पर हाईकोर्ट का निर्णय बहुसंख्यक मुसलमान के दिल की आवाज है

मदरसों में राष्ट्रगान 'गाया जाए या न गाया जाए' जैसे सवाल ही बेबुनियाद हैं

Asif Khan Updated On: Oct 05, 2017 06:07 PM IST

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राष्ट्रगान पर हाईकोर्ट का निर्णय बहुसंख्यक मुसलमान के दिल की आवाज है

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाते हुए मदरसों में राष्ट्रगान गाने को अनिवार्य करार दिया है. हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करते हुए राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान करना चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश डीबी भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की बेंच ने ये फैसला देते हुए कहा कि राष्ट्रगान का गाया जाना और राष्ट्रध्वज को फहराना शिक्षण संस्थाओं के साथ ही अन्य संस्थाओं में भी अनिवार्य है.

ये पूरा मामला उस वक्त सुर्खियों में आया था, जब उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने 3 अगस्त 2017 को शासनादेश जारी करते हुए प्रदेश के मदरसों (उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त) में राष्ट्रगान गाने को अनिवार्य करार दिया था और इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था को भी जरूरी करार दिया था.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका के जरिए इस आदेश को चुनौती दी गई. मगर हाईकोर्ट ने ये कहते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया कि याची अपने पक्ष में कोई सबूत पेश नही कर सका.

सवाल इस याचिका के खारिज होने का नही है बल्कि सवाल ये है कि याचिका डाली ही क्यों गई? दुनिया के किसी भी देश मे राष्ट्रगान या राष्ट्रध्वज के खिलाफ शायद ही कभी कोई अदालत में गया है? दरअसल ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि भारत में सरकारों के फैसले वोट के गुणा-भाग पर आधारित होते हैं.

Allahabad_high_court wiki

आम नागरिक को जो समस्याएं होती हैं राजनीतिक दल उन समस्याओं पर माथापच्ची करने के बजाय उन मुद्दों को हवा देते हैं जिनसे धर्म और जाति की राजनीति करने में आसानी होती है.

ये मुद्दा भी ऐसा ही है. यहां सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के गाए जाने से ज्यादा इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कराए जाने से संबंधित आदेश पर राजनीति हुई. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ऐसा होना नहीं चाहिए था. होना तो ये चाहिए था कि सरकार मदरसों में राष्ट्रगान गाने और तिरंगा फहराने की पहल के तहत अपने अफसरों और विधायकों को आदेश देती कि स्कूलों के साथ-साथ मदरसों में भी जाएं और तिरंगा फहराएं. मगर एक अच्छे काम को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया. जो होना नहीं चाहिए था.

अब सवाल के दूसरे पहलू पर गौर करते हैं. ऐसा कई मर्तबा महसूस किया गया है कि जब भी कोई सरकार मुसलमानों को या उनके संस्थानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने का काम करती है या करने की कोशिश करती है तो एक हंगामा सा मच जाता है. ऐसा नहीं है कि ये हंगामा सिर्फ मुसलमान मचाते हैं बल्कि कुछ तथाकथित राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा इसे मुसलमानों के निजी मामलों में सरकारी दखल करार दे देते हैं. हालांकि मुसलमानों की बड़ी तादाद ऐसी उलझनों से दूर ही रहती है मगर कुछ खुराफाती तत्व पूरी कौम को शर्मिंदा करने का काम करते हैं.

A Muslim man waves an Indian flag during a march to celebrate India’s Independence Day in Ahmedabad

मुसलमान अपने बच्चो को सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं और वहां राष्ट्रगान रोजाना गाया जाता है कभी कोई आवाज नहीं उठती. सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में राष्ट्रगान गाए जाने की बात पे एक हंगामा खड़ा हो जाता है. क्या स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों से कम मुसलमान होते हैं? नहीं, ऐसा नहीं है. बल्कि मदरसा आज के दौर में एक सियासी दुकान बन गया है.

देखने मे आया है कि हजारों छोटे-छोटे मदरसे चलाने वाले मौलवी और कई बड़े मदरसों से ताल्लुक रखने वाले मौलाना किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से नजदीकी रखते हैं. इन्हीं नजदीकियों की वजह से इन मौलानाओं को चुनाव के वक्त याद किया जाता है.

ये कौम के तथाकथित रहनुमा अपनी-अपनी सियासी वफादारियां निभाते हैं और उसी के मुताबिक बयान जारी करते हैं. बीजेपी का वोट बैंक हिंदू कट्टरता की पैदावार होता है तो मुस्लिम कट्टरता सेक्युलर दलों के वोटों में इजाफा करती है. यही वजह है कि किसी भी सरकारी आदेश को धर्म और समाज के चश्मे से देखने की परंपरा जोर पकड़ती जा रही है.

जहां तक मदरसों में 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान करने वाले आदेश की बात है उसमें कुछ भी गलत नहीं है. अगर आप 'सारे जहां से अच्छा' या उर्दू के दूसरे तराने गाते हैं तो 'जन-गण-मन' गाने में भी कोई बुराई नहीं है. ये गीत जो मूलरूप से बंगाली में लिखा गया है दरअसल अपने रचयिता या विधाता की स्तुति या प्रशंसा का ही बखान करता है.

इस गीत के पांच छंद हैं जिनमे से पहले छंद को राष्ट्रगान के रूप में मान्यता दी गई. बाकी चारों छंद भी अगर पढ़े जाएं तो मालूम होगा कि रबिन्द्रनाथ टैगोर ने इस गीत के जरिए भारत को सदियों से अपने आशीष से नवाजने वाले भाग्यविधाता की तारीफ की है. वो कोई और नहीं बल्कि हिंदुओं का ईश्वर, ईसाइयों का गॉड और मुसलमानों का अल्लाह ही तो है.

कुछ लोगों ने इस गीत को इसलिए विवादित समझ लिया कि इसके बारे में ये धारणा है कि इसे जॉर्ज पंचम की शान में लिखा गया है. खुद टैगोर ने 19 मार्च 1939 के अपने एक पत्र में इस बात का उल्लेख करते हुए कहा है, ' मैं खुद अपना अपमान करूंगा अगर मैं उन लोगों को जवाब दूं जो मुझे इस मूर्खता के योग्य समझते हैं कि मैं जॉर्ज चतुर्थ या जॉर्ज पंचम की शान में कोई गीत गाऊं और उनको भारत का भाग्य विधाता बताऊं या अनंत समय से मानवता का पालनहार कहूं'.

Rabindra Nath Tagore

बहरहाल, ये गीत पाठशालाओं, विद्यालयों, सरकारी कार्यक्रमों या किसी भी संस्थान में गाया जाए इसकी मूल भावना वही है जो इसके रचयिता की है अर्थात ईश्वर, अल्लाह या गॉड से भारत की भलाई की कामना. ऐसा करना कोई गलत काम नहीं है और न ये इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है.

मुसलमानों के रहनुमाओं को चाहिए कि हर बात को धर्म और मजहब के चश्मे से देखने की बजाय उसको राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के नजरिए से भी देखा जाए. एक बेहतर समाज और एक बेहतर देश बनाने की जिम्मेदारी सबकी है. साथ ही बीजेपी समेत सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि वो इक्का-दुक्का मुसलमानों की मूर्खता को पूरी कौम के माथे पर न लिखें बल्कि मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी के नजरिए को देखते हुए कोई राय कायम की जाए.

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