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नर्मदा सेवा यात्रा: सिर्फ कागजों पर ही नहीं हकीकत में नर्मदा होगी स्वच्छ

148 दिनों की इस यात्रा में 1,100 गांवों से गुजरते हुए 3,350 किलोमीटर की दूरी तय की गई

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: May 16, 2017 03:37 PM IST

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नर्मदा सेवा यात्रा: सिर्फ कागजों पर ही नहीं हकीकत में नर्मदा होगी स्वच्छ

नर्मदा नदी के तट पर मनाए जा रहे 148 दिवसीय 'नमामी देवी नर्मदा सेवा यात्रा' के समापन समारोह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्मदा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मध्य प्रदेश के अमरकंटक की यात्रा की.

इस मौके पर प्रधानमंत्री ने नर्मदा नदी के संरक्षण को लेकर एक खाका भी जारी किया. नर्मदा नदी अमरकंटक से निकलकर पूरे विंध्याचल पर्वत श्रृंखला क्षेत्र से होकर गुजरती है. नर्मदा के कारण ही इस क्षेत्र का विकास एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में हुआ है.

नर्मदा देवी नर्मदा सेवा यात्रा 11 दिसंबर 2016 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुरू की थी. इस यात्रा में शामिल लोगों को नदी के किनारे-किनारे यात्रा कराते हुए उन्हें नदी के उद्गम स्थल से लेकर अरब सागर में मिलाने वाले स्थान खंभात की खाड़ी तक और फिर खंभात की खाड़ी से यात्रा करते हुए नर्मदा के उद्गम स्थल तक पहुंचा दिया गया था.

148 दिनों में 1,100 गावों में की दूरी तय की गई

अमरकंटक यात्रा का मुख्य उद्देश्य, नदी के संरक्षण और इसके संसाधनों के टिकाऊ उपयोग की जरूरतों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और नदी के तटवर्ती इलाकों की रक्षा करने के लिए उसके किनारे वृक्षारोपण को बढ़ावा देना है.

साथ ही इसका मकसद टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करते हुए उसे खत्म करना है. 148 दिनों की इस यात्रा में 1,100 गांवों से गुजरते हुए 3,350 किलोमीटर की दूरी तय की गई.

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महानगरीय जीवन शैली से थकी हुई आंखों वाली किसी जोड़ी के लिए मध्यप्रदेश के विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के घने, प्राकृतिक जंगलों की यात्रा वैसा ही अहसास कराती है, मानो प्रचंड गर्मी से भरे किसी शुष्क मौसम के आखिर में लंबे समय से इंतजार करा रहे मॉनसून ने उस पर ठंडक के वरदान की बारिश कर दी हो.

नर्मदा परिक्रमा के अंत को कवर करने वाली प्रेस टीम के एक हिस्से के रूप में- सोमवार दोपहर प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में इस पर रौशनी डाला जाना-सही मायने में नई दिल्ली की बेचैन कर देने वाली इस गर्मी में ईश्वर की ओर से मिलने वाले किसी हरे अवकाश की तरह ही है.

जबलपुर राज्य के महत्वपूर्ण शहरों में से एक है और यह शहर नर्मदा के बिल्कुल नजदीक स्थित है. नदी के तटों पर भेड़ाघाट के संगमरमर रॉक संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है. दूसरी ओर अमरकंटक राज्य की समृद्ध प्राकृतिक संपदा की एक अद्भुत पहचान है. यह अभियान जबलपुर से चलकर अमरकंटक तक चला.

Narmada River

नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है (फोटो: रॉयटर्स)

जंगलों का लंबा विस्तार दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेतों तक बिखरा हुआ है और इनके साथ होने का अहसास शोर और प्रदूषण के साथ कंक्रीट के जंगलों से उबती और कसमसाती आंखों को मिलती किसी राहत से कम नहीं है.

यह सचमुच नर्मदा की भूमि है, क्योंकि नर्मदा नदी, राज्य के इस हिस्से में कहीं से भी दूर नहीं है. राज्य का पूर्वी भाग वास्तव में उस सभ्यता का हिस्सा है, जिसे नर्मदा ने अपने जल से पाला-पोसा और सिंचित किया है.

गंगा से भी ज्यादा नर्मदा ज्यादा महत्वपूर्ण है

नर्मदा सेवा यात्रा के आखिर में जब नरेंद्र मोदी ने समारोह के हिस्से के रूप में एक स्वच्छ नर्मदा की शपथ लेने के लिए अपनी श्रद्धांजलि दी, तो यह एक ऐतिहासिक घटना होने के साथ-साथ शिवराज सिंह चौहान के लिए एक राजनीतिक रूप से लाभकारी पल जैसा दिखा.

मध्यप्रदेश में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं. ये नर्मदा सेवा यात्रा सही मायने में उस शिवराज सिंह चौहान के लिए बड़े जनसमूह तक अपनी पहुंच बनाने वाला कार्यक्रम साबित हो सकता है, जो अपने लगातार तीन कार्यकालों में मध्यप्रदेश के सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे हैं.

इस समारोह ने उन्हें राज्य के उन लोगों के साथ एक भावनात्मक संबंध स्थापित करने का भी मौका दिया है, जिनके लिए नर्मदा नदी गंगा नदी के समान ही नहीं बल्कि कई मायनों में ये गंगा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि नर्मदा यहां 'मां' के रूप में पूजी जाती हैं.

नर्मदा: एक कुंवारी नदी

भौगोलिक दृष्टि से नर्मदा नदी देश की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती है. इसके ठीक उलट भारतीय प्रायद्वीप की दूसरी सभी नदियां पश्चिम से पूरब की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है.

नर्मदा का जल 40 लाख लोगों की प्यास बुझाता है

नर्मदा का जल 40 लाख लोगों की प्यास बुझाता है

मध्यप्रदेश (16 जिलों को पार करती और 1,077 किलोमीटर दूरी तय करती हुई) के आर-पार बहती हुई नर्मदा सही अर्थों में राज्य की जीवन रेखा के रूप में जानी जाती है. विभिन्न त्योहारों के माध्यम से पूरे साल नर्मदा की पूजा की जाती है.

इसकी पूजा यूं ही नहीं की जाती. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि नर्मदा नदी का जल 40 लाख लोगों की प्यास बुझाता है और 1.7 मिलियन हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के काम आता है.

मध्यप्रदेश में होने वाली दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से परिचित हर एक शख्स को अच्छी तरह मालूम है कि नर्मदा यात्रा ने राज्य के लोगों की भावनाओं में किस तरह बड़े स्तर पर जुड़ाव पैदा किया है.

राज्य के लोग इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि देश के पर्यटन के लिहाज से मध्यप्रदेश अब भी एक ऐसा न्यूनतम पर्यटकों वाला प्रदेश है, जिसकी इस विशेष स्थिति ने इसे अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने में मदद की है.

अमरकंटक का महत्व

अमरकंटक मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला (विंध्य पर्वत) पर स्थित है. यह 'विंध्य सुपरग्रुप' के नाम से भी जाना जाता है और यह दुनिया के सबसे बड़े और मोटे सिलसिलेवार तलछटों में से एक है.

भारत में तीर्थयात्रा के नक्शे में पारिस्थितिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और पर्यटन के महत्व वाला यह सबसे छोटे पवित्र स्थलों में से एक है.

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नर्मदा के अलावा एक और महत्वपूर्ण नदी सोन है, जो अमरकंटक से निकलती है और उत्तर प्रदेश, ओडिशा से गुजरते हुए बिहार में जाकर एक विशाल आकार ले लेती है.

बिहार के रोहतास जिले में डेहरी शहर भी सोन नदी के किनारे स्थित होने के कारण डेहरी-ऑन-सोन के नाम से जाना जाता है. सोन नदी पर बना 3.065 किमी की लंबाई वाला पुल भारत का सबसे लंबा रेलवे पुल है, जो सोन नगर और डेहरी को जोड़ता है और सोन ब्रिज के रूप में लोगों के बीच जाना जाता है.

हिंदू पौराणिक कथाओं में अमरकंटक का जिक्र स्कंद पुराण में मिलता है, जहां इसे रेखा खंड के रूप में जाना जाता है. रामायण और महाभारत में इस नदी का जिक्र रेवा के रूप में किया गया है. धार्मिक रूप से इसका महत्व इसी बात से होता है कि यह एक कुंवारी नदी है- नर्मदा नदी, गंगा जैसी अन्य नदियों के ठीक विपरीत एक ऐसी नदी है, जिसने कभी शादी ही नहीं की.

पौराणिक कथाओं और लोककथाओं के अनुसार, नर्मदा और सोन के बीच शादी नहीं हुई और नर्मदा कुंवारी बनी रही; जबकि सोन ने एक और छोटी नदी जोएला से शादी कर ली, जो नर्मदा की एक साथी थी.

गंगा नदी की तीन दिन की यात्रा और नर्मदा की एक दिन की यात्रा से समान लाभ होता है

गंगा नदी की तीन दिन की यात्रा और नर्मदा की एक दिन की यात्रा से समान लाभ होता है

अमरकंटक का एक बड़ा आध्यात्मिक महत्व और आदर है. कहा जाता है कि अमरकंटक में किए गए 10,000 मंत्रोच्चारण किसी दूसरे तीर्थस्थलों पर किए गए एक लाख मंत्रोच्चारण के बराबर हैं.

कोई भी व्यक्ति केवल नर्मदा की एक यात्रा करके वह आध्यात्मिक लाभ उठा सकता है, जो तीन दिनों तक गंगा नदी में डुबकी लगाने और यमुना में सात दिनों तक डुबकी लेने के बाद हो सकता है. भोपाल के जाने माने ज्योतिषी और विद्वान प्रोफेसर शिव प्रसाद पाठक का कहना है, 'यह शक्ति (आध्यात्मिक शक्ति) पीठ के रूप में भी जाना जाता है और इसका एक अद्भुत ज्योतिषीय और अनुष्ठानिक महत्व है.'

एक पौराणिक कथा के अनुसार, विंध्य पर्वत और मेरु पर्वत (हिमालय) के बीच एक बार मुकाबला हुआ. दोनों अपनी ऊंचाई इतनी बढ़ाते गए कि उनकी होड़ के बीच सूर्य ही ढक गया. ऐसी स्थिति में ऋषि अगस्त्य ने विंध्य से आग्रह किया कि वो अपनी ऊंचाई को कम करे ताकि वह अपनी उत्तर से दक्षिण की यात्रा पूरी कर सकें.

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अगस्त्य के सम्मान में विंध्य ने अपनी ऊंचाई कम कर दी और वादा किया कि जब तक अगस्त्य ऋषि उत्तर की तरफ आ नहीं जाते, तब तक वह नहीं बढ़ेगा और उनकी प्रतीक्षा करेगा. अगस्त्य दक्षिण में बस गए और विंध्य पर्वत अपने वचन से बंधकर कभी नहीं बढ़ पाया. भौगोलिक रूप से इसकी ऊंचाई हिमालय से कम है.

विंध्याचल की मैकाल पर्वत श्रृंखला पर स्थित अमरकंटक अपने समृद्ध वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं और औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ-साथ चिकित्सकीय महत्व के रूप में भी जाना जाता है.

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