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पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा: ट्रंप से कम उम्मीदें रखना ही अच्छा है

ट्रंप से पीएम मोदी की बातचीत में कुछ भी हो सकता है

Sreemoy Talukdar Updated On: Jun 10, 2017 12:02 PM IST

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पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा: ट्रंप से कम उम्मीदें रखना ही अच्छा है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाशिंगटन डीसी यात्रा की तारीख की घोषणा (आधिकारिक या गैर आधिकारिक) अब तक नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि 25 से 27 जून के बीच ये यात्रा हो सकती है.

नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री की ये पहली बैठक होगी. इस मुलाकात में इम दोनों नेताओं के आपसी समीकरण भारत-अमेरिकी रणनीतिक संबंध से कहीं अधिक अहम होंगे. हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि भारत को सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, इसका मतलब ये है कि मोदी और ट्रंप आमने-सामने बैठकर भविष्य में संबंधों की आगे की सुर-ताल तय कर सकते हैं.

ट्रंप का अंदाज अलग है

ये अजीब बात है. क्योंकि आमतौर पर दो देशों के प्रमुखों की मुलाकात आधिकारिक रूप से सख्त प्रोटोकॉल के तहत होती है जहां हाथ मिलाने से लेकर और कैमरे की तरफ देखने तक में भी एहतियात से अभ्यास किया जाता है. कूटनीतिक बैठकों में अनिश्चितताओं को दूर कर नतीजों को अपने पक्ष में करने के मकसद से भी ऐसी कवायद की जाती है.

trump

जब बात ट्रंप की हो तो ये सिद्धांत भी बेमानी हो जाते हैं क्योंकि ट्रंप खुद अनिश्चितता के प्रतीक हैं. शीत युद्ध के दौरान क्रेमलिन बीट के अमेरिकी संवाददाता सिर्फ ये आइडिया लगाने के लिए कि रूसी नेता क्या मसला उठाने वाले हैं अपना सब कुछ झोंक दिया करते थे. वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति टेलीविजन देखते हुए अपनी रणनीतियां और सोच ट्वीट करते हैं. कई बार तो अपने स्टाफ और प्रवक्ताओं को भी वो अंधेरे में रखते हैं.

हाल में ब्रुसेल्स में हुए नाटो शिखर सम्मेलन में ट्रंप अपने भाषण से भटक गए और अमेरिका के सहयोगी देशों को हमले की स्थिति में समर्थन देने का वादा करने वाली महत्वपूर्ण पंक्ति हटा बैठे, जिससे यूरोपीय देशों के नेता और यहां तक कि उनके प्रतिनिधिमंडल के लोग भी भौचक्के रह गए.

राष्ट्रपति चुनाव के अपने अभियान के दौरान लेखक और डॉक्युमेन्ट्री फिल्म निर्माता माइकल मूर ने ट्रंप का जिक्र ‘ह्यूमन मोलोटोव कॉकटेल’ के रूप में किया था जिन्हें व्यवस्था से नाराज उनके समर्थकों ने व्यवस्था को ‘तोड़ने’ के लिए 'ओवल ऑफिस'  में उछाल सकते हैं. मूर को इस बात का अंदाजा शायद पहले ही हो चुका था. उनके कहने का मतलब था कि ट्रंप के विचार 'पूंजीवाद, समाजवाद और यहां तक कि लोकतंत्र के मानदंड पर खड़े नहीं उतरते.' उन्होंने कहा था, 'ट्रंप के विचार का नाम है डोनाल्ड जे ट्रंप. वह खुद में विश्वास करते हैं. अगर उनके लिए यह अच्छा है तो यह अच्छी बात है. अगर अच्छा नहीं है तो बुरी बात.'

क्या होगी भारत की उम्मीद?

इसलिए जब मोदी अमेरिका के तेज तर्रार राष्ट्रपति ट्रंप से मिलेंगे तो भारत के लिए कोई एजेंडा तय करना इतना आसान नहीं होगा. प्रधानमंत्री को हालात के मुताबिक सुधार की जरूरत पड़ेगी जैसा कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रॉ ने ट्रंप से हाथ मिलाते हुए किया था. खुद को किसी पचड़े में उलझाए बगैर और विवादों को हवा दिए बिना उन्होंने हालात को अपने पक्ष में करने की कोशिश की.

Narendra Modi 1

मीडिया रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि यह यात्रा तामझाम के बजाय संयमित रहेगी और ट्रंप के साथ आमने-सामने की मुलाकात और शीर्ष सीईओ के साथ व्यस्तता से आगे मोदी नहीं जा पाएंगे. भारतीय प्रवासियों के साथ खास आयोजन भी शायद इस बार न हो.

टाइम्स ऑफ इंडिया के चिदानंद राजगट्टा वाशिंगटन से लिखते हैं कि 'नई दिल्ली रोमांच और तामझाम से दूर रहते हुए इसी बात से खुश हो जाएगा कि कोई गड़बड़ न हो.' वे आगे कहते हैं कि 'अमेरिकी प्रशासन के विदेश विभाग में खाली जगहों (और उन जगहों पर नियुक्तियों में प्रशासन की अक्षमता) ने उन राजनयिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं जो अपने नेताओं के लिए विदेश दौरों की तैयारी करते हैं.'

इस दौरे से उम्मीदें बहुत कम की जा रही हैं. ट्रंप करीब-करीब सब पर दबाव डाल रहे हैं- चाहे वो मित्र हों या रणनीतिक साझेदार या फिर अमेरिका के निशाने पर रहे देश. ऐसा इसलिए ताकि द्विपक्षीय संबंधों को नए सिरे से तय किया जाए और कुछ मामलों में पाला भी बदला जाए जैसा कि कतर के मामले में चौंकाने वाली बात हुई. बदले माहौल में भारत की कोशिश फिलहाल हालात के मुताबिक खुद को ढालने की ही होगी. हाल में विदेश सचिव एस जयशंकर ने जो अहम बात कही, वो ये है कि ट्रंप को 'बुरा' कह देने से पहले उनका 'विश्लेषण' करें.

सबकुछ बुरा ही नहीं है

नई दिल्ली को यह मानने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ट्रंप प्रशासन का फोकस भारत नहीं है. घरेलू मोर्चे पर छह महीने से भी कम समय के कार्यकाल में ट्रंप पहले ही अपना भांडा फूटने के जोखिम से गुजर रहे हैं जिसके बाद उनकी छीछालेदर होनी है. अपदस्थ एफबीआई डायरेक्टर जेम्स कॉमी के सीनेट के सामने पेश बयान से उनकी मुश्किलें बढ़ी ही हैं.

Indian Prime Minister Narendra Modi and US President Donald Trump

ट्रंप के पक्ष में अब भी स्थितियां बेहतर हैं लेकिन ये सच है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पर मोदी के दौरे से अधिक दूसरे अहम दबाव हैं. अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर खुद की अपरिपक्वता, उत्तर कोरिया की आक्रामकता और चीन के कठोर यथार्थवाद से उपजे हालात के बीच पहले से शी जिनपिंग के विरोधी रहे ट्रंप भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं.

हाल में सुर्खियों में रहा ट्रंप का यह बयान कि अमेरिका से अरबों डॉलर झटकने के लिए भारत पेरिस क्लाइमेट समझौते में शरीक हुआ और भारत का जोर देकर इन आरोपों से इनकार करना कोई अच्छे संकेत नहीं देता है. H1B वीजा कार्यक्रम पर गहराती अनिश्चितता पर ट्रंप प्रशासन और मोदी सरकार अलग-अलग ध्रुव पर खड़े हैं. ऐसा लगने लगा है कि दशकों की कोशिश के बाद दोनों देशों के बीच बने द्विपक्षीय रणनीतिक और सामरिक समझौते ट्रंप सरकार के दौरान ढीले पड़ने लगे हैं.

हालांकि अनिश्चितता का सिद्धांत यह बताता है कि हम ये मानकर भी नहीं चल सकते कि नकारात्मक नतीजे ही निकलेंगे. भारत को अमेरिकी कांग्रेस में द्विदलीय समर्थन है और भारतीय-अमेरिकी समुदाय का प्रभाव बढ़ा है. साथ ही अमेरिकी नीतिगत फैसलों में उसका बोलबाला भी मजबूत हुआ है.

सैन्य रणनीति के मामले में कुछ ठोस आधार भी हैं. द लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेन्डम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) जिसके तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की जमीन का इस्तेमाल मरम्मत और आपूर्ति को री-स्टॉक करने में करेंगी. साथ ही डिफेंस टेक्नोलॉजी एंड ट्रेड इनिशिएटिव (डीटीटीआई) के तहत दोनों देश सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझा विकास और उत्पादन में भी सहयोग करेंगे. आर्म्स ट्रेड भी दोनों देशों के बीच रिश्तों को मजबूती से जोड़े रखता है.

कुछ बातों पर कॉमन ग्राउंड

इन बातों को ध्यान में रखते हुए और जैसी कि चर्चा है मोदी को उनकी जरूरत के हिसाब से अवसर मिल सकते हैं जिससे कि ट्रंप के नेतृत्व में भारत-अमेरिकी संबंधों को और मजबूती दी जा सके. इसका आधार न सिर्फ साझा रणनीतिक जरूरतें हैं बल्कि इसके जरिए दोनों एक-दूसरे का तुरत-फुरत फायदा भी हैं. हमें ट्रंप के साथ कुछ ‘रणनीतिक धैर्य’ दिखाने की जरूरत है.

उदाहरण के लिए, दोनों नेताओं के पास रोजगार के अवसरों को जिंदा करने का खास एजेंडा है. आपसी रिश्तों को नुकसान पहुंचाने के बजाए ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और ‘मेक इन इंडिया’ की पहल एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं जो दोनों देशों के हितों के हिसाब से ठीक बैठता है.

आतंकवाद के मसले पर भी दोनों देशों के विचार मेल खाते हैं. ट्रंप ने आतंकवाद पर कड़ा रुख अख्तियार किया है और अक्सर इस विषय पर राजनीतिक रूप से वे गलत पाए जाते रहे हैं. मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ‘सीमा पार आतंकवाद’ के लिए अच्छा श्रोता मिल सकता है.

कहा जा सकता ये है कि भारत को खुले मन से बातचीत में जाना होगा और अनिश्चितता के लिए भी तैयार रहना होगा.

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