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हैप्पी होराइजंस: उबाऊ किताबी पाठ्यक्रम से दूर प्राथमिक शिक्षा को दिया नया आयाम

क्षितिज कहते हैं, अचानक पूरी शिक्षा व्यवस्था को नहीं बदला जा सकता लेकिन शुरुआत कहीं से तो करनी होगी

FP Staff | Published On: Jul 03, 2017 04:51 PM IST | Updated On: Jul 03, 2017 05:03 PM IST

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हैप्पी होराइजंस: उबाऊ किताबी पाठ्यक्रम से दूर प्राथमिक शिक्षा को दिया नया आयाम

शैक्षिक संस्थानों द्वारा पढ़ाया गया किताबी पाठ्यक्रम ही केवल शिक्षा नहीं है. महानगरों और शहरों के स्कूल तो तकनीकी तौर पर विकसित भी होते हैं लेकिन गांवों में खराब गुणवत्ता की शिक्षा एक बड़ा कारण है. इसकी वजह से बहुत बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल छोड़ देतें है. इनमें बड़ी संख्या 10वीं से पहले पढ़ाई छोड़ने वालों की हैं.

हैप्पी होराइजंस ट्रस्ट नाम की गैरलाभकारी की संस्था है, जो गांवों के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता ‘यूथ लीडरशिप डेवलपमेन्ट प्रोग्राम’ के जरिए सुधार लाने की कोशिश कर रही है.

इसकी शुरुआत क्षितिज आनंद और वत्सला द्वारा 2012 में की गई थी. यह संस्था हाई स्कूल की लड़कियों को अपने फेलोशिप कार्यक्रम द्वारा और अधिक समर्थ बनाने की कोशिश करती है, इन कार्यक्रमों में स्टोरी टेलिंग, क्राफ्ट जैसी व्यापक गतिविधियों के कौशल विकास पर जोर दिया जाता है.

इस तरह के कार्यक्रम शुरू करने के बारे में क्षितिज और वत्सला ने तब सोचा जब वे अपनी शादी के बाद पहली बार अपने जन्म स्थान बिहार के सहरसा जिले में पहुंचे. यहां उन्हें इस क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा की खराब हालत का एहसास हुआ.

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प्राथमिक शिक्षा को दिलचस्प बनाने की कोशिश

बेटर इंडिया की रिपोर्ट में क्षितिज ने बताया, ‘यह 2011 का साल रहा होगा जब हमलोगों को लगा कि प्राथमिक स्तर की पढ़ाई सिर्फ किताबी पाठ्यक्रम में बंधकर रह गई है. मुश्किल से ही कोई और गतिविधि होती होगी जो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को और दिलचस्प और सरल बनाती हो. अगर उनके पास कोई प्रेरणा नहीं होगी तो वो क्यों पढ़ना जारी रखेंगे?'

इसके बाद वे दूसरे इलाके के कई और स्कूलों में गए और उन्होंने पाया कि स्थिति सभी जगहों पर लगभग एक जैसी ही है.

वत्सला, जो कि खुद भी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आती हैं, किस्सागोई (स्टोरी टेलिंग) करती हैं और दोनों मिलकर कोशिश करते हैं कि बच्चे इन स्कूलों में ऐसी गतिविधियों में भाग लें.

क्षितिज बताते हैं, ‘शुरुआत में बच्चे दिलचस्पी नहीं दिखाते थे. शायद इसलिए क्योंकि यह सब उनके लिए एकदम नया अनुभव है, लेकिन धीरे-धीरे हमलोग देख रहे हैं कि वे इस हिचकिचाहट से बाहर निकल रहे हैं. फिर से बच्चे सवाल पूछना शुरू कर देते हैं और फिर ज्यादा से ज्यादा कहानियां भी सुनना चाहते हैं.’

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तस्वीर: क्षितिज आनंद के फेसबुक से साभार]

बदलाव के लिए शुरुआत करना जरूरी है

क्षितिज कहते हैं, ‘हमलोग जानते हैं कि हम एक बार में ही पूरी शिक्षा व्यवस्था को नहीं बदल सकते, लेकिन शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी ही चाहिए.

क्षितिज और वत्सला फेलोशिप योजना के साथ सामने आए जिसमें हाई स्कूल के लड़कियों के लिए विशेष कौशल विकास की पेशकश की गई वहीं बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान दिया गया.

क्षितिज समझाते हैं, ‘यह फेलोशिप कार्यक्रम तीन सालों के लिए है, उसके बाद हर एक चैंपियन को एक स्कूल की जिम्मेदारी दी जाती है. हमारी कोशिश रहती है कि कम्यूनिकेशन स्किल के विशेष सेशन से लड़कियों में उनकी संवाद क्षमता को विकसित किया जाए. उनमें जानने की इच्छा को विकसित किया जाए.

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[तस्वीर: वत्सला के फेसबुक के साभार]
शुरुआत अकेले ही की थी

इस पहल की शुरुआत क्षितिज और वत्सला ने अकेले ही की थी लेकिन अब उनके साथ पूरी सक्रिय टीम है, जो बेंगलुरु, दिल्ली और बिहार तक काम करती है.

उन्होंने बताया, दो बच्चों को चैंपियंस बनाने से शुरुआत हुई थी और पांच सालों में यह संख्या 16 तक पहुंच गई है. सबसे अच्छी बात यह है कि दो लोगों को प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनने का प्रस्ताव भी मिला है. ऐसा उनके बच्चों के साथ जुड़ाव को देखते हुए किया गया. स्थानीय स्तर पर वे लोगों के प्रेरणा और रोल मॉडल बन गए हैं.’

बिहार में बेहतर शिक्षा के लिए ठोस नींव रखने का हैप्पी होरीज़ोंस का प्रयास सराहनीय है.

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