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मनरेगा: रोजगार गारंटी की सबसे बड़ी योजना अपनी आखिरी सांसें गिन रही है

2014-15 में रोजगार की संख्या घटकर प्रति परिवार 30-40 दिन ही रह गई और इसके बाद से ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है

Rashme Sehgal Updated On: Sep 22, 2017 12:01 PM IST

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मनरेगा: रोजगार गारंटी की सबसे बड़ी योजना अपनी आखिरी सांसें गिन रही है

क्या महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम (मनरेगा) का ग्रामीण महिलाओं को फायदा हुआ है? मनरेगा की शुरुआत 2006 में हुई और यह ग्रामीण इलाके के गरीबों को रोजगार देने के दुनिया के सबसे बड़े कार्यक्रम के रूप में उभरा है.

इसमें कोई शक नहीं कि 10 साल की छोटी सी अवधि में मनरेगा के जरिए 2 अरब व्यक्ति-दिवस रोजगार पैदा करने में मदद मिली है. इससे 27 करोड़ 60 लाख मजदूरों को फायदा हुआ है और इसमें आधी से अधिक महिलाएं हैं. महिलाओं का कहना है कि शुरुआती सालों में इससे रोजगार हासिल करने में मदद मिली. साल 2009-10 में प्रत्येक परिवार को तकरीबन 60 दिनों का काम मिला लेकिन 2014-15 में रोजगार की संख्या घटकर प्रति परिवार 30-40 दिन ही रह गई और इसके बाद से ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है.

देरी से मिल रहा है काम

बिहार के अररिया जिले की अधेड़ उम्र की मंडू की बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनरेगा को लेकर महिला मजदूरों के मन में क्या भावना चल रही है. मंडू ने बताया, 'आज मुझे साल में 30 दिन का काम मिल जाए तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं. चूंकि मजदूरी छह महीने की देरी से मिल रही है इसलिए मर्दों के पास बड़े शहरों में जाकर काम तलाशने के सिवा और कोई चारा नहीं रह गया है.'

गहरे हरे रंग की साड़ी में लिपटी और धूप से झुलसी जान पड़ती मंडू तीन बेटियों और दो बेटों की मां है. उसने कहा कि फिलहाल हमारे जिले में मनरेगा के तहत होने वाले सारे काम बंद हैं क्योंकि सूबे में बाढ़ आई हुई है. बीपीएल कार्डधारी होने के कारण मुझे सूबे (बिहार) की सरकार से पांच किलो चावल मिला है. मेरी बड़ी शिकायत तो यह है कि गांव के मुखिया से काम मैं मांगती हूं लेकिन वह अपनी जाति-बिरादरी के लोगों को काम देना ज्यादा ठीक समझता है.'

मंडू मनरेगा से 2009 से जुड़ी है. उसे लगता है कि इस कार्यक्रम से गांव में जरूरत की चीजें बनाने में मदद मिली है. मंडू ने कहा, 'हमने सड़क, तलाब और शौचालय बनाने में मदद की. शुरुआती सालों में मनरेगा के कारण गांव के मर्दों का बड़े शहरों में पलायन करना रुक गया क्योंकि काम मिलने के कारण मर्दों को गांव में रुकना ठीक लगता था. लेकिन अब सारा गांव खाली हो गया है और गांव में कोई मर्द नहीं दिखता है, सिर्फ छोटे बच्चे और बूढ़े रह गए हैं.'

प्रतीकात्मक तस्वीर.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

इंटरनेट कनेक्टिविट और आधार एक मजाक

उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले के अलीपुर गांव की रामबेटी मनरेगा के काम से सन 2006 से जुड़ी हैं. रामबेटी इस बात से बहुत परेशान है कि नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए मजदूरी का भुगतान बैंक खाते को आधार-कार्ड से जोड़कर हो रहा है.

रामबेटी ने कहा, ' हमलोगों में बहुत से अनपढ़ हैं और दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. हमारे हाथ घिसते रहते हैं. इसलिए हमारा मानना है कि हमारी अंगुलियों की छाप बदल सकती है और बदल जाती है. अंगुली की छाप को पहचान के सबूत के रूप में इस्तेमाल करना एक भूल है क्योंकि अगर हमारे अंगूठे या अंगुलियों के निशान में हल्का सा भी फर्क आ जाय तो वह हमारी अंगुलियों के पहले वाले निशान से मेल नहीं खाएगा.'

रामबेटी की एक शिकायत इंटरनेट की कनेक्टिविटी को लेकर है. उसने कहा, 'मैं दस दफे बैंक जाऊं तो छह दफे दिखता है कि वहां वे लोग कनेक्टिविटी की समस्या से जूझ रहे हैं. मेरे घर में सात सदस्य हैं- दो लड़के, दो लड़कियां और मेरे बूढ़े ससुर. मुझे घर के सारे काम देखने होते हैं. मैं सारे काम छोड़कर बैंक जाती हूं और वहां मुझे जवाब मिलता है कि किसी और दिन आना.'

रामबेटी का मानना है कि मनरेगा में केंद्रीकरण करने का रुझान बढ़ा है और इसका घाटा मजदूरों को हुआ है. वह बताती है, 'जिला और गांव की पंचायत अभी असहाय है क्योंकि सारे फैसले दिल्ली से लिए जा रहे हैं. पहले जब हमें समस्या होती थी तो उनका समाधान स्थानीय स्तर पर हो जाता था. अब भ्रष्टाचार के नाम पर उन लोगों ने सिर्फ हमारे लिए परेशानी खड़ी करने का काम किया है.'

उसने अपने गांव के कई ऐसे लोगों का जिक्र किया जिनका बैंक-खाता गलत आधार-नंबर से जुड़ गया था. ऐसे लोगों ने मनरेगा के लिए काम किया है लेकिन उनकी मजदूरी के पैसे किसी और मजदूर के खाते में चले गए.

रामबेटी संगतिन किसान मंजदूर संगठन की सदस्या हैं इसलिए वह कहती है कि मैं बाकी महिला मजदूरों की तुलना में अच्छी हालत में हूं. रामबेटी ने कहा, 'संगठन में 400 सदस्य हैं और हमलोग अलग-अलग परियोजनाओं की निगरानी करते हैं और नियमित हड़ताल करते हैं. जिला-प्रशासन हमारे संगठन के सदस्यों को मनरेगा के तहत काम देता है लेकिन अन्य ग्रामीण महिलाएं इतनी भाग्यशाली नहीं हैं. मनरेगा के फंड में कटौती के कारण ऐसी हालत पैदा हो गई है कि ज्यादातर ग्रामीणों को काम ही नहीं मिलता.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर

उसने कहा, 'मनरेगा में ज्यादा जोर भूमि की गुणवत्ता बढ़ाने पर है. हम लोग एक तरह से भूमि-सुधार का काम करते हैं. दलित लोगों के जो खेत पहले बंजर थे वहां अब सालों भर हरी-भरी फसल लहलहाती है.'

बीपीएल में हेराफेरी

अमृतसर जिले के करीमनगर गांव की कुलवंत कौर मनरेगा से बीते सात सालों से जुड़ी हैं. कुलवंत दलित समुदाय से हैं और दो बेटों तथा दो बेटियों की मां हैं.

मनरेगा को लेकर उनकी बड़ी शिकायत यह है कि मजदूरी के भुगतान में बहुत देरी होती है. कुलवंत कौर का कहना था, 'इस कार्यक्रम में अभी तक मुझे साल में 50 दिन तक काम मिलता रहा है हालांकि कानून तो यह है कि साल में मजदूर को 100 दिन का काम मिलना चाहिए. दुर्भाग्य कहिए कि अब मजदूरी का भुगतान छह महीने की देरी से होने लगा है जिससे मेरे हाथ बहुत तंग हो जाते हैं.'

वह अपने जिले की नहरों के एक नेटवर्क की सफाई और खुदाई का काम करती है. उसका कहना है, 'यह बड़ी मेहनत का काम है और मुझे अपने खाली हाथों से पेड़ के तने हटाने पड़ते हैं. चूंकि गांव में और कोई काम मौजूद नहीं है सो गांव के उम्रदराज स्त्री-पुरुष इसी कार्यक्रम (मनरेगा) में हिस्सेदारी करते हैं.'

अपने पंचायत प्रतिनिधि को लेकर उसकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मोटी रकम वसूल कर बीपीएल कार्ड की हेराफेरी की जाती है और इसे खाते-पीते परिवारों को दे दिया जाता है.

अजमेर जिले के गांव हरमुरा की नोरती बाई मनरेगा के काम से 2006 से जुड़ी हैं. उसका कहना है, 'उन दिनों मजदूरी का भुगतान 15 दिन पर हो जाता था. इसके बाद हमारे स्थानीय प्रशासन ने कहा कि अपने बैंक खाते खुलवाओ और यहीं से हमारे लिए परेशानियों की शुरुआत हुई. पहले हम सबकुछ पर निगरानी रखते थे, पंचायत पर दबाव बना सकते थे कि हमारे मस्टर रोल में ठीक-ठीक जानकारी लिखी जाए लेकिन अब हम अपनी शिकायत लेकर कहां जाएं.'

नोरती के मुताबिक, 'चूंकि अब सारा कुछ कंप्यूटर के सहारे किया जाने लगा है इसलिए निगरानी के किसी काम में हमारी जरूरत ही ना रही. हमारे गांव के पुरुष काम के इंतजार में बैठे तो नहीं रह सकते इसलिए वे पत्थर काटने के काम के लिए गांव से पलायन कर रहे हैं. पूरा कार्यक्रम बूढ़े लोगों और महिलाओं के जिम्मे रह गया है.'

नोरती ने बताया, 'फिलहाल मुझे साल में 100 दिन की जगह 50 दिन का काम मिल रहा है और बीते दस महीने से मुझे अपनी मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है. लेकिन एक बात यह भी है कि हमारे गांव के बहुत से मजदूरों का अभी आधार-कार्ड भी नहीं बना है क्योंकि हमारे गांव में कंप्यूटर लिंक हफ्तों तक डाउन ही रहता है.'

शौचालय पर है ज्यादा ध्यान

कटक से आई अधेड़ उम्र की कृष्णा प्रिया मिश्रा कहती हैं कि पूरा मनरेगा कार्यक्रम रुक सा गया है. मिश्रा बताती हैं, 'कार्यक्रम को चलाने के लिए पैसा नहीं है. मुझे नहीं पता कि ऐसा भ्रष्टाचार के कारण हुआ है या फिर राज्य के बजट में ही कटौती हो गई है. मैं बस इतना भर कह सकती हूं कि जमीनी स्तर पर हालत बहुत खराब है और लोगों को रोजगार हासिल नहीं हो रहा.'

गुजरात के बनासकांठा जिले से आई नीता ने बताया कि मेरे राज्य में तो सारा जोर शौचालय बनवाने पर लगा है. नीता के मुताबिक, 'सूबे की सरकार चाहती है कि हर गांव में शौचालय बने इसलिए हमलोगों का ध्यान शौचालय बनाने पर रहा है लेकिन हमें इस काम के लिए मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ और यह बेहद बुरा है.'

नीता बताती हैं, 'गांववाले चाहते हैं कि गांव में कार्यस्थल बड़ा बने, वहां पेयजल की सुविधाएं बेहतर हों और जहां संभव दिखे वहां तालाब बनाया जाए लेकिन मनरेगा के काम में इन बातों की अनदेखी हो रही है.'

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प्रतीकात्मक तस्वीर

झारखंड और छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों को भी मजदूरी के भुगतान में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. रांची जिले में मनरेगा के काम में गाहे-ब-गाहे काम करने वाली मरियम ने अफसोस भरी आवाज में बताया कि मजदूरी का भुगतान अपने आप में बड़ा घोटाला बनकर सामने आया है.

मरियम के मुताबिक, 'भुगतान बैंक के जरिए होता है. इस भुगतान को हासिल करने के लिए हमें जिला मुख्यालय जाना होता है जो 40 किलोमीटर दूर है. मैं जब बैंक पहुंचती हूं तो काउंटर पर मुझे कहा जाता है कि अभी पैसा नहीं आया है, कभी-कभी यह भी कहते हैं कि लिंक नहीं है. फिर मुझे वापसी की बस पकड़कर गांव आना होता है. इस काम में मुझे कई घंटे लगते हैं. सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि बिजली कट जाती है, बैंक में बिजली नहीं होती.'

शिकायत करने कहां जाएं?

जेम्स हेरेन्ज झारखंड में मनरेगा के काम से शुरुआत से ही जुड़े हैं. वे बताते हैं कि कार्यक्रम की एक बड़ी कमी तो यह है कि इसमें शिकायत के निवारण का कोई तरीका ही नहीं है.

हेरेन्ज के मुताबिक, 'सूबे की सरकार ने कुछ गांवों में प्रज्ञा केंद्र बनवाए हैं लेकिन प्रज्ञा केंद्र चलाने वाले बैंक अधिकारियों से मिले होते हैं और वे मजदूर की तर्जनी और मध्यमा अंगुली की छाप ले लेते हैं और अपने अंगूठे का निशान लगाते हैं. इस अंगूठे के निशान के सहारे धन जुटाया जाता है और बेचारे गरीब मजदूर ठगे जाते हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर को पासबुक भी नहीं दी गई होती.'

हेरेन्ज ने यह भी कहा कि राज्य में मनरेगा के तहत औसतन बस 40 दिन का काम दिया जा रहा है. चालू वित्तवर्ष में पांच राज्यों में मनरेगा का बजट खत्म हो गया है इसमें आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल शामिल हैं.

24 परगना जिले के अचिन्तनगर की 42 वर्षीया कविता सीत मनरेगा से पिछले छह साल से जुड़ी हैं. उनका कहना है कि अभी मुझे साल में 20 से 30 दिन का काम मिल रहा है. दुर्भाग्य से मजदूरी के भुगतान में कई महीने की देरी हो रही है और इससे बहुत समस्या पैदा होती है.

पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति की सक्रिय सदस्य अनुराधा तलवार ने ध्यान दिलाया कि मनरेगा कार्यक्रम शुरुआत में कामयाब रहा. इसका एक प्रमाण यह है कि इस कार्यक्रम पर अमल होने के शुरुआती सालों में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से होने वाला पलायन रुक गया था.

तलवार के मुताबिक, 'आज पुरुलिया से स्त्री और पुरुष दोनों पलायन कर रहे हैं, कभी-कभी उन्हें साल में चार दफे काम के लिए दूसरी जगह पलायन करना पड़ता है खासकर फसल की कटाई के दिनों में. पुरुष केरल और तमिलनाडु तक जा रहे हैं क्योंकि वहां उनको ऊंची मजदूरी मिलती है.'

जिन महिलाओं से बातचीत की गई है वे और उन सरीखे बहुत से मजदूर मनरेगा संघर्ष मोर्चा के झंडे तले देश की राजधानी में जुटे थे. इन मजदूरों का मानना है कि मनरेगा में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से कठिनाई बढ़ी है. ऊंचे कोठे पर चढ़कर नीचे की चीजों को दुरुस्त करने की प्रवृत्ति मनरेगा से बंधे विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के खिलाफ है और मजदूरी के भुगतान में होने वाली देरी के कारण महिला मजदूरों का इस कार्यक्रम से भरोसा उठ रहा है.

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